धनंजय सिंह।उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी में जिस तरह से पार्टी पदाधिकारियों की बैठकें हो रही थीं,उससे लगा कि मायावती इस बार विधानसभा चुनाव में दमखम से मैदान में उतरेंगी।दूसरी तरफ मायावती ने एक बार फिर अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी थी।आकाश ने दो रैलियों में ही उम्मीदों पर खरा उतरते हुए बसपा के कैडर में जान फूंकते नजर आए,लेकिन मायावती ने आकाश को परिपक्व बताकर जिम्मेदारियों से एक बार फिर से हटा दिया है। मायावती के इस फैसले से हर कोई हैरान है।सवाल उठने लगे हैं कि मायावती अब और बसपा को कितने गर्त में ले जाना चाहती हैं।
मायावती के इस रुख ने खड़े किए कई सवाल
आकाश आनंद को लेकर मायावती के इस रुख ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।सवाल ये है कि आखिर मायावती हर बार आकाश आनंद को आगे बढ़ाने के बाद अचानक पीछे क्यों खींच लेती हैं,क्या यह वाकई आकाश आनंद की राजनीतिक अपरिपक्वता है,या फिर बसपा की अंदरूनी सत्ता और नियंत्रण की जंग है।
एकछत्र नियंत्रण बनाए रखने की चाह
सियासी गलियारों में कहा जाता है कि मायावती बसपा में किसी भी अन्य विकल्प या दूसरे शक्ति केंद्र को उभरने नहीं देना चाहती हैं,भले ही वह उनका अपना भतीजा क्यों न हो, सत्ता और संगठन की पूरी कमान मायावती अपने हाथों में रखना चाहती हैं।
आक्रामक बयानों से बसपा को नुकसान का खौफ
आकाश आनंद का अंदाज काफी आक्रामक है।आकाश सीधे भाजपा और सपा पर करारा हमला करते हैं।बसपा के सख्त प्रोटोकॉल और अनुशासित शैली से इतर जाकर दिए गए ऐसे उग्र बयानों से बसपा को कोई बड़ा सियासी या कानूनी नुकसान न हो,मायावती इस बात को लेकर सतर्क हैं।
युवा बनाम पुराना नेतृत्व
बसपा पारंपरिक और सुसुप्त दौर के सियासी रास्ते पर चल रही है,जबकि आकाश आनंद Gen-Z और युवाओं की ऊर्जा के साथ सोशल मीडिया पर केंद्रित सियासत करना चाहते हैं। पुराने और नए दौर की इस सोच का टकराव भी इस फैसले का बड़ा कारण है।
सियासी नफा-नुकसान की गणित
विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि बसपा का रुख कुछ मौकों पर सत्तारूढ़ दल भाजपा के प्रति नरम रहता है। आकाश आनंद के आक्रामक और सीधे हमलों से विरोधी खेमे को फायदा न पहुंचे या बसपा के लिए समीकरण न बिगड़ें, मायावती इस सियासी संतुलन को साधने की कोशिश में हैं।
सख्त अनुशासन का संदेश
मायावती यह साफ संदेश देना चाहती हैं कि बसपा नियमों और अनुशासन से चलने वाली पार्टी है।यहां रिश्तेदारी से ऊपर पार्टी का नियम है और बिना अनुमति या तय लाइन से हटकर बयानबाजी करने पर किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
आकाश आनंद से विशेष प्यार
बसपा के अंदर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मायावती भतीजे आकाश आनंद को कुछ ज्यादा ही प्यार करती हैं, इसलिए वह उन्हें पैंपर करती हैं।वह नहीं चाहती हैं कि उनका लाडला भतीजा कम ही उम्र में अपने भाषणों की वजह से बड़े मुकदमों में फंस जाए।
सियासत में आकाश की हीरो की तरह एंट्री
2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाकर बसपा में लॉन्च किया गया था। आकाश ने भी बसपा का भरोसा रखते हुए दो-चार रैलियों और इंटरव्यू के बाद छाने लगे थे।आक्रामक भाषण शैली से आकाश सोशल मीडिया के रील्स में टॉप कैटेगरी में देखे जाने लगे थे।तभी आकाश ने सत्ताधारी भाजपा से लेकर विपक्षी सपा और कांग्रेस पर बराबर का प्रहार लोगों की भीड़ खींचने लगी थी।बसपा से जुड़े जमीनी नेताओं को भी लगने लगा था कि वाकई उनकी पार्टी को आगे ले जाने वाला नेता आ गया है। 28 अप्रैल 2024 को आकाश ने सीतापुर की जनसभा में सत्ताधारी भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा,जो सरकार अपनी जनता को डराती है,युवाओं को बेरोजगार रखती है और पेपर लीक करवाती है वह आतंकवादी सरकार जैसी है,ऐसी सरकार और उसके प्रतिनिधियों को जूते मारकर सत्ता से बाहर कर देना चाहिए।आकाश के इतना कहते ही उनके खिलाफ अचार संहित उल्लंघन मामले में 153B, 188, 505(2) धाराएं लगाकर भड़काऊ भाषण देने का मुकदमा दर्ज कर हो गया।मुकदमा होते ही मायावती ने बीच चुनाव प्रचार में अपरिपक्व बताकर ना केवल नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद से हटाया बल्कि आकाश की सभी प्रस्तावित रैलियों को रद्द कर दिया। मायावती ने कहा कि आकाश के भाषणों से पार्टी के अनुशासन वाली छवि खराब हो रही है।
2026 में रीलॉन्च हुए आकाश,लेकिन फिर वही बात
बीते माह दिल्ली में जंतर मंतर पर GEN-Z आंदोलन के बाद केंद्र सरकार के बड़े मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होने के बाद तमाम राजनीतिक दल का फोकस युवाओं पर हो गया।खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी GEN-Z को ध्यान में रखकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर आकर अपनी बात रखने लगे। तभी मायावती ने एक बार फिर से अपने भतीजे आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाकर चुनाव प्रचार की कमान संभालने के लिए कहा। 10 अगस्त को हाथरस जिले के सादाबाद में आकाश मंच पर उतरे और 2027 के विधानसभा चुनाव में हाथरस से बसपा के उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया।इसके बाद लगभग 40 मिनट तक भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की नाकामियां गिनाते रहे।भाषण के आखिरी में अखिलेश यादव और राहुल गांधी को अंकल कहकर तंज कसा और लगभग 10 मिनट तक ताबड़तोड़ हमले किए।इसके बाद नोएडा के जेवर की जनसभा में आकाश ने भाषण की शुरुआत से ही सपा और कांग्रेस को निशाने पर लेना शुरू किया।यहां भाषण के आखिरी में भाजपा सरकार को उसी आक्रामक अंदाज में निशाने पर लिया।आकाश के भाषणों को देखकर यही कहा जा रहा था कि इस बार बसपा पूरे दमखम से विधानसभा चुनाव लड़ने का मूड बना चुकी है,लेकिन अब एक बार फिर से मायावती ने आकाश की लगाम खींच ली है।
क्या आकाश का सियासी करियर संकट में
आकाश आनंद ने बहुत कम समय में बसपा के युवाओं और कैडर के बीच अपनी एक खास पहचान बनाई है,जिस दौर में बसपा के पास सतीश चंद्र मिश्रा के अलावा उंगलियों पर गिनने लायक बड़े चेहरे बचे हैं,उस दौर में आकाश एक उम्मीद की किरण बनकर उभरते दिख रहे थे,लेकिन बार-बार झटका मिलने से युवाओं के बीच आकाश का प्रभाव कमजोर हो सकता है।किसी भी 30 वर्षीय युवा नेता के लिए,जो पार्टी को नई दिशा देने की क्षमता रखता हो,उसे अपरिपक्व कहकर बैठकों से बाहर रखना,उसके सियासी भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है।
बसपा के लिए कितना फायदेमंद,कितना नुकसानदायक
सियासी पंडितों का मानना है कि मायावती का यह फैसला बसपा के लिए फायदे से ज्यादा नुकसान का कारण बन सकता है।आज की राजनीति में युवाओं को साथ जोड़े बिना कोई भी दल लंबा सफर तय नहीं कर सकता।आकाश आनंद युवाओं से सीधे जुड़ रहे थे,उन्हें पीछे करने से बसपा का युवा कनेक्ट टूट सकता है।
संगठन में ऊर्जा की कमी
बसपा इस समय ढलान पर है और उसे नए खून,नई ऊर्जा और रैलियों की सख्त जरूरत है।मायावती की पुरानी कार्यशैली बसपा को सुसुप्त अवस्था से बाहर निकालने में नाकाम साबित हो रही है।
बसपा को कहां ले जाना चाहती हैं मायावती
आकाश आनंद को लेकर मायावती की ओर से लिए जा रहे फैसलों के बाद सवाल यही उठ रहे हैं कि वह बसपा को कहां ले जाना चाहती हैं।इस समय उत्तर प्रदेश में बसपा के इकलौते विधायक के निधन के बाद विधानसभा में कोई विधायक नहीं है।लोकसभा में बसपा जीरो है।बसपा की राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता पर संकट है।दूसरे राज्यों में बसपा पदाधिकारियों को मायावती कुछ दिन पहले ही बर्खास्त कर चुकी हैं।मायावती कहीं आती जाती नहीं हैं,अपने घर से ही पार्टी चला रही हैं। चुनावों में भी मायावती की गिनती की रैलियां होती हैं,ऐसा लगता है कि मायावती किसी सेल में चली गई हैं।
मायावती के सामने चंद्रशेखर जैसा दलित नेता हो रहा है खड़ा
मायावती के सामने चंद्रशेखर आजाद जैसा दलित नेता खड़ा हो रहा है।नगीना से सांसद चंद्रशेखर आक्रामक तरीके से दलितों की बात रखते दिखाई दे रहे हैं।चंद्रशेखर दलितों के साथ होने वाली हर घटना में खुद जमीन पर उतरकर शासन और प्रशासन पर दबाव बनाते हुए नजर आते हैं। बीते माह मेरठ में एक दलित छात्रा की हत्या के बाद जब चंद्रशेखर अपनी टीम के साथ धरना दे रहे थे तब मायावती उन्हें ऐसा ना करके कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ने की सलाह देती दिखीं थीं।
तमाम विपक्षी पार्टियों का ये आरोप
तमाम विपक्षी पार्टियां लगातार आरोप लगाती हैं कि 2014 के बाद से मायावती कभी भी भाजपा या उनकी सरकारों के खिलाफ खुलकर नहीं बोलती हैं,वह प्रत्याशियों तक का चयन इस प्रकार करती हैं कि वह भाजपा को लाभ पहुंचाए। मायावती के इन्हीं रवैये से आज यूपी में बसपा से दलित वोटर भी दूर हो गए हैं।लंबे समय तक देखा जाता रहा कि मायावती की पार्टी को सबसे खराब हालत में भी यूपी में 22-23 फीसदी वोट मिलते रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यह आंकड़ा घटकर 10 फीसदी से भी नीचे आ गया है।हैरत की बात यह रही कि 2024 के लोकसभा चुनाव में दलितों ने शायद पहली बार सपा के उम्मीदवार को इतनी संख्या में वोट दिया होगा।यानी अब दलितों में केवल जाटव समाज ही मायावती को अपना नेता मान रहा है।मायावती खुद इसी जाति से आती हैं।अगर यही हालत रही तो हो सकता है कि जाटव भी किसी और नेता में अपना नेतृत्व तलाशने को मजबूर हो।