जमीन से लेकर आसमान तक खतरा,विमानों और जहाजों को रास्ता भटका रही जीपीएस स्पूफिंग,भारत पर गहराया असर
जमीन से लेकर आसमान तक खतरा,विमानों और जहाजों को रास्ता भटका रही जीपीएस स्पूफिंग,भारत पर गहराया असर

13 Mar 2026 |   16



 

नई दिल्ली।युद्ध का स्वरूप विश्व में तेजी के साथ बदल रहा है।अब केवल मिसाइल,टैंक और लड़ाकू विमानों से युद्ध नहीं लड़े जा रहे,अब इलेक्ट्रॉनिक और साइबर तकनीकों का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है।इसी कड़ी में जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग आधुनिक युद्ध का एक ऐसा साइलेंट हथियार बनकर उभरा है,जो बिना गोली चलाए वैश्विक ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है।हाल के दिनों में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच इसका असर साफ दिख रहा है।

डेटा के अनुसार मिडिल ईस्ट और फारस की खाड़ी क्षेत्र में एक सप्ताह के भीतर जीपीएस....

डेटा के अनुसार मिडिल ईस्ट और फारस की खाड़ी क्षेत्र में सिर्फ एक सप्ताह के भीतर जीपीएस इंटरफेरेंस यानी सिग्नल में रुकावट की घटनाएं लगभग 55 फीसदी तक बढ़ गई हैं,जिससे कई जहाजों और विमानों के नेविगेशन सिस्टम ने गलत लोकेशन दिखानी शुरू कर दी।सुरक्षा एजेंसियों और क्रू में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।आने वाले समय में यह तकनीक वैश्विक व्यापार,समुद्री परिवहन और विमानन क्षेत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकती है।

मिडिल ईस्ट में बढ़ी जीपीएस रुकावट

मिडिल ईस्ट में हाल की घटनाओं ने जीपीएस इंटरफेरेंस के खतरे को उजागर कर दिया है।रिपोर्ट के मुताबिक ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों के 24 घंटे के भीतर ही इस क्षेत्र में काम कर रहे कई जहाजों के नेविगेशन सिस्टम में गड़बड़ी आने लगी।समुद्र में चल रहे जहाज अचानक डिजिटल मैप पर ऐसी जगहों पर दिखाई देने लगे जो वास्तविकता से बिल्कुल अलग थीं।कुछ जहाजों को सिस्टम एयरपोर्ट,परमाणु संयंत्र या ईरान के अंदरूनी इलाकों में दिखा रहा था,जबकि वे वास्तव में समुद्र में ही थे।जहाजों की वास्तविक स्थिति नहीं बदली थी,बल्कि उन्हें मार्ग दिखाने वाले सैटेलाइट सिग्नल के साथ छेड़छाड़ की गई थी।इस प्रकार की घटनाओं को जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग कहा जाता है।

क्या है जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग

आधुनिक जहाज,हवाई जहाज और कई वाहनों की नेविगेशन प्रणाली ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर करती है।यह सैटेलाइटों का एक नेटवर्क होता है,जो पृथ्वी पर सटीक लोकेशन बताने के लिए सिग्नल भेजता है।हालांकि इन सैटेलाइट सिग्नलों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वे पृथ्वी तक पहुंचते-पहुंचते बेहद कमजोर हो जाते हैं।इसी कमजोरी का फायदा उठाकर सैन्य या अन्य इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम इन सिग्नलों में दखल दे सकते हैं।जीपीएस जैमिंग तकनीक में शक्तिशाली रेडियो सिग्नल भेजकर सैटेलाइट से आने वाले सिग्नलों को ब्लॉक कर दिया जाता है,इससे जहाज या विमान का नेविगेशन सिस्टम काम करना बंद कर देता है और वह अपनी सही लोकेशन नहीं जान पाता।जीपीएस स्पूफिंग ज्यादा खतरनाक तकनीक है,इसमें नकली जीपीएस सिग्नल भेजकर नेविगेशन सिस्टम को भ्रमित किया जाता है।परिणामस्वरूप जहाज या विमान की स्क्रीन पर गलत लोकेशन दिखाई देती है।

1,600 से ज्यादा जहाज प्रभावित

मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म विंडवर्ड की रिपोर्ट के अनुसार 7 मार्च को 1,650 से अधिक जहाजों में जीपीएस और एआईएस सिग्नल में रुकावट दर्ज की गई।यह आंकड़ा एक सप्ताह पहले की तुलना में लगभग 55 फीसदी ज्यादा है। यह घटनाएं कुवैत से लेकर अरब की खाड़ी और ओमान की खाड़ी तक देखी गईं।कई जहाजों की लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम में पूरी तरह असंभव स्थानों पर दिखाई दी।रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कम से कम 30 ऐसे क्लस्टर पहचाने गए हैं,जहां जहाजों के एआईएस सिग्नल लगातार प्रभावित हो रहे हैं,ये क्लस्टर अधिकतर सैन्य ठिकानों या बंदरगाहों के आसपास पाए गए।

होर्मुज जलडमरूमध्य में कम हुई गतिविधि

10 मार्च की रिपोर्ट के मुताबिक 9 मार्च को होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक गतिविधियों में भी कमी देखी गई।उस दिन केवल एक ईरानी झंडे वाला जहाज जलडमरूमध्य से बाहर जाता दिखाई दिया,जबकि अंदर आने वाले जहाजों की गतिविधि लगभग शून्य रही।यह स्थिति वैश्विक व्यापार के लिए चिंता का विषय है,क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है।

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का बढ़ता हुआ चलन

जीपीएस इंटरफेरेंस की घटनाएं नई नहीं हैं,लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें तेजी से बढ़ोतरी हुई है।खासकर 2022 में यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद यह तकनीक अधिक इस्तेमाल होने लगी। ड्रोन और जीपीएस-गाइडेड हथियारों पर बढ़ती निर्भरता से सेनाएं विरोधी पक्ष की तकनीक को निष्क्रिय करने के लिए सैटेलाइट सिग्नल जाम करने लगी हैं,इसका असर अक्सर सामान्य जहाजों और विमानों पर भी पड़ता है।

समुद्री नेविगेशन के लिए गंभीर खतरा

जीपीएस जैमिंग समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।यदि जहाज का क्रू सतर्क नहीं है तो नेविगेशन में गंभीर गलतियां हो सकती हैं,इससे जहाज के रास्ते में बदलाव, टकराव या दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।सिग्नल में रुकावट जहाज के अन्य उपकरणों और कुछ सुरक्षा प्रणालियों के कामकाज को भी प्रभावित कर सकती है।नवंबर 2023 से नवंबर 2025 के बीच जीपीएस इंटरफेरेंस के 1,951 मामले सामने आ चुके हैं।

विमानन क्षेत्र भी प्रभावित

जीपीएस इंटरफेरेंस का खतरा केवल समुद्री क्षेत्र तक सीमित नहीं है।अंतरराष्ट्रीय विमानन संगठन आईएटीए के मुताबिक 2021 से 2024 के बीच विमान उड़ानों में जीपीएस सिग्नल खोने की घटनाएं 220 फीसदी से अधिक बढ़ गई हैं।कई पायलटों ने बताया कि उनके कॉकपिट डिस्प्ले पर विमान की लोकेशन वास्तविक स्थान से काफी अलग दिखाई देती है। कुछ मामलों में विमान अपने वास्तविक मार्ग से कई किलोमीटर दूर दिखने लगता है।

दिल्ली एयरपोर्ट पर भी पड़ा असर

नवंबर 2025 में दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी जीपीएस स्पूफिंग की बड़ी घटना सामने आई थी। इस दौरान 800 से ज्यादा उड़ानों में देरी हुई या उन्हें दूसरे हवाई अड्डों की ओर मोड़ना पड़ा।कई पायलटों ने बताया कि उनके नेविगेशन सिस्टम ने विमान की लोकेशन लगभग 2,500 किलोमीटर दूर दिखाई।इसी तरह की घटनाएं मुंबई,बेंगलुरु, हैदराबाद,चेन्नई,कोलकाता और अमृतसर के हवाई अड्डों पर भी दर्ज की गईं।

जब जीपीएस काम न करे तो क्या किया जाता है

अगर जहाज या विमान को अचानक गलत लोकेशन डेटा मिलने लगे तो क्रू सबसे पहले वैकल्पिक तरीकों से अपनी स्थिति की पुष्टि करता है।जहाजों में आमतौर पर निम्नलिखित उपाय अपनाए जाते हैं।सेकेंडरी जीपीएस सिस्टम का उपयोग,डेड रेकनिंग नेविगेशन,रडार प्लॉटिंग,विजुअल पोजिशन फिक्स,डेप्थ साउंडिंग।जरूरत पड़ने पर जहाज का अधिकारी स्थानीय समुद्री ट्रैफिक सेवा या बंदरगाह प्राधिकरण को भी सूचना देता है।

क्यों इतने कमजोर होते हैं जीपीएस सिग्नल 

जीपीएस सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 20,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करते हैं।इतनी दूरी तय करके जब सिग्नल पृथ्वी तक पहुंचते हैं तो उनकी शक्ति बहुत कम रह जाती है।
इसी वजह से छोटे इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर भी इन सिग्नलों को आसानी से बाधित कर सकते हैं।एक जीपीएस रिसीवर को सही लोकेशन जानने के लिए कम से कम चार सैटेलाइट से सिग्नल की जरूरत होती है।यदि इनमें से कुछ सिग्नल बाधित हो जाएं तो नेविगेशन सिस्टम गलत परिणाम दे सकता है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खतरा

भारत के लिए जीपीएस इंटरफेरेंस का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश का अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों पर निर्भर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का लगभग 95 फीसदी व्यापार वॉल्यूम के आधार पर समुद्र के रास्ते होता है।लगभग 70 फीसदी व्यापार मूल्य भी समुद्री मार्गों से जुड़ा है।भारत का 50 फीसदी से अधिक कच्चे तेल का आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है।यदि इस क्षेत्र में नेविगेशन सिस्टम प्रभावित होते हैं तो जहाजों को मार्ग बदलना पड़ सकता है,इससे माल ढुलाई की लागत और समुद्री बीमा प्रीमियम दोनों बढ़ सकते हैं।

भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम NavIC

विदेशी सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन विकसित किया है।इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन संचालित करता है।यह एक क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है,जो भारत और आसपास के इलाकों में सटीक लोकेशन सेवा प्रदान करता है। NavIC का उपयोग पहले से ही कई क्षेत्रों में हो रहा है,जैसे:भारतीय नौसेना के ऑपरेशन,आपदा चेतावनी प्रणाली,मछली पकड़ने वाली नौकाओं की ट्रैकिंग,कुछ स्मार्टफोन सेवाएं।हालांकि अभी भी अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और विमानन प्रणाली मुख्य रूप से अमेरिकी जीपीएस और अन्य वैश्विक सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर हैं।

NavIC पर जोर देने की जरूरत

भारत को अपने नेविगेशन सिस्टम NavIC को और मजबूत बनाना चाहिए।खासकर समुद्री परिवहन और रक्षा क्षेत्र में इसका अधिक उपयोग किया जा सकता है, इसके साथ ही जहाजों और विमानों के क्रू को पारंपरिक नेविगेशन तकनीकों में भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए,ताकि सैटेलाइट सिग्नल फेल होने पर भी सुरक्षित संचालन संभव हो सके।

वैश्विक परिवहन के सामने नई चुनौती

जैसे-जैसे आधुनिक युद्ध तकनीकी रूप से उन्नत होते जा रहे हैं,इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप भी युद्ध रणनीति का स्थायी हिस्सा बनता जा रहा है। जीपीएस आधारित ड्रोन और मिसाइलों के बढ़ते उपयोग से सैटेलाइट सिग्नल को जाम करना कई सेनाओं के लिए रणनीतिक फायदा बन गया है।हालांकि इसका अप्रत्यक्ष असर अक्सर सामान्य जहाजों, विमानों और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ता है।भारत जैसे देशों के लिए चुनौती यह है कि वे अपने नेविगेशन सिस्टम को अधिक मजबूत बनाएं और वैकल्पिक तकनीकों को विकसित करें, क्योंकि डिजिटल युद्ध के इस दौर में मैप पर अपनी सही लोकेशन जानना भी अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है।

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