काशी विश्वनाथ को 19 साल बाद फिर से जाने लगे नाटकोट चेट्टियार नगर क्षेत्रम बागीचे से बेलपत्र
काशी विश्वनाथ को 19 साल बाद फिर जाने लगे नाटकोट चेट्टियार नगर क्षेत्रम् बागीचे से बेलपत्र


16 May 2022 |  49



ब्यूरो प्रेम शंकर मिश्र

वाराणसी।देवाधिदेव महादेव को बेलपत्र सबसे प्रिय है। काशी विश्वनाथ को हर रोज ये बेलपत्र चढ़ाने के लिए आध्यात्मिक नगरी काशी में 300 वर्षों से रह रहे नाट्टकोट्टई समुदाय के सिगरा-रथयात्रा मार्ग पर स्थित श्री काशी नाटकोट चेट्टियार नगर क्षेत्रम् परिसर (बागीचे) से जाता था। साल 2003 में इस परिसर पर जब अवैध कब्जा हुआ तो 300 वर्षों पुरानी परम्परा ठप सी गयी।योगी सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन की मदद से 19 वर्षों बाद श्री काशी नाटकोट चेट्टियार नगर क्षेत्रम् परिसर अब मुक्ती पा चुका है। 2003 में अवैध एग्रीमेंट के जरिए समिति की जमीन पर कब्जा कर लिया गया था।अब एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर बेलपत्र जाने की परम्परा में जान आ गई है।दक्षिण भारत का यही चेट्टियार समुदाय पिछले 200 वर्षों से बाबा विश्वनाथ की तीन प्रमुख आरतियां करता आ रहा है।

इस सम्बन्ध में श्री काशी नाटकोट चेट्टियार नगर क्षेत्रम् मैनेजिंग सोसायटी के सचिव पाला रामास्वामी ने बताया कि हम लोग आज से 300 वर्ष पहले काशी में आये थे। यही से कोलकाता और वर्मा व्यापार किया करते थे। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले से ट्रस्ट के इस बागीचे में लगे बेल के पेड़ से बेलपत्र श्रीकाशी विश्वनाथ को चढ़ाने के लिए जाति हैं।

पाला रामास्वामी ने बताया कि नगर क्षेत्रम् परिसर (बागीचे) में बेल के तीन वृक्ष हैं। इनमें एक वृक्ष 100 वर्ष से ज्यादा पुराना है। संस्था की परंपरा के मुताबिक यहां पहले गोदौलिया स्थित कार्यालय से प्रतिदिन सुबह-शाम पुजारी आते थे और शिव मंदिर में रुद्राभिषेक करने के बाद बेलपत्र लेकर बाबा को चढ़ाने जाते थे। उन्होंने बताया कि परिसर स्थित शिव मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा वर्ष 1890 में हुई थी। उसे लोग वृंदावन शिव मंदिर के नाम से पुकारते हैं। कब्जेदारों ने मंदिर के चारों ओर दीवार बना दी थी जिससे पुरानी परम्पराओ को निभाना संभव नहीं था। इस परिसर में पीपल, पाकड़, नीम के भी वृक्ष हैं जो 90 साल पुराने हैं।

पाला रामास्वामी ने बताया कि परिसर में अब मदार, गेंदा, गुलाब, बेला के पौधे भी लगाए जाएंगे ताकि प्राचीन परंपराएं फिर से निभाई जा सकें। जल्द ही परिसर के फूलों से बाबा विश्वनाथ का शृंगार किया जाएगा। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और पुलिस कमिश्नर ए सतीश गणेश का इस बागीचे को कब्जा धारियों से मुक्त करवाने में मदद के लिए धन्यवाद भी दिया।

आपको बताते चलें कि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में होने वाली तीन प्रमुख आरतियां, भोर में होने वाली मंगला आरती, मध्याह्न भोग आरती और रात्रि श्रृंगार भोग आरती का जिम्मा भी पिछले 200 सालों दक्षिण भारत का चेट्टियार समुदाय उठा रहा है। अगर इस परम्परा की बात करें तो वर्ष 1813 में तीनों आरती के पूजा सामाग्री मानसरोवर स्थित कुमार स्वामी मठ से विश्वनाथ मंदिर ले जाया जाता था।

इस परम्परा को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए 1963 में अगस्तकुंडा में श्री नाटकोट क्षेत्रम ट्रस्ट के नाम से एक बड़े भवन का निर्माण कराया और भवन के अंदर शिव का मंदिर बनवाया गया।इसी जगह से बाबा दरबार को जाने वाली डलिया सजाई जाती है और नित्य दिन में 11 बजे व शाम को 8 बजे ब्राह्मण दल मंदिर ले जाते हैं। चांदी की डलिया में बाबा का भोग तो डलिया में पूजा सामग्री। वहीं चांदी के घड़े में गंगा जल और साथ एक बक्सा जिसमें अन्य पूजा के समान को ले जाते हैं।

दक्षिण भारत की सोसायटी श्रीकाशी नाटकोट क्षेत्रम की 240 करोड़ रुपए की जमीन को पुलिस ने रविवार को कब्जा मुक्त कराया था। 62 हजार वर्ग फीट जमीन पर बगीचा था। इसके फूल श्री काशी विश्वनाथ को चढ़ाए जाते थे,लेकिन कब्जा करने वाले इसका व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे थे। जमीन वापस मिलने के बाद सोसायटी के लोगों ने सफाई के साथ प्राचीन शिव मंदिर में परंपरागत तरीके से पूजा पाठ भी शुरू किया।श्रीकाशी नाटकोट क्षेत्रम का मुख्य कार्यालय तमिलनाडु के शिवगंगा के कारइकुड़ी में है।काशी में इसका कार्यालय गोदौलिया में है।


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