नई दिल्ली।दिल्ली हाईकोर्ट ने 1983 के हत्या मामले में 43 साल तक मुकदमा झेलने वाले 64 वर्षीय मुकेश कुमार को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।अदालत ने गवाहों के बयानों और पहचान परेड की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाते हुए उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।अदालत ने 2004 में ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया।हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
1983 की बस में हुई थी वारदात
मामला 1 दिसंबर 1983 का है।शिकायतकर्ता उषा अपने दोस्तों के साथ लाजपत नगर से खरीदारी और डिनर के बाद डीटीसी की रूट नंबर 431 बस से लौट रही थीं। आरोप था कि बस में चढ़े कुछ युवकों ने महिलाओं से अभद्रता की और विरोध करने पर उनके साथ मौजूद युवक पर चाकू से हमला कर दिया,जिससे उसकी मौत हो गई।
मुकेश पर उकसाने का था आरोप
अभियोजन के मुताबिक मुकेश कुमार ने चाकू नहीं चलाया था,लेकिन मुकेश बस के पिछले दरवाजे पर खड़े होकर हमलावरों को मारो कहकर उकसा रहे थे और पीड़ितों के साथ मारपीट भी कर रहे थे। इसी आधार पर मुकेश के खिलाफ हत्या और आर्म्स एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
21 साल बाद हुई थी सजा
मामले की सुनवाई लंबी चली और अगस्त 2004 में ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपियों में से तीन को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इस दौरान एक आरोपी की मौत हो चुकी थी। मुकेश ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी और उनकी सजा पर रोक लगा दी गई। वह कुल मिलाकर करीब 10 महीने जेल में रहे।दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष के कई प्रमुख गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते। बस कंडक्टर ने भी यह नहीं माना कि उसने मुकेश को बस में देखा था या उन्हें किसी को उकसाते सुना था। अदालत ने गवाहों की पहचान और घटनाक्रम को लेकर गंभीर विरोधाभास दर्ज किए।
हाईकोर्ट ने टेस्ट TIP की प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।अदालत ने कहा कि इस बात पर गंभीर संदेह है कि क्या आरोपियों को पहचान परेड से पहले ही गवाहों को दिखा दिया गया था। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में पहचान परेड की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मुकेश कुमार की भूमिका संदेह से परे साबित नहीं होती। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने संकेत दिए हैं कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के जरिए चुनौती दे सकता है। ऐसे में कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
43 साल बाद मिला इंसाफ
43 साल तक हत्या के आरोप का बोझ उठाने वाले 64 वर्षीय मुकेश कुमार को आखिरकार दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली।साल 1983 में जब यह घटना हुई थी, तब मुकेश महज 21 साल के थे और पश्चिमी दिल्ली के तिलक नगर में रहते थे। इस लंबे कानूनी संघर्ष के दौरान मुकेश ने 1986 में शादी की, एक बेटे की परवरिश की जो अब 36 साल का है और अपनी बेटी को 39 साल का होते देखा। पूरी जवानी हत्या के मुकदमे के साये में गुजारने के बाद पिछले गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने 2004 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए मुकेश को बरी कर दिया।
सबूतों में विरोधाभास से कमजोर पड़ा केस
मुकेश कुमार की ओर से 2004 में दायर रिविजन याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की दोबारा जांच की और पाया कि अभियोजन पक्ष उन्हें अपराध से जोड़ने वाले आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।मामले में 28 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे,जिनमें चश्मदीद गवाह, पीड़ित, पुलिस अधिकारी और डीटीसी बस के कंडक्टर शामिल थे।अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से चश्मदीद गवाहों के बयानों और आरोपियों के टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) में शामिल होने से इनकार करने पर आधारित था,लेकिन अदालत ने पाया कि प्रमुख गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं।खासतौर पर बस के पिछले दरवाजे पर तैनात कंडक्टर सिरिपाल सिंह ने गवाही दी कि उसने न तो मुकेश को बस में चढ़ते देखा और न ही उन्हें कोई भड़काऊ नारे लगाते सुना।वहीं बचाव पक्ष के वकील हिमांशु आनंद गुप्ता ने दलील दी कि बस में यात्रियों के बैठने की व्यवस्था और आरोपियों के बस में चढ़ने के क्रम को लेकर अलग-अलग चश्मदीद गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, जिससे अभियोजन का पूरा मामला कमजोर पड़ गया।