जेनज़ी ने उजागर की खामी,क्या लाभ ले पाएगा विपक्ष: धनंजय सिंह 
जेनज़ी ने उजागर की खामी,क्या लाभ ले पाएगा विपक्ष: धनंजय सिंह 

04 Aug 2026 |   31



 

लखनऊ।आप अपने सियासी रुझान के मुताबिक राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर को एक क्रांति के रूप में अथवा एक गुजरे हुए तूफान के रूप में देख सकते हैं।मेरे तर्कों से किसी की सोच नहीं बदलने वाली।बहरहाल क्या मैं यह कहने का प्रयास करूं कि क्या हुआ और क्या नहीं,जो कुछ हुआ वह मोदी सरकार के प्रति पहला सार्वजनिक और खुल्लम-खुल्ला विरोध और उपहास है।अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 जुलाई की हिंसा के बाद इतनी तत्परता से प्रतिक्रिया दी तो उसका मुख्य कारण यह था कि उन्हें एहसास हुआ कि विरोध कर रहे युवाओं में से 95 फीसदी से भी अधिक मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के हिंदू हैं।

यह उनका बुनियादी वोट आधार है।आप इसे जेनज़ी का लेबल देकर तुच्छ बना सकते हैं और पूरी चर्चा खासतौर पर टीवी पर होने वाली चर्चा को उनकी भाषा,उनके द्वारा दी गई गालियों पर मोड़ सकते हैं,लेकिन यह जेनज़ी कितना अलग तरह से सोचती है इस पर कोई भी चर्चा उनके द्वारा दिखाई गई अवज्ञा को तुच्छ नहीं बना सकेगी।

पहली बात तो यह कि ये अवज्ञा उस शारीरिक जोखिम के बावजूद थी,जो 20 जुलाई को हुई पिटाई के बाद भी उनके जंतर मंतर लौटने के संकल्प से स्पष्ट है। दूसरी बात उनमें भविष्य के करियर को लेकर कोई भय नहीं नजर आया या कहें तो एक हद तक लापरवाही नजर आई।यह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुआ अब तक का सबसे उग्र छात्र आंदोलन था।इससे पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में मंडल विरोधी आंदोलन हुआ था,उसमें उस दौर के युवाओं ने विरोध किया था।कुछ ने तो आत्मदाह का प्रयास भी किया था। इससे उस समय राजीव गोस्वामी और सुरिंदर सिंह चौहान की मृत्यु हुई थी।

दोनों ही मामलों में प्रेरणा एक जैसी थी।करियर से जुड़ी संभावनाएं,नौकरियां और शिक्षा।इनमें पहला आंदोलन स्पष्ट रूप से ऊंची जाति के लोगों का था,जबकि इस बार अधिकांश अंग्रेजी बोलने वाले,मीम बनाने वाले उच्च मध्य वर्ग के युवा हैं। चार दशक के अंतराल पर आंदोलनरत हुई दो पीढ़ी,लेकिन पुलिस या दमन का कोई भय नजर नहीं आया।

इन युवाओं ने अभिजात वर्ग के बीच खुद अपना लिए गए मौन को तोड़ दिया।यह वर्ग मोदी की आलोचना में एक भी शब्द नहीं बोल रहा था। बहुत हुआ तो दाएं-बाएं देखकर थोड़ा फुसफुसा लिया जाता था। अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।उन्होंने यह भी दिखाया कि एक बड़ा जनसमूह ऐसा है,जो विकसित भारत या अमृतकाल जैसे नारों से अप्रभावित है।

आज के जेनज़ी का बड़ा हिस्सा 2047 तक 50 वर्ष की आयु का होगा और सबसे छोटी आयु वाले 35 वर्ष के होंगे। उनकी जिंदगियां तब तक निकल चुकी होंगी। इतना लंबा इंतजार करने का धीरज किसके पास है।निश्चित रूप से इस पीढ़ी के युवाओं के पास नहीं और कहीं के भी युवाओं के पास नहीं। इसके विपरीत यह 50 वर्ष से अधिक आयु वाला मध्यम या उच्च-मध्यम वर्ग में भाजपा के मतदाता के साथ यह तरीका काम कर सकता है।लक्ष्य बहुत दूर भविष्य का रखा गया है,जहां बुजुर्ग उसे देख नहीं पाएंगे। इसलिए मोदी सरकार सुरक्षित है।बच्चे इतनी दूर देख नहीं सकते।

मोदी की आलोचना करने वाले कई लोग इसे श्रीलंका, बांग्लादेश या काठमांडू में हुए युवाओं के आंदोलन से जोड़कर देख रहे थे।ऐसा सोचना भारतीय लोकतंत्र,हमारी मजबूत व्यवस्था दोनों का अपमान है। साथ ही यह एक भ्रम को भी दर्शाता है,जिसके तहत यह सोचा जा सका कि एक निर्वाचित सरकार को इस कदर आसानी से हटाया जा सकता है। युवाओं ने मोदी विरोधियों के लिए दरवाजा जरूर थोड़ा सा खोल दिया है। उन्होंने मोदी सरकार की कमी उजागर कर दी है।वह यह कि मोदी सरकार के मन में अपने सबसे वफादार जनाधार के बीच अपनी लोकप्रियता को लेकर जो धारणा है वह हकीकत से काफी दूर है। उस जनाधार में सरकार से निराश लोगों की तादाद बढ़ रही है।

यही बात इन प्रदर्शनों ने रेखांकित की। भाजपा ने इसे समझा तभी उन्होंने अपने दो सबसे महत्त्वपूर्ण चेहरों को भेजा। स्वास्थ्य मंत्री और छह साल तक पार्टी अध्यक्ष रहे जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह,जो अंतरिक्ष,परमाणु ऊर्जा,विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसी संवेदनशील मंत्रालयों के प्रभारी हैं।यही कारण था कि उनका निर्देश था कि प्रदर्शनकारियों के साथ नरमी बरती जाए, उनकी सभी मांगें मान ली जाएं और यहां तक कि साझा संवाददाता सम्मेलन भी किया जाए।

भूमि अधिग्रहण और कृषि कानूनों पर मोदी सरकार ने पहले लचीलापन दिखाया था।अब हमने कमजोरी देखी।इसका मुख्य कारण यह था कि प्रदर्शन करने वाले उनके मतदाता आधार से थे और यह भी तथ्य है कि उनका आधार इससे कहीं व्यापक है।

यह बात हमें इस बिंदु पर लाती है कि यह प्रदर्शन आखिर क्या नहीं था।पहली बात कोई क्रांति नहीं हुई और आप फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के गीत को विराम दे सकते हैं।उत्तर भारत कांवड़ यात्राओं से पट गया है।जोर-जोर से डीजे बजेंगे,भंडारों में भोजन होगा,योगी सरकार हेलीकॉप्टर से कांवड़ ले जाने वालों पर फूल बरसाएगी।इनमें भी अधिकांश जेनज़ी होंगे।भाजपा के वफादार युवाओं की भी कमी नहीं।

आगे की सियासत में जेनज़ी द्वारा दिखाई गई कमी का लाभ लेने की कोशिश होगी।भाजपा अपनी समस्या को समझ चुकी है।यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इंस्टाग्राम पर बात कर रहे हैं,लेकिन इससे मतदाताओं की ऊब कैसे दूर होगी, क्या पीएम मोदी अपनी सरकार को फिर से सशक्त कर पाएंगे,मंत्रिमंडल में वही पुराने चेहरे हैं।युवाओं को सीधे प्रभावित करने वाले मंत्रालयों की बात करें तो शिक्षा मंत्रालय में अब पांचवे मंत्री के पास प्रभार है और जल्द ही छठा होगा। कौशल विकास में चार मंत्री आ चुके हैं और अगर यह परियोजना सफल होती तो बेरोजगारी या अधूरा रोजगार कम होता और वे चार मंत्री कौन रहे।राजीव प्रताप रूडी,धर्मेंद्र प्रधान,महेंद्र नाथ पांडे,फिर प्रधान और अब राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी।

हरियाणा के राव इंद्रजित सिंह 2004 से एक बार (2009-14) के अंतराल को छोड़कर लगातार राज्य मंत्री रहे हैं।अब उनके पास सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन और योजना है।मोदी सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर दिया,लेकिन मंत्रालय अब भी मौजूद है।जीतन राम मांझी और एचडी कुमारस्वामी क्रमशः एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) और भारी उद्योग संभालते हैं। दोनों ही रोजगार के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

विपक्ष इन मौकों का लाभ लेना चाहता है।बस यह याद रखे कि सत्ता ऊपर से नहीं आती।मैं पहले भी कह चुका हूं कि भारत में कोई शक्तिशाली नेता किसी चुनौतीकर्ता से पराजित नहीं होता,वे खुद को हराते हैं।इंदिरा गांधी ने आपातकाल से ऐसा किया,राजीव गांधी ने शाह बानो से अयोध्या तक कई गलतियों से,वाजपेयी ने इंडिया शाइनिंग के नशे में समय से पहले चुनाव कराकर। 2014 में नरेंद्र मोदी एक चुनौतीकर्ता के रूप में उभरे। तब तक मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन चार साल से पंगु बनी हुई थी।

हर शक्तिशाली नेता को पराजित करने के लिए विपक्ष को किसी ऐसे व्यक्ति की मदद मिली,जिसने जन आंदोलन खड़ा किया।जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ और वीपी सिंह ने राजीव गांधी के खिलाफ ऐसा किया।इन तीन उलटफेरों यानी इंदिरा,राजीव और संप्रग के मामलों में आरएसएस गहराई से शामिल था।कांग्रेस के पास ऐसी कोई वफादार जमीनी फौज नहीं है और यह उनके लिए एक बड़ी बाधा है। अब उनके पास इस नए अवसर पर काम करने के लिए तीन साल हैं।मोदी-शाह भाजपा के पास खुद को बदलने और पुनर्निर्माण करने के लिए भी यही समय है।

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