नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने पारिवारिक पेंशन को लेकर गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के मृतक कर्मचारी की निःसंतान विधवा पुनर्विवाह के बाद भी पारिवारिक पेंशन की हकदार है,बशर्ते कि उसके पास स्वतंत्र आय का कोई स्रोत न हो।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और अमित महाजन की पीठ ने कहा कि यह प्रावधान न तो मनमाना है और न ही भेदभावपूर्ण।बल्कि यह विधवाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने और उनके पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बनाई गई एक स्पष्ट सामाजिक कल्याण नीति को दर्शाता है। कोर्ट ने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1972 के नियम 54 और 2 सितंबर 2009 के कार्यालय ज्ञापन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
सीआरपीएफ जवान से जुड़ा मामला
यह मामला केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक जवान से संबंधित था,जिसकी ड्यूटी के दौरान मौत हो गई थी। उसकी मौत के बाद उसकी पत्नी को मौजूदा नियमों के अनुसार पारिवारिक पेंशन दी जा रही थी।विधवा के पुनर्विवाह के बाद मृतक सैनिक के माता-पिता ने यह तर्क देते हुए पेंशन पर दावा किया कि अब वह इसके लिए पात्र नहीं है।
माता-पिता का तर्क
मृतक सैनिक के माता-पिता ने तर्क दिया कि आश्रित माता-पिता होने के नाते विधवा के पुनर्विवाह के बाद उन्हें पारिवारिक पेंशन मिलनी चाहिए। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में नियम 54 और संबंधित कार्यालय ज्ञापन की वैधता को चुनौती दी।मृत सैनिक के माता-पिता ने तर्क दिया कि पुनर्विवाह से विधवा का मृतक कर्मचारी के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाता है। ऐसे में उसका पारिवारिक पेंशन प्राप्त करना अनुचित हो जाता है। उन्होंने दावा किया कि बुजुर्ग और आश्रित माता-पिता को वित्तीय सहायता से वंचित किया जा रहा है, जो समानता और न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। नियम को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए उन्होंने इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग की।
कोर्ट ने सभी तर्कों को खारिज कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए सभी तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पारिवारिक पेंशन विरासत नहीं बल्कि एक वैधानिक सामाजिक सुरक्षा लाभ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 54 पेंशन प्राप्तकर्ताओं के लिए प्राथमिकता का स्पष्ट क्रम निर्धारित करता है। यदि किसी मृत कर्मचारी के पीछे विधवा रह जाती है तो जब तक विधवा जीवित रहती है और नियमों के अनुसार पात्र होती है, तब तक माता-पिता पारिवारिक पेंशन के हकदार नहीं होते हैं।कोर्ट ने गौर किया कि सरकार की नीति केवल वित्तीय सहायता प्रदान करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पुनर्विवाह के माध्यम से विधवाओं के सामाजिक पुनर्वास को प्रोत्साहित करना भी है। इस प्रावधान का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विधवाओं को सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा का सामना न करना पड़े।
आश्रितों को आर्थिक रूप से असुरक्षित न छोड़ा जाए
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों के सदस्य देश के लिए महत्वपूर्ण बलिदान देते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि उनके आश्रितों को आर्थिक रूप से असुरक्षित न छोड़ा जाए। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि माता-पिता पारिवारिक पेंशन के पात्र तभी होते हैं जब मृतक कर्मचारी अपने पीछे न तो विधवा और न ही संतान छोड़ता हो। विधवा के जीवित और पात्र होने की स्थिति में माता-पिता को पेंशन से वंचित करना संविधान का उल्लंघन नहीं है।कोर्ट इस बात से सहमत था कि पुनर्विवाह के बाद भी पर्याप्त स्वतंत्र आय न रखने वाली निःसंतान विधवा को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि पारिवारिक पेंशन का उद्देश्य तत्काल और निरंतर वित्तीय सहायता प्रदान करना है। यह किसी संपत्ति या विरासत का हिस्सा नहीं है।