भारत,रूस और चीन एक हो जाए तो,बदल जाएगी दुनिया,समझिए ब्रिक्स की ताकत
भारत,रूस और चीन एक हो जाए तो,बदल जाएगी दुनिया,समझिए ब्रिक्स की ताकत

12 Sep 2026 |   28



 

धनंजय सिंह।भारत,चीन और रूस आर्थिक तौर पर एकजुट हो जाएं तो विश्व में अर्थव्यवस्था का संतुलन रातों-रात बदल सकता है।ब्रिक्स एक ऐसा मंच है,इसके जरिये भारत,चीन और रूस के रिश्तों में मजबूती आ सकती है।अगर ये तीनों महाशक्तियां पूरी तरह से एकजुट हो जाती हैं तो यह अमेरिकी वर्चस्व और डॉलर के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी।

मौजूदा समय में भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है,वहीं चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग का हब बन चुका है।रूस ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का केंद्र है। भारत,चीन और रूस मिलकर वैश्विक जीडीपी का 30 फीसदी से अधिक और विश्व की आबादी का लगभग 40 फीसदी हिस्सा संभालते हैं।

अगर भारत, चीन और रूस एकजुट हो जाते हैं,तो अमेरिकी डॉलर के विकल्प को तलाशना थोड़ा आसान हो जाएगा, इससे स्थानीय मुद्राओं या ब्रिक्स करेंसी में व्यापार को धीरे-धीरे करके बढ़ाया जा सकता है।फिर अमेरिकी मौद्रिक नीति का प्रभाव कमजोर पड़ जाएगा।अमेरिका और पश्चिमी देशों का आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाला हथियार निष्प्रभावी हो जाएगा।

लद्दाख सीमा पर तनाव और आपसी प्रतिस्पर्द्धा के कारण भारत और चीन के बीच सुरक्षा व कूटनीतिक स्तर पर गहरा अविश्वास है।भारत किसी ऐसे ब्लॉक का हिस्सा नहीं बनना चाहता है,जिसका नेतृत्व चीन के हाथों में पूरी तरह चला जाए,क्योंकि चीन और रूस जहां स्पष्ट रूप से अमेरिका-विरोधी एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहते हैं वहीं भारत गैर-पश्चिमी नीति पर चलता है।भारत का अमेरिका,यूरोप और जापान के साथ बेहद मजबूत व्यापारिक और तकनीकी रिश्ते हैं,जिन्हें भारत रूस या चीन के लिए दांव पर नहीं लगाएगा।

बता दें कि शुरुआती दौर में ब्रिक्स को चीन और रूस के प्रभुत्व वाला मंच माना जाता था,लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत इस ग्रुप का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन-केंद्र बन गया है।चीन और रूस शुरुआत में ब्रिक्स को अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ एक अमेरिका-विरोधी मंच बनाना चाहते थे। भारत ने मजबूती से रुख अपनाया कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं,बल्कि गैर-पश्चिमी मंच होना चाहिए।भारत के इस रुख का समर्थन ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे सदस्यों ने भी किया।

इसके अलावा चीन,भारत और रूस का अमेरिका के खिलाफ एक एकीकृत सैन्य या ब्लॉक-स्तरीय गठजोड़ बनना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।भारत ब्रिक्स में रहते हुए भी अमेरिका के साथ संतुलन बनाए रखेगा, ताकि कोई भी एक महाशक्ति वैश्विक व्यवस्था पर अपना एकाधिकार न जमा सके।

ब्रिक्स बैंक के गठन में भारत की अहम भूमिका रही और इसके पहले अध्यक्ष भारत के केवी कामथ बनाए गए थे। भारत ने ब्रिक्स के मंच पर अपने डिजिटल मॉडल जैसे कि UPI, Aadhaar, DigiLocker को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दिया,जिससे विकासशील देश भारत के तकनीकी समाधानों को अपनाने के लिए उसकी ओर देख रहे हैं।

भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। ब्रिक्स के भीतर भारत का आर्थिक और आर्थिक-नीतिगत वजन चीन के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए सबसे मजबूत आधार प्रदान करता है। ब्रिक्स के विस्तार के समय भारत ने यह सुनिश्चित किया कि केवल उन्हीं देशों को एंट्री मिले जो गुटनिरपेक्षता और वैश्विक संतुलन में विश्वास रखते हों,ताकि यह मंच किसी एक देश का मोहरा न बने।

इंडोनेशिया का ब्रिक्स में शामिल होना संगठन के विस्तार की रणनीति का हिस्सा है। ब्रिक्स के 2023 जोहान्सबर्ग सम्मेलन के दौरान ही इंडोनेशिया के नाम पर सहमति बनी थी।हालांकि अपनी घरेलू चुनावी प्रक्रियाओं के कारण इंडोनेशिया ने औपचारिक रूप से 2025 की शुरुआत में इसमें अपनी पूर्ण सदस्यता दर्ज कराई।इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

अमेरिका ब्रिक्स के जरिए चीन के बढ़ते वैश्विक आर्थिक दबदबे से चिंतित है,जबकि भारत खुद ब्रिक्स के भीतर चीन के एकाधिकार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है। अमेरिका चाहता है कि भारत ब्रिक्स की अमेरिका-विरोधी नीतियों पर अंकुश लगाए। वहीं ब्रिक्स के सदस्य भारत के आर्थिक वजन का लाभ उठाना चाहते हैं।

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