धनंजय सिंह।आज के दौर में पत्नी से ज्यादा मोबाइल जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।मगर एक परेशानी आज भी बनी हुई है।शहरों से दूर निकलते ही कई जगह मोबाइल का नेटवर्क गायब हो जाता है।पहाड़ों,जंगलों,समुद्र या दूर-दराज के इलाकों में यह समस्या और ज्यादा होती है,लेकिन आने वाले समय में मोबाइल नेटवर्क के लिए हर जगह टावर की जरूरत शायद न पड़े। आपका फोन सीधे अंतरिक्ष में घूम रहे सैटेलाइट से जुड़ सकता है।
सैटेलाइट कम्युनिकेशन तेजी से बदल रहा है।अब कंपनियां ऐसे नेटवर्क पर काम कर रही हैं,जिनके जरिए अंतरिक्ष से सीधे मोबाइल फोन तक कनेक्टिविटी पहुंचाई जा सके। इसे डायरेक्ट-टू-सेल यानी डीटीसी कहा जाता है।
अभी आपका मोबाइल आसपास मौजूद मोबाइल टावर से जुड़ता है।टावर से दूर जाने या ऐसी जगह पहुंचने पर जहां टावर नहीं है,नेटवर्क कमजोर हो जाता है या पूरी तरह गायब हो जाता है।डीटीसी में इस कमी को सैटेलाइट पूरा कर सकता है।सैटेलाइट मोबाइल कंपनियों के साथ मिलकर उन इलाकों में भी कनेक्टिविटी पहुंचा सकते हैं,जहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है।
इसका सबसे बड़ा फायदा दूर-दराज के इलाकों में हो सकता है।पहाड़,जंगल,समुद्र या ऐसी जगह,जहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल या बहुत महंगा है,वहां सैटेलाइट एक नया विकल्प बन सकता है।
यही इस तकनीक की सबसे दिलचस्प बात है।सैटेलाइट इंटरनेट के लिए आम तौर पर अलग टर्मिनल या डिश जैसे उपकरण की जरूरत पड़ती है।ऐसे टर्मिनल की कीमत आम तौर पर 200 से 600 डॉलर तक हो सकती है।
इसके उलट डीटीसी कंपनियां मौजूदा मोबाइल ऑपरेटरों के साथ साझेदारी कर सकती हैं। इससे उन्हें मोबाइल ऑपरेटर के पहले से मौजूद ग्राहकों तक पहुंच मिल सकती है और ग्राहक को अलग सैटेलाइट इंटरनेट उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सैटेलाइट नेटवर्क जमीन पर मौजूद मोबाइल नेटवर्क की जगह लेने के बजाय उसे मजबूत कर सकता है,जहां सामान्य नेटवर्क उपलब्ध है,वहां मोबाइल टावर काम करेंगे और जहां नेटवर्क नहीं पहुंचता,वहां सैटेलाइट कनेक्टिविटी मदद कर सकती है।
शुरुआत में इसका इस्तेमाल कम डेटा वाले कामों और दूर-दराज के इलाकों में हो सकता है,लेकिन आगे चलकर इसकी क्षमता बढ़ने पर ज्यादा डेटा वाली सेवाएं भी संभव हो सकती हैं और यह सामान्य मोबाइल नेटवर्क के साथ मिलकर काम कर सकता है।
सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मोबाइल कवरेज का दायरा बढ़ सकता है।सफर के दौरान ऐसी जगह जहां मोबाइल टावर नहीं हैं, वहां भी संपर्क बनाए रखना आसान हो सकता है।
आपदा के समय भी यह तकनीक बेहद काम की हो सकती है। बाढ़,भूकंप या तूफान में जमीन पर मौजूद मोबाइल नेटवर्क खराब हो जाए तो सैटेलाइट के जरिए बैकअप कनेक्टिविटी दी जा सकती है।
आगे सैटेलाइट कम्युनिकेशन का इस्तेमाल मोबाइल कनेक्टिविटी के अलावा हवाई जहाज और जहाजों में इंटरनेट, आपात सेवाओं,ऑटोमेटिक वाहनों,टेलीमेडिसिन,स्मार्ट शहरों और मशीनों के बीच संपर्क जैसी सेवाओं में भी बढ़ सकता है।
यह बदलाव केवल मोबाइल ग्राहकों के लिए नहीं,बल्कि टेलीकॉम और अंतरिक्ष से जुड़ी कंपनियों के लिए भी बड़ा कारोबारी मौका बन सकता है।कमर्शियल स्पेस रेवेन्यू का करीब 65 फीसदी हिस्सा पहले ही सैटेलाइट कम्युनिकेशन से आता है।
सैटेलाइट नेटवर्क घने होने और उनकी क्षमता बढ़ने के साथ अंतरिक्ष से मिलने वाली कनेक्टिविटी धीरे-धीरे हमारी डिजिटल व्यवस्था का हिस्सा बन सकती है।इसे केवल फाइबर,मोबाइल नेटवर्क या समुद्र के नीचे बिछी केबल का विकल्प नहीं मानती,इसके बजाय यह एक नई कनेक्टिविटी परत बन सकती है,जो उन जगहों तक नेटवर्क पहुंचाएगी जहां मौजूदा व्यवस्था नहीं पहुंच पाती।
यानी भविष्य में फोन में नेटवर्क खोजने के लिए केवल नजदीकी मोबाइल टावर पर निर्भरता कम हो सकती है। जमीन पर टावर का नेटवर्क खत्म हुआ तो अंतरिक्ष में घूमता सैटेलाइट कनेक्टिविटी संभाल सकता है। अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो मोबाइल नेटवर्क की दुनिया में यह बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।