ब्यूरो धीरज कुमार द्विवेदी
लखनऊ।उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होगा,लेकिन अभी से पूरी तरह से सियासी माहौल नजर आने लगा है।हर पार्टी जोरों शोरों से तैयारियों में जुटी हैं। 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी बहुजन समाज पार्टी ने संगठन में बड़े स्तर पर फेरबदल करते हुए चुनावी रणनीति पर काम तेज कर दिया है।बसपा मुखिया मायावती के निर्देश पर कई मंडलों और जिलों में नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।साथ ही बसपा ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को दोबारा संगठित करने और संगठन में नई ऊर्जा भरने की कवायद शुरू कर दी है।बसपा का मकसद केवल संगठन को मजबूत करना नहीं है, बल्कि अपने बिखरे हुए कैडर और पारंपरिक वोट बैंक को भी दोबारा पार्टी से जोड़ना है।मायावती पहले ही साफ कर चुकी हैं कि पार्टी इस बार दलित समाज के साथ-साथ ब्राह्मण और ओबीसी वर्ग को भी संगठन और टिकट वितरण में विशेष महत्व देगी।
बसपा ने केंद्रीय कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल की बढ़ाई जिम्मेदारी
बसपा ने केंद्रीय कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल की जिम्मेदारी बढ़ाई है।बसपा ने बेनीवाल को सहारनपुर मंडल के साथ-साथ मुरादाबाद मंडल का भी प्रभार सौंपा है।वहीं पूर्व एमएलसी भीमराव अंबेडकर,पूर्व मंत्री गया चरण दिनकर और पूर्व एमएलसी विजय प्रताप सिंह को कानपुर मंडल की जिम्मेदारी दी गई है।मेरठ मंडल में भी बदलाव करते हुए पूर्व जिलाध्यक्ष लखमी सिंह,सूरज पाल और दीपक बौद्ध को प्रभारी बनाया गया है।
बसपा ने अकबरपुर विधानसभा से मनोज वर्मा को बनाया प्रत्याशी
गौतमबुद्धनगर समेत छह जिलों में संगठनात्मक बदलाव किए गए हैं।नरेश गौतम को एक बार फिर गौतमबुद्धनगर का जिलाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही बसपा ने अकबरपुर विधानसभा से मनोज वर्मा को प्रत्याशी बनाकर चुनावी तैयारियों का संकेत दे दिया है।
मायावती 2007 की तरह दलित-सवर्ण सामाजिक समीकरण क्या फिर साध पाएंगी
बता दें कि बसपा हमेशा से संगठन में नए प्रयोग करने वाली पार्टी रही है।बसपा मुखिया मायावती अपने समर्थकों की अपेक्षाओं के मुताबिक बड़े फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले किए गए संगठनात्मक बदलावों को बसपा की नई राजनीतिक रणनीति माना जा सकता हैं।अगर मायावती 2007 की तरह दलित-सवर्ण सामाजिक समीकरण को फिर से साधने में सफल होती हैं, तो अन्य दलों के लिए चुनौती बढ़ सकती है।सपा और भाजपा पहले ही अधिकांश जातीय समीकरणों पर काम कर चुकी हैं, ऐसे में बसपा का यह कदम एक नए राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखा जा सकता है।
सोशल इंजीनियरिंग के दम पर 2007 में चुनाव जीती थीं मायावती
बता दें कि कि 2007 के विधानसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा 2012 के बाद लगातार कमजोर होती गई। 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल एक सीट मिली थी। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बेहद अहम है।यही वजह है कि बसपा नेतृत्व संगठन को मजबूत करने और नए सामाजिक समीकरण तैयार करने में जुटा हुआ है,ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में एक मजबूत राजनीतिक विकल्प के तौर पर उभरा जा सके।