नई दिल्ली।अमेरिका और ईरान जंग से तेल की सप्लाई में आ रही दिक्कतों के बीच इंडियन ऑयल अपनी खरीद की रणनीति को बदलने जा रही है।इंडियन ऑयल 2027-28 में खाड़ी देशों से सालाना समझौतों के तहत तेल की खरीद थोड़ी घटाने की योजना बना रही है।
कंपनी ने लिया बड़ा फैसला
अमेरिका और ईरान युद्ध का असर अब भारत की तेल खरीद रणनीति पर भी पड़ता दिख रहा है।देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनिंग कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन साल 2027-28 में पश्चिम एशिया के देशों से सालाना समझौतों के तहत कच्चे तेल की खरीद थोड़ी कम कर सकती है।इस मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र के मुताबिक इस सेक्टर में सप्लाई को लेकर अनिश्चितता इसके पीछे की एक बड़ी वजह है। बता दें कि भारत की तेल रिफाइनरी कंपनियां अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा कच्चा तेल का हिस्सा पारंपरिक रूप से पश्चिम एशिया से खरीदती रही हैं।यहां से भारी और ज्यादा सल्फर वाले कच्चे तेल की सप्लाई भी होती है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रूकावट से बढ़ी परेशानी
इंडियन ऑयल ने मार्च 2027 में खत्म होने वाले वित्त वर्ष में अपने कुल कच्चे तेल के आयात का करीब 47 फीसदी हिस्सा पश्चिम एशिया के उत्पादकों से सालाना समझौतों के तहत खरीदने की योजना बनाई थी,लेकिन ईरान युद्ध के कारण सप्लाई में रुकावट और जहाजों पर हमलों ने तेल की ढुलाई को मुश्किल बना दिया है।स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से माल ढुलाई का खर्च भी काफी बढ़ गया है।ऐसे में एशिया की कुछ रिफाइनरी कंपनियों ने सालाना समझौतों के तहत खरीद रोक दी है और अब जरूरत के हिसाब से बाजार से तेल खरीदने पर जोर दिया जा रहा है।
स्पॉट मार्केट और दूसरे ऑप्शन पर भी नजर
कच्चे तेल में बढ़ती लागत के बीच कुछ तेल उत्पादक खरीदारों को आकर्षित करने के लिए ढुलाई समेत तेल पहुंचाने की पेशकश कर रहे हैं।हाल के महीनों में इंडियन ऑयल समेत कुछ भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने दुबई बेंचमार्क के मुकाबले कम कीमत पर इराकी कच्चा तेल भी खरीदा है।
पश्चिम एशिया से सप्लाई घटने पर भारतीय कंपनियों ने शुरुआत में रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी।हालांकि आने वाले महीनों में रूसी तेल का आयात कम हो सकता है,क्योंकि होर्मुज के रास्ते सप्लाई बढ़ने और खाड़ी देशों की ओर से कीमतों व ढुलाई में छूट मिलने की संभावना है।इंडियन ऑयल ने जहाजों की बढ़ती लागत के कारण बड़े गैस वाहक जहाज खरीदने के इस फैसले पर रोक लगाई हुई है।इस कंपनी ने जुलाई में कम से कम दो ऐसे जहाजों में हिस्सेदारी खरीदने के लिए प्रस्ताव जारी किया था,लेकिन अब 10 साल पुराने एक जहाज की कीमत करीब 150 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई है, जो पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी है।ऐसे में इस फैसले पर भी अभी रोक लगाई हुई है।