जेनज़ी का अवसर भुनाने के लिए भारत को बदलना होगा रोजगारविहीन विकास मॉडल:धनंजय सिंह 
जेनज़ी का अवसर भुनाने के लिए भारत को बदलना होगा रोजगारविहीन विकास मॉडल:धनंजय सिंह 

22 Aug 2026 |   28



 

 लखनऊ।नीट पेपर लीक के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्र-छात्राओं के विरोध प्रदर्शन का अंत हो चुका है।ऐसा तब हुआ जब केंद्र सरकार ने शैक्षणिक सुधार लाने का वादा किया,लेकिन बीते एक महीने का घटनाक्रम, बढ़ती असमानता,देश के वृद्धि और विकास मॉडल में रोजगारों की कमी के कारण बढ़ती नाराजगी को दर्शाता है। अगर बेरोजगारी में इसी तरह वृद्धि होती रही तो देश का जनांकिकी लाभांश एक आपदा में बदल सकता है।खास कर यह देखते हुए कि एक तरफ तो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में वृद्धि हो रही है और दूसरी ओर बेरोजगारी भी बढ़ रही है। 

भारत को युवाओं के असंतोष को लेकर ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए,क्योंकि पड़ोसी देश बांग्लादेश और नेपाल में ऐसे आंदोलनों का परिणाम हम देख चुके हैं।बिना समुचित रोजगार अवसरों के बढ़ती शिक्षा एक खतरनाक मिश्रण है।

यूएनडीपी की 2013 की मानव विकास रिपोर्ट दिखाती है कि इस सदी के आरंभ में अरब में हुए आंदोलनों में इसका अहम योगदान था।शुरुआत में सरकार ने प्रदर्शनों के विरुद्ध बल प्रयोग किया,लेकिन जब आंदोलन रफ्तार पकड़ लिया तो सरकार शिक्षा मंत्री को बदलने और एक उच्चस्तरीय परीक्षा सुधार समिति के गठन की मांग पर सहमत हो गई।निस्संदेह परीक्षा सुधार अहम हैं,लेकिन उनके अलावा शासन,शिक्षा और आर्थिक नीतियों में भी जरूरी सुधार करने की आवश्यकता है। 

भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया को मजबूत करने के लिए शासन सुधार महत्त्वपूर्ण हैं,लेकिन इसके साथ ही भारत को रोजगार की कमी और विशेषकर युवा बेरोजगारी से भी निपटना होगा। इसके लिए देश के विकास मॉडल में बुनियादी बदलाव जरूरी हैं।देश की जीडीपी तो बढ़ी है,लेकिन रोजगार से जीडीपी वृद्धि की प्रत्यास्थता यानी जीडीपी में हर प्रतिशत वृद्धि पर रोजगार कितना बढ़ता है,इसका स्तर 1980 के दशक में लगभग 0.5 से घटकर 2000 के दशक में 0.3 और आज 0.16 पर आ गया है।

भारत की रोजगार लोच या प्रत्यास्थता अब विश्व में सबसे कम है,जबकि बांग्लादेश और वियतनाम में यह 0.3 से अधिक, चीन और इंडोनेशिया में 0.4 और फिलीपींस में 0.5 है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक वियतनाम का रोजगार-से-जनसंख्या अनुपात लगभग 75 फीसदी है,जबकि भारत का लगभग 50 फीसदी पर स्थिर रहा है। यदि भारत का अनुपात 10 फीसदी अंक अधिक,यानी 60 फीसदी होता तो इसका मतलब होता कि 14 करोड़ अधिक लोग नियमित नौकरियों में होते।

भारत को दूसरी पीढ़ी के सुधार करने होंगे।विशेषकर श्रम कानून और भूमि कानून में सुधार लाना होगा,जो औपचारिक रूप से कामगारों को नियुक्त करना कठिन बनाते हैं और भूमि अधिग्र​हण को बहुत महंगा।साथ ही बिजली,मालभाड़ा और पूंजी की लागत,जो भारत में प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक है वह कम करनी होगी। इन सुधारों के साथ भारत को अपने सांठगांठ वाले पूंजीवादी,बड़े व्यवसाय-हितैषी और पूंजी-गहन आर्थिक मॉडल से भी दूर जाना होगा।

भारतीय उद्योग धीरे-धीरे बिग 5 यानी पांच बड़ी कंपनियों में केंद्रित होता जा रहा है।औद्योगिक विकास का नेतृत्व करने के लिए बड़े व्यवसायों को भारी सब्सिडी और शुल्क सुरक्षा देकर उन पर निर्भर रहने की रणनीति उल्टा असर डाल रही है। इसके परिणामस्वरूप हम असमय ही औद्योगीकरण में कमजोरी और बेरोजगारी में इजाफा देख रहे हैं।बड़े व्यवसायों का यही डर पहले कृषि सुधारों को भी पटरी से उतार चुका था,जबकि भारत को उन सुधारों की सख्त जरूरत थी।हाल ही में सेवा क्षेत्र भी,जिसने पहले काफी नौकरियां पैदा की थीं,वह आर्टिफिशल इंटेलिजेंस क्रांति से प्रभावित होकर बड़े पैमाने पर छंटनी का सामना कर रहा है।

चीन को भूल जाइए जो भारत से बहुत आगे निकल चुका है और अगले वर्ष उच्च आय वाला देश बन जाएगा।अब तो वियतनाम जो 2010 में भारत से पीछे था वह विगत 16 वर्षों में उच्च मध्य आय की श्रेणी में पहुंच गया है,जहां 2025 में वियतनाम की सकल प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 4,650 डॉलर हो गई। दूसरी तरफ भारत अब भी निम्न मध्य आय वाला देश है,जिसकी सकल प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 2,760 डॉलर है। 

वियतनाम में निवेश का स्तर भारत से बहुत अलग नहीं है। फर्क यह है कि वियतनाम ने चीन की तरह अपने शुरुआती विकास चरण में निर्यातोन्मुख एफडीआई पर भारी निर्भरता रखी,जिसने अधिक नौकरियां पैदा कीं। वियतनाम में शुद्ध एफडीआई जीडीपी का औसतन 7 फीसदी से भी अधिक रहा और शुरुआती वर्षों में 10-12 फीसदी तक पहुंचा। भारत के मामले में शुद्ध एफडीआई कभी भी जीडीपी के 4 फीसदी तक नहीं पहुंचा और यह औसतन 1-2 फीसदी के करीब रहा। अब तो यह घट रहा है,क्योंकि जिन्होंने भारत में निवेश किया था वे भी अपनी रकम निकाल रहे हैं।

वियतनाम की सफलता का एक बड़ा कारण यह है कि वह आसियान मुक्त व्यापार क्षेत्र,व्यापक और प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौता,क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी और यूरोपीय संघ के एफटीए जैसे प्रमुख व्यापार और निवेश समझौतों का हिस्सा है।वियतनाम ने इन समझौतों का उपयोग घरेलू सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए किया। भारत ने किसी व्यापक व्यापार और निवेश समझौते में शामिल होने का कोई इरादा नहीं दिखाया है और मौजूदा द्विपक्षीय निवेश संधियों को भी कमजोर किया है।भारत ने द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की दिशा में कदम बढ़ाया है,लेकिन अब भी अमेरिका के साथ एक समझौते को अंतिम रूप देने और यूरोपीय संघ के साथ किए गए समझौते को अनुमोदित करने में जूझ रहा है।

वियतनाम ने चीन की तरह पर्यटन पर भी ध्यान केंद्रित किया है। 2025 में वियतनाम में 2 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे,जबकि भारत में यह संख्या 1 करोड़ रही। इसमें प्रवासी भारतीयों की घरेलू यात्राएं शामिल नहीं हैं।चीन ने लगभग 4 करोड़ पर्यटकों को आकर्षित किया।भारत अपनी विशाल सांस्कृतिक धरोहर के साथ आसानी से प्रति वर्ष 5 करोड़ पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है।बशर्ते कि वह संगठित प्रयास करे और पर्यटन को रोजगार सृजन का साधन बनाए। यह रोजगार पैदा करने का एक सरल उपाय है जिस पर ध्यान देना चाहिए।

इतिहास बताता है कि अधिकांश जेनज़ी आंदोलनों से कोई स्थायी बदलाव नहीं आए।अरब स्प्रिंग विद्रोही आंदोलनों को बड़े पैमाने पर कुचल दिया गया और कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। हाल के जेनज़ी विद्रोहों ने भारत के पड़ोस में शासन परिवर्तन तो किए,लेकिन सार्थक सुधार नहीं हुए। चीन में भी 1989 में त्यानआनमेन चौक पर छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह को क्रूरता से दबाने के बाद बड़े सुधार रुक गए,लेकिन 1992 में दोबारा शुरू हुए।

भारत एक अलग रास्ता अपना सकता है और उसे अपनाना भी चाहिए।उम्मीद है कि ये विरोध भारत के बेरोजगारी वाले वृद्धि मॉडल में बड़े सुधार और सरकार द्वारा वादा किए गए व्यापक आर्थिक सुधारों की ओर ले जाएंगे। अन्यथा सामाजिक तनाव बने रहेंगे स्वतंत्रता के 100 साल पूरे होने तक भारत के लिए उच्च मध्य आय श्रेणी में पहुंचना और मध्य आय के जाल से निकलना कठिन हो सकता है।

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