लखनऊ।किसी भी धर्म में प्रेम,सहयोग और समरसता का वातावरण तब निर्मित होता है,जब इंसान अपने अहंकार को मीलों दूर त्याग कर भक्ति के रास्ते पर चलता है।कांवड़ियों की कांवड़ यात्रा इसका सत्य और सजीव प्रतीक है।इंसान को इंसान से जोड़ने वाली सांस्कृतिक चेतना की यह विराट यात्रा है,इसमें जाति,भाषा,क्षेत्र,आर्थिक स्थिति और सामाजिक भेदभाव खत्म हो जाते हैं।
हर साल सावन के महीने में सड़कों पर उमड़ता कांवड़ियों का जनसैलाब भारत की उस गहरी सामाजिक बुनावट का प्रतीक है,जहां आस्था और समरसता एक साथ प्रवाहित होती हैं, कांवड़ यात्रा एक ऐसा मंच है,जहां अमीर-गरीब का भेदभाव खत्म हो जाता है और सेवा भाव सर्वोपरि होता है।
कांवड़ यात्रा हमारे लिए बहुत बड़ी सीख भी है कि सामाजिक समरसता किसी उपदेश से नहीं,बल्कि साझी आस्था, सहभागिता और परस्पर सम्मान से विकसित होती है,इसे वर्तमान में प्रत्यक्ष रूप में देखा भी जा सकता है।जब एक साथ हजारों लोग कंधे पर गंगाजल लिए शिवालयों की ओर बढ़ रहे हैं।विविधताओं के बीच एकात्मता का यह नजारा सावन में जीवित हो उठा है।प्रेम,सेवा,सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता पर टिकी हुई यह श्रद्धा यात्रा वो आध्यात्मिक शक्ति है,जो लोगों को समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जोड़ती है। इस सामूहिक अनुशासन के पीछे एक साझा पहचान है-भोला। वह संज्ञा जो मनुष्य को शिव से एकाकार करती है।
भोला कोई साधारण संबोधन नहीं है,यह बराबरी का संवाद है। कांवड़ उठाते ही श्रद्धालु का नाम,उसका कुल,उसकी आर्थिक हैसियत गायब हो जाती है।सड़क किनारे सेवा शिविर में करोड़पति का बेटा और एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा एक ही पंगत में बैठकर बराबरी से भोजन करते हैं।यह सिर्फ भूख मिटाना नहीं हैं,यह सदियों पुरानी सामाजिक दूरियों को पाटने का एक मौन प्रयास है और आस्था की स्वाभाविक शक्ति से यह भाव जन्म लेता है।
हिंदुत्व के फायरब्रांड मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस सामाजिक आयाम को गहराई से समझा है,यही कारण है कि कांवड़ यात्रा को व्यवस्थागत समर्थन लगातार दिया जा रहा है। सीएम योगी की दृष्टि में कांवड़ यात्रा ऐसा सामाजिक अवसर है,जहां समाज अपने भीतर खाइयों को स्वयं पाटने का काम करता है।सड़कों की मरम्मत,सुरक्षा व्यवस्था,चिकित्सा शिविर, पेयजल और विश्राम स्थलों की व्यवस्था,यह सामाजिक समरसता के ढांचे को मजबूती देने का बहुत बड़ा प्रयास है।
इस समरसता का एक और भावनात्मक पक्ष हिंदू-मुसलमान सहभागिता के रूप में दिखाई देता है।बरेली,मेरठ, मुजफ्फरनगर और दिल्ली के कई कस्बों में कांवड़ बनाने का काम पीढ़ियों से मुस्लिम कारीगरों के हाथों में रहा है।बांस को मोड़ना,रंगीन कागज और कपड़े से सजावट करना,घंटियां टांकना,यह हुनर उन परिवारों की जीविका का हिस्सा है,जो साल भर सावन का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं।उम्मीद के इस भाव के साथ कि सावन आए और उनकी कारीगरी शिवभक्तों के कंधे की शोभा बने।यह भारतीय समाज की उस गहरी बुनावट का प्रमाण है,जहां श्रद्धा और आजीविका एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
कांवड़ यात्रा के दौरान समरसता के अन्य बिंदु भी देखने को मिलते हैं।कई कस्बों में मुस्लिम परिवार अपने घरों के बाहर कांवड़ियों के लिए पानी और शरबत की व्यवस्था करते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान उभरने वाली यह सहजता दिखाती है कि आस्था और मानवता सियासी विमर्श से कहीं गहरे स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। फिर भी कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि क्या यह समरसता समाज में स्थायी छाप भी छोड़ जाती है,इसका उत्तर है कि मानव मन स्मृतियों से बनता है और हम अपनी यात्रा के अनुभव नहीं भूलते।यात्रा के अनुभव समाज की सामूहिक चेतना में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं।सामाजिक बदलाव इसी तरह के संचित अनुभवों से आता है,थोड़ा धीमे-धीमे,लेकिन निश्चित रूप से।
आध्यात्मिक नजर से भी देखें तो कांवड़ यात्रा हमें समरसता से ओत-प्रोत करती है।भोलेनाथ समरसता के स्वयं प्रतीक हैं। भोलेनाथ श्मशान में विराजते हैं और कैलाश पर भी,भस्म रमाते हैं और चंद्रमा धारण करते हैं,उनके गले में सर्प है और जटाओं से गंगा प्रवाहित होती है। भोलेनाथ को विरोधाभासों का देवता भी कहा जाता है,वह कल्याण करते हैं और विध्वंस भी।
कांवड़िए जब अपने कलश में गंगाजल भरते हैं,तब उन्हें अहसास होता है कि उनके अंदर की सारी भिन्नताएं जल में समाहित हो रही हैं।इसके बाद शरीर के साथ उनकी आत्मा भी यात्रा करती है।वह आत्मा जो किसी जाति,किसी वर्ग,किसी संप्रदाय को नहीं जानती।
इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा,आर्थिक अवसर,न्यायसंगत नीतियां और निरंतर सामाजिक संवाद,यह सब मिलकर परिवर्तन लाते हैं,लेकिन कांवड़ यात्रा जैसे आयोजन भूमि तैयार करते हैं,जिस पर बड़े सामाजिक परिवर्तन के बीज बोए जा सकते हैं।सीएम योगी कांवड़ यात्रा के लिए जो प्रतिबद्धता दिखते हैं,उनके मूल में यही है।सीएम योगी इसके लिए सारी व्यवस्थाएं पूरी कर एक तरह से गहरा सामाजिक निवेश करते हैं,जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए आधार के रूप में कार्य करेगा।
समरसता एक ऐसा अनुभव है,जिसे जीना पड़ता है,बांटना पड़ता है,कंधे पर उठाना पड़ता है। कांवड़ यात्रा हर साल याद दिलाती है कि विभाजन की रेखाएं इंसान की बनाई हुई हैं, जबकि साझी श्रद्धा,साझी प्यास,साझी थकान और साझा विश्राम ये सब हमारी सामाजिक एकता के प्रमाण हैं।बोल बम की गूंज केवल भोलेनाथ का आह्वान नहीं,बल्कि उस समाज का आह्वान भी है,जो अपने अंदर एकत्व,समरसता और आत्मबोध की चाह रखता है।यह उद्घोष स्मरण कराता है कि भोलेनाथ अंतर्मन में विद्यमान उस चेतना के प्रतीक हैं, जो भेदभाव से उठकर समता,करुणा और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करती है।अहंकार,स्वार्थ और विकारों के परित्याग को प्रेरित करती है।जब मन निर्मल हो,व्यवहार करुणामय हो और जीवन लोक कल्याण के संकल्प से जुड़ जाए,तभी भोलेनाथ की उपासना पूर्ण होती है।यही बोल बम का सनातन संदेश है।