गरीबी से निकले 49.6 करोड़ भारतीय,मगर आगे रफ्तार पड़ेगी धीमी,रोजगार और कमाई बनी बड़ी चुनौती
गरीबी से निकले 49.6 करोड़ भारतीय,मगर आगे रफ्तार पड़ेगी धीमी,रोजगार और कमाई बनी बड़ी चुनौती

13 Oct 2026 |   24



 

नई दिल्ली।भारत में 4.20 डॉलर प्रतिदिन की आय सीमा के आधार पर गरीबी दर 2026 में अनुमानित 14.2 फीसदी से घटकर 2028 तक 12.1 फीसदी रहने का अनुमान है। मगर गरीबी कम होने की रफ्तार धीमी रह सकती है।विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की गरीबी और समानता रिपोर्ट में यह बात कही गई है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में भारत में गरीबी दर में तेजी से गिरावट आई है।निम्न मध्यम आय वाले देशों के लिए तय गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का हिस्सा 2011 में 57.7 फीसदी था,जो 2023 में घटकर 16.1 फीसदी रह गया। इससे करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल पाए।

क्रय शक्ति समता के आधार पर 3 डॉलर प्रतिदिन की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से मापी जाने वाली अत्यंत गरीबी भी 2011 के 27.1 फीसदी से घटकर 2023 में 2.6 फीसदी रह गई।मगर अधिक आय वाली गरीबी रेखा के आधार पर देखें तो गरीबी अब भी व्यापक है।साल 2023 में भारत की करीब 80 फीसदी आबादी 8.30 डॉलर प्रतिदिन की उच्च मध्यम आय वाले देशों की गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन रही थी।

विश्व बैंक ने कहा कि गरीबी में कमी के पीछे मुख्य रूप से खपत में तेज बढ़ोतरी, रोजगार में वृद्धि,खासकर महिलाओं के बीच रोजगार बढ़ना और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक हस्तांतरण योजनाओं का विस्तार रहा।इन उपलब्धियों के बावजूद ग्रामीण परिवारों और उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक की पट्टी वाले राज्यों में गरीबी बेहद केंद्रित है।देश की कुल गरीब आबादी में इन राज्यों की हिस्सेदारी करीब 57 फीसदी थी। साल 2023 में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी दर 19.3 फीसदी थी जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 8.6 फीसदी थी।

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि गरीबी में कमी के मुख्य रूप से दो कारण हैं। पहला ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स सेवाओं के उभरने से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हुए हैं मगर ये कम कौशल वाले काम हैं।दूसरा सामाजिक सहायता और लोगों को मुफ्त भोजन देने की योजनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है।इससे लोगों के पास गैर-खाद्य वस्तुओं पर खर्च करने के लिए अधिक पैसा बचा है।

मदन सबनवीस का कहना है कि बच्चों और कम शिक्षा वाले लोगों में भी गरीबी अधिक थी। शून्य से 14 वर्ष की उम्र के करीब 21.8 फीसदी लोग 4.20 डॉलर प्रतिदिन की आय सीमा से नीचे रह रहे थे। वहीं 15 से 64 वर्ष की उम्र के लोगों में यह दर 14.4 फीसदी थी। 16 वर्ष और उससे अधिक उम्र के ऐसे लोगों में गरीबी दर 21.3 फीसदी थी,जिन्होंने कोई शिक्षा नहीं ली थी।इसके मुकाबले उच्च शिक्षा या माध्यमिक शिक्षा के बाद की पढ़ाई करने वाले लोगों में यह दर 7.4 फीसदी थी।

सबनवीस ने कहा,गरीबी में लगातार और टिकाऊ कमी लाने का एकमात्र तरीका अधिक रोजगार पैदा करना है,जब लोगों के पास काम नहीं होता है, तो उन्हें नकद सहायता देते रहना पड़ता है। यह आर्थिक रूप से कब तक संभव होगा, यह देखना होगा। जैसे ही इन लोगों के लिए नकद सहायता बंद की जाएगी, वे फिर से गरीबी में जा सकते हैं।

विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया कि 2017 से 2023 के बीच भारत में रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या करीब 13.4 करोड़ बढ़ी। यह कामकाजी उम्र की आबादी में हुई बढ़ोतरी से लगभग दोगुनी थी। इस वृद्धि में ग्रामीण महिलाओं के वेतन वाले काम में शामिल होने और परिवार में कमाने वाले लोगों की संख्या बढ़ने की अहम भूमिका रही। हालांकि रोजगार में बढ़ोतरी से वास्तविक कमाई में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक वास्तविक कमाई लगभग पहले के स्तर पर बनी रही।रोजगार के अधिकतर नए अवसर ऐसे कामों में पैदा हुए, जिनमें उत्पादकता अपेक्षाकृत कम है।वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में युवाओं की बेरोजगारी दर 14.6 फीसदी थी, जो वित्त वर्ष 2027 की इसी तिमाही में बढ़कर 15.9 फीसदी हो गई। ग्रामीण युवा महिलाओं में यह वृद्धि खास तौर पर देखी गई।

विश्व बैंक ने आगाह किया कि गरीबी के ताजा अनुमान में जीवन स्तर में वास्तविक सुधार के साथ-साथ मापने के तरीकों में हुए बदलावों का भी असर हो सकता है। बैंक ने यह भी कहा कि सर्वेक्षणों में अमीर परिवारों की खपत का पूरा आकलन नहीं होने के कारण असमानता वास्तविक स्तर से कम दिखाई दे सकती है।

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