किचन का प्याज ने बिगाड़ा बजट,लहसुन,अदरक और नींबू ने डाला महंगाई की आग में घी
किचन का प्याज ने बिगाड़ा बजट,लहसुन,अदरक और नींबू ने डाला महंगाई की आग में घी

13 Oct 2026 |   30



 

नई दिल्ली।देश में खुदरा महंगाई ने सितंबर में 5 फीसदी के आंकड़े को पार कर लिया है।प्याज के दाम में बढ़ोतरी से सितंबर में आम परिवारों के किचन का बजट बिगड़ गया है। अदरक,लहसुन और नींबू जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों ने महंगाई की आग में घी डालने का काम किया है।घर में खाना पकाना महंगा हुआ तो बाहर भोजन करना भी जेब पर भारी पड़ रहा है।

महंगाई में बढ़ोतरी का असर केवल आपके किचन तक सीमित नहीं रहा।रेस्तरां और आवास संबंधी सेवाओं पर भी असर पड़ा है। इन सेवाओं की महंगाई सितंबर में 9.36 प्रतिशत रही।भोजन और पेय पदार्थ परोसने वाली सेवाओं की महंगाई दर 9.39 प्रतिशत दर्ज की गई। यानी घर के खाने के साथ बाहर भोजन करने की लागत भी बढ़ी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मुद्रास्फीति में वृद्धि के पीछे मौसमी कारकों से खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी,प्रतिकूल आधार प्रभाव और अल नीनो का असर रहा। इससे खाद्य मुद्रास्फीति सितंबर में सालाना आधार पर 7.74 प्रतिशत रही, जो 21 महीने का हाई है। अगस्त 2026 में यह 5.97 प्रतिशत और जुलाई में 5.52 प्रतिशत थी।

सितंबर में व्यक्तिगत देखभाल और विविध वस्तुओं-सेवाओं की महंगाई 13.75 प्रतिशत रही। शिक्षा सेवाओं की महंगाई अगस्त के 3.73 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 3.94 प्रतिशत हो गई। मनोरंजन, खेल और संस्कृति से जुड़ी सेवाओं की महंगाई सितंबर में बढ़कर 2.16 प्रतिशत रही।

टेलीकॉम एंड कम्युनिकेशन सेवाओं की महंगाई 2.01 प्रतिशत से बढ़कर 2.44 प्रतिशत हो गई। हेल्थ सर्विस की महंगाई भी 1.34 प्रतिशत से बढ़कर 1.40 प्रतिशत हो गई। घरेलू उपयोग के सामान और उपकरणों से जुड़ी महंगाई 3.11 प्रतिशत रही। आवास संबंधी उपयोगिता सेवाओं की महंगाई 2.61 प्रतिशत से बढ़कर 2.74 प्रतिशत हो गई।

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने अनुमान जताया कि वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही में मुद्रास्फीति औसतन करीब 6.1 प्रतिशत रह सकती है। उनके मुताबिक कच्चे तेल से जुड़ी लागत के अलावा प्रतिकूल मौसम भी खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ा रहा है।अल नीनो का असर 2027 तक बने रहने की आशंका है। फसलों के उत्पादन में चक्रीय उतार-चढ़ाव और जैव ईंधन के लिए अधिक फसल इस्तेमाल किए जाने से आपूर्ति संबंधी जोखिम और बढ़ रहे हैं।

क्रिसिल की वरिष्ठ निदेशक एवं प्रमुख अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में ब्रेंट कच्चे तेल का औसत मूल्य 88-93 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है, जो सालाना आधार पर 25-32 प्रतिशत अधिक है। इससे खुदरा ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी।मांग मजबूत होने से उत्पादकों को ऊर्जा, परिवहन और अन्य कच्चे माल की बढ़ी लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने की अधिक गुंजाइश मिल रही है। इससे मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ रहा है।

बता दें कि सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत पर पहुंचने से भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी चुनौती बढ़ी है। महंगाई दर अब आरबीआई के 2 से 6 प्रतिशत के सहनशीलता दायरे की ऊपरी सीमा के करीब पहुंच गई है। पिछले सप्ताह आरबीआई ने अपनी प्रमुख नीतिगत दर रेपो में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। करीब चार साल में यह पहली वृद्धि थी। आरबीआई ने संकेत दिया था कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना नहीं है और बढ़ती मुद्रास्फीति, रुपये में कमजोरी तथा कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच आगे भी दरें बढ़ाई जा सकती हैं। साथ ही आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान भी मामूली बढ़ाकर पांच प्रतिशत से 5.2 प्रतिशत कर दिया।

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