धनंजय सिंह।सिर्फ चीन के सरकारी तंत्र का कोई वफादार ही यह लिख सकता है और शायद इस पर विश्वास भी कर सकता है कि विनिर्माण पर किसी और का एकाधिकार है,लेकिन चीन के वाणिज्य मंत्रालय के अफसरशाह हमें इसी बात पर विश्वास दिलाना चाहते हैं।हाल ही में एक बहुपठित दस्तावेज में उनका तर्क है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने तथाकथित चाइना शॉक (चीन का झटका) 2.0 की बात शुरू कर दी है और चीन के औद्योगिक विकास पर पश्चिमी देशों के एकाधिकार के लिए खतरा पैदा करने का झूठा आरोप लगा रहे हैं।इसका शीर्षक तथाकथित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के मामले में चीन की स्थिति है।
बेशक यह ऐसे समय में कहा जा रहा है जब चीन में वर्षों से किए गए अति निवेश के दुष्परिणामों ने उसका विश्व के बड़े हिस्से के साथ वस्तु व्यापार को लेकर एकतरफा रिश्ता बना दिया है,जिससे पिछले वर्ष चीन का व्यापार अधिशेष रिकॉर्ड 1.2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया।पश्चिम में चाइना शॉक 2.0 को लेकर घबराहट फैलने लगी है।मसलन इस वर्ष की शुरुआत में अमेरिकी फेडरल रिजर्व के तीन प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने इसी विषय पर एक शोध पत्र लिखा था।
बेशक अमेरिका के व्यापारिक साझेदार देशों में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के दावे राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए शुल्क की दूसरी खेप के लिए कुछ मामलों में कानूनी आधार भी हैं,लेकिन इनमें से ज्यादातर दावे गलत हैं।उदाहरण के लिए भारत और बांग्लादेश में औद्योगिक अतिरिक्त क्षमता की समस्या नहीं है,लेकिन चीन के मामले में कम से कम कुछ संवेदनशील क्षेत्रों जैसे इस्पात और सौर पैनलों में ये दावे संभवतः सही हैं।
कुछ क्षेत्रों में चीनी निर्माताओं ने पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक बाजार पर अपना प्रभुत्व बहुत तेजी से बढ़ाया है।कुल मिलाकर 2019 से 2024 के बीच वैश्विक निर्यात में उनकी हिस्सेदारी लगभग 1.5 फीसदी बढ़ी।नोमूरा के अर्थशास्त्रियों की एक रिपोर्ट में पाया गया कि रणनीतिक महत्त्व वाली कुछ विशिष्ट उत्पाद श्रेणियों में वृद्धि विशेष रूप से तेज रही। मसलन,इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का निर्यात 907 फीसदी, बैटरियों का 674 फीसदी और सौर पैनलों का 586 फीसदी बढ़ा।
पहली बार चाइना शॉक शब्दावली मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (एमआईटी) के अर्थशास्त्री डेविड ऑटर और उनके सहलेखकों ने गढ़ी थी। इससे उनका मतलब था कि सस्ते चीनी उत्पादों के आयात से अमेरिका के पश्चिम मध्य के कुछ इलाकों में लगभग 10 लाख नौकरियों का स्थानीय स्तर पर नुकसान हुआ। असल में यह बहुत बड़ी संख्या नहीं थी।
यह अमेरिका में विनिर्माण क्षेत्र में उसके सर्वोच्च स्तर पर गंवाई गई कुल नौकरियों के 10 फीसदी से भी कम थी। इनमें से अधिकांश नौकरियां तकनीकी बदलाव के कारण गई थीं। इसके अलावा कुल रोजगार बाजार पर इसका असर 1 फीसदी से भी कम था और यह उस समय हुआ जब कुल रोजगार में मजबूत वृद्धि हो रही थी,लेकिन इसके विशिष्ट राजनीतिक प्रभाव जरूर पड़े।मुख्यधारा की अमेरिकी राजनीति में व्यापार के खिलाफ प्रतिक्रिया बढ़ी,जिसने ट्रंप के उभार में मदद की। यही कारण है कि इस घटनाक्रम को इतना अधिक महत्त्व मिला।
चाइना शॉक 2.0 कई मायनों में चाइना शॉक 1.0 से अलग दिखाई देता है।अर्थशास्त्री ब्रैड सेटसर ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि पहला चाइना शॉक भौगोलिक दृष्टि से अपेक्षाकृत सीमित था,लेकिन दूसरा चाइना शॉक खासकर ईवी की तेज वृद्धि अमेरिका की तुलना में यूरोप को कहीं अधिक प्रभावित कर सकता है।
2000 के दशक और यहां तक कि 2010 के दशक के शुरुआती वर्षों में चीनी विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें पश्चवर्ती और अग्रगामी एकीकरण यानी उत्पादन की पिछली और अगली कड़ियों का एकीकरण दोनों शामिल थे। इससे विकासशील देशों समेत विभिन्न देशों से कच्चे माल और अन्य कच्चे माल की मांग बढ़ी। इसका नकारात्मक असर भी दिखा है।लौह अयस्क के लिए चीन की भारी मांग ने भारत में अवैध खनन को बढ़ावा दिया जिसने कर्नाटक जैसे राज्यों की राजनीति को वर्षों तक प्रभावित और विकृत किया,लेकिन इस बार चीन में अधिक आत्मनिर्भरता पर जोर देने वाले और विश्व को लेकर अधिक संदेहपूर्ण नेतृत्व ने लगभग सभी महत्त्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं को देश के भीतर लाने की कोशिश की है।कुछ महत्त्वपूर्ण खनिज अपवाद हैं,लेकिन उनके प्रसंस्करण उद्योग पर भी चीन का पहले से ही दबदबा है।
नतीजतन इस बार चीनी औद्योगिक विस्तार का लाभ दूसरे देशों तक पहुंचने वाला नहीं है। नोमूरा के विश्लेषण में मुख्यतः विकासशील देशों समेत 45 देशों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि जिन देशों में चीनी आयात में तेज बढ़ोतरी हुई वहां उनके अपने विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि में भी सबसे तेज गिरावट आई। दूसरे शब्दों में इस बार चाइना शॉक एक वैश्विक घटना है और संभवतः विकसित देशों की तुलना में विकासशील दुनिया के लिए और भी अधिक नुकसानदेह है। इसके अलावा भी कई बड़े अंतर हैं। इस बार चीन जिन उत्पादों में प्रभुत्व हासिल कर रहा है वे अपेक्षाकृत उच्च तकनीक वाले उत्पाद हैं जबकि पहले चाइना शॉक में मुख्य रूप से कम कीमत वाले, निम्न-स्तरीय विनिर्मित उत्पाद शामिल थे।
इनमें से कई उत्पाद रणनीतिक महत्त्व के हैं। उदाहरण के लिए जिस देश का अपना वाहन उद्योग नहीं होता उसके लिए हथियारों का निर्माण करना भी आमतौर पर मुश्किल होता है। इसके अलावा सौर पैनलों के लिए चीन पर निर्भरता को कभी-कभी (शायद गलत तरीके से) खराब ऊर्जा-सुरक्षा नीति के रूप में देखा जाता है। यानी खाड़ी देशों के जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को छोड़कर उससे भी अधिक खतरनाक एक दूसरी निर्भरता यानी चीन पर निर्भरता को अपना लेना।
इसीलिए यह चाइना शॉक पिछली बार के मुकाबले कहीं अधिक अलग और गंभीर भूराजनीतिक चुनौती है। पिछली बार पश्चिम के कुछ हिस्सों में कुछ संगठित श्रमिकों को जो नुकसान हुआ था वह वैश्विक स्तर पर कोई वास्तविक आपात स्थिति नहीं थी। लेकिन इस बार अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के कारण चीन का बढ़ता प्रभुत्व कहीं व्यापक प्रभाव डाल रहा है।
इसके साथ जुड़े राजनीतिक और रणनीतिक संकेत भी बिल्कुल अलग हैं। 2000 के दशक में बहुत से लोग आशावादी थे कि निर्यात के जरिये चीनी उद्योग और निजी क्षेत्र के विस्तार से अंततः सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की शक्ति पर अंकुश लगेगा। व्यापक रूप से यह माना जाता था कि चीन लोकतंत्रीकरण की ओर न सही कम से कम कुछ हद तक राजनीतिक उदारीकरण की राह पर बढ़ रहा है। लेकिन अब हमें एक दूसरी आशंका से जूझना पड़ रहा है।
क्या चीन अपनी आर्थिक ताकत के साथ उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत व्यवस्था यानी अनुदारवाद को भी निर्यात करेगा और इसके साथ उच्च तकनीक पर अपना नियंत्रण भी बढ़ाएगा।
यह आशंका भी है कि चाइना शॉक 2.0 से निपटने और चीन की सफलता की नकल करने के लिए दूसरे देश भी अर्थव्यवस्था और समाज पर कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण की नकल करने लगें। या फिर चीन इन महत्त्वपूर्ण वस्तुओं पर अपने नियंत्रण और आर्थिक ताकत को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करके दुनिया को अपनी शर्तों पर चलाने की कोशिश करे, और उसका इस्तेमाल उदारतापूर्वक नहीं, बल्कि अपने हितों के लिए करे। अगर ऐसा होता है तो दूसरा चाइना शॉक पहले वाले की तुलना में कई गुना अधिक गंभीर साबित हो सकता है।