किताब पढ़ने से ज्यादा सुनना पसंद कर रहे लोग,हिंदी प्रकाशकों के लिए ऑडियोबुक बना नया डिजिटल हथियार
किताब पढ़ने से ज्यादा सुनना पसंद कर रहे लोग,हिंदी प्रकाशकों के लिए ऑडियोबुक बना नया डिजिटल हथियार

15 Sep 2026 |   44



 

 धनंजय सिंह।किताबों और हिंदी किताबों की विश्व में पिछले कुछ सालों से खामोशी से एक बदलाव आकार ले रहा है।हिंदी के बड़े प्रकाशकों ने अपनी पुरानी किताबों को ई-बुक में बदलने का सिलसिला शुरू कर दिया है।हिंदी के प्रकाशक अपनी पुस्तकों के ई-बुक संस्करण निकाल रहे हैं,नई किताबों को भी किंडल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ला रहे हैं। अपनी वेबसाइट के जरिये तो ई-बुक की पेशकश कर ही रहे हैं,ऑडियोबुक के लिए उन्होंने ओटीटी ऑडियो प्लेटफार्मों के साथ साझेदारी भी शुरू की है।हालांकि यह तस्वीर एकदम गुलाबी भी नहीं है।

दरअसल यह बदलाव इतना बड़ा नहीं है कि हिंदी की पारंपरिक किताबों को प्रिंट से प्रतिस्थापित कर सके,लेकिन उसका इतना महत्त्व जरूर है कि वह नए पाठकों तक पहुंच बनाने और पुराने कैटलॉग को नए स्वरूप में मुद्रीकृत करने में नजर आता है।

भारत के पुस्तक बाजार में इस बदलाव की गुंजाइश बड़ी है। हिंदी में डिजिटल प्रकाशन का बुनियादी ढांचा अभी तैयार हो रहा है और डिजिटल किताबों की खपत का स्वतंत्र और विश्वसनीय आंकड़ा अभी सामने आना बाकी है।

हिंदी में डिजिटल पुस्तकों के प्रति रुचि बढ़ रही है और इस विस्तार में ऑडियोबुक की भूमिका अधिक प्रमुख है।पढ़ने के लिए पाठकों का झुकाव अब भी पेपरबैक की ओर है,जबकि डिजिटल माध्यम पर वे पुस्तकों को सुनना अधिक पसंद कर रहे हैं। ई-बुक की तुलना में ऑडियोबुक की मांग अधिक है।

विशेष रूप से कहानी,उपन्यास और कविता के ऑडियो संस्करणों के प्रति अच्छी रुचि दिखाई दे रही है।इसी रुचि को ध्यान में रखते हुए ऑडियोबुक संग्रह का विस्तार हो रहा है।श्रोता के रूप में पाठक अब भी सबस्क्रिप्शन नहीं ले रहे। विश्व में हर उस कला के लिए जब हम खर्च करते हैं जो हमें संतोष और सुख देती है तो फिर हम साहित्य के लिए ऐसा क्यों नहीं करना चाहते।

डिजिटल क्षेत्र में ई-बुक की तुलना मे ऑडियोबुक की मांग ज्यादा है और उनका प्रकाशन इसे ध्यान में रखते हुए अपने ऑडियोबुक शीर्षकों का विस्तार कर रहा है।वाणी प्रकाशन के पास वाणी,भारतीय ज्ञानपीठ और यात्रा बुक के रूप 10,000 से अधिक पुस्तकों का समृद्ध भंडार है।हर पुस्तक का ई-बुक संस्करण निकालते हैं और पाठकों को विकल्प देते हैं कि वे अपनी पसंद के तरीके से पुस्तक पढ़ सकें।

देश के एक अन्य प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह प्रभात प्रकाशन के पास कुल 8,000 से अधिक प्रिंट टाइटल और 20,000 से अधिक ई-बुक का संग्रह उपलब्ध है।डिजिटल प्रकाशनों का कैटलॉग लगातार मजबूत हो रहा है।ई-बुक और ऑडियो बुक की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है। यह वृद्धि अभी बहुत आक्रामक नहीं है,लेकिन पाठकों की बदलती आदतों को देखते हुए डिजिटल फॉर्मेट की मांग लगातार बढ़ रही है।

वर्तमान में प्रभात प्रकाशन में मुद्रित किताबों और ई-बुक की बिक्री का अनुपात लगभग 3:1 है। यानी प्रिंट बुक अभी भी बिक्री का प्रमुख माध्यम हैं,लेकिन डिजिटल की हिस्सेदारी महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ रही है।प्रभात प्रकाशन अपनी किताबों के ई-बुक और किंडल संस्करण को लेकर बहुत सक्रियता से काम कर रहा है।

डिजिटल फॉर्मेट में क्लासिक किताबें और फिक्शन श्रेणी की किताबें अधिक बिक रही हैं।केवल किताबों को डिजिटल करना नहीं बल्कि हरसंभव माध्यम से पाठकों तक पहुंचना है और इसमें डिजिटल किताबें बहुत प्रभावी साबित हो रही हैं। प्रिंट और डिजिटल प्रकाशन एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि पूरक माध्यम हैं।

देश में ई-बुक और ऑडियो बुक बाजार अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका है। आनुपातिक रूप से देखें तो अगर 10 साल पहले हम ई-बुक से 4 लाख रुपये सालाना राजस्व कमा रहे थे तो 2026 में भी वह वहीं ठहरा हुआ है,जबकि हमारी मुद्रित किताबों का बाजार इस बीच करीब 50 गुना बढ़ गया है। मुद्रित और ई-बुक का बिक्री अनुपात प्राय: 10 और 1 का है। यानी प्रिंट की 10 किताबों की तुलना में उनका प्रकाशन एक ही ई-बुक बेच पाता है।

शुरुआत में जहां हिंदयुग्म अपनी प्रत्येक किताब का ई-बुक संस्करण ला रहा था,वहीं अब इस प्रक्रिया को धीमा किया गया है।किताबों का किंडल संस्करण भी काफी अंतराल के बाद आते हैं,क्योंकि किंडल और ई-बुक के आने के बाद पायरेसी का खतरा बहुत बढ़ जाता है। किंडल पर आते ही किताब की पायरेटेड ई-बुक टेलीग्राम और अन्य माध्यमों से तुरंत प्रसारित होने लगती है।ऑडिबल और स्टोरीटेल जैसे विदेशी उपक्रमों ने भी भारतीय बाजार में शुरू में बहुत उत्साह दिखाया था,लेकिन समय के साथ अपेक्षित राजस्व नहीं मिलने से उनका उत्साह ठंडा हो गया।

देश में डिजिटल प्रकाशनों की बात नॉटनल के बिना पूरी नहीं होगी। यह एक ऑनलाइन ई-बुक प्लेटफॉर्म है जहां बहुत बड़ी संख्या में पारंपरिक किताबों की ई-बुक और मूल ई-बुक दोनों मिलती हैं।नॉटनल की वेबसाइट और उसके ऐप पर नॉन फिक्शन किताबों को लेकर पाठक अधिक रुचि दिखा रहे हैं। इसमें राजनीति से जुड़ी किताबें,खेल से जुड़ी किताबें आदि शामिल हैं।नॉटनल के पाठक पत्रिकाओं को पढ़ने में सबसे अधिक रुचि रखते हैं।सभी पत्रिकाओं के एकल प्लेटफॉर्म के रूप में नॉटनल ने पढ़ने को बहुत सुविधाजनक बनाया है।

किताबों की बढ़ती बिक्री में ऑनलाइन सेल और ऑनलाइन माध्यमों खासकर इंस्टाग्राम पर किया जाने वाला प्रचार और किताबों की रील आदि की अहम भूमिका है।ऑनलाइन सेल के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि किताब खरीदने वालों में युवाओं यानी 20 वर्ष और उससे कुछ अधिक उम्र के लोगों की संख्या अधिक है। ऐसे अधिकांश लोग इंस्टाग्राम के यूजर भी हैं। वहीं 40 से अधिक आयु के लोगों का आंकड़ा देखकर तो यही लगता है कि उनकी पढ़ने की आदत छूटती जा रही है।

नॉटनल भी सोशल मीडिया,फेसबुक और इंस्टाग्राम रील और पोस्ट के जरिये और ट्विटर आदि के माध्यम से अपनी किताबों का प्रचार कर रहा है।औसतन हर रोज पांच-छह किताबों की रील और स्टोरी डाली जाती हैं। वे पुरानी किताबों को सहेजने और नई किताबों के नाम सुझाने का काम भी करते हैं। न्यूजलेटर के माध्यम से भी पाठकों को पढ़ने की नई चीजों से जोड़ा जा रहा है।

भारतीय पुस्तक प्रकाशन उद्योग के डिजिटल और भारतीय भाषाओं के बाजार को लेकर पहली बार व्यापक स्तर पर आंकड़े जुटाने का प्रयास किया गया है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स (एफआईपी) ने नील्सनआईक्यू बुकडेटा के सहयोग से इंडिया बुक मार्केट रिपोर्ट 2026-2030 तैयार की है। इस रिपोर्ट में प्रिंट के साथ ई-बुक और ऑडियोबुक के रुझानों का अध्ययन किया गया है। 2030 तक भारत में पुस्तक प्रकाशन बाजार 2 लाख करोड़ रुपये का हो सकता है। हालांकि इन आंकड़ों में हिंदी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाएं भी शामिल हैं और हिंदी में भी पाठ्य पुस्तकों और अन्य शैक्षणिक सामग्री भी अच्छी खासी मात्रा में हैं।

इसमें एआई, डिजिटलीकरण,नए वितरण मॉडल और भारतीय भाषा के बाजारों के विकास को 2030 तक प्रकाशन उद्योग को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया गया है। कुल मिलाकर भारतीय और खासकर हिंदी प्रकाशन जगत प्रिंट पुस्तकों पर भरोसा करने के साथ ही भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपनी डिजिटल छाप भी मजबूत कर रहा है।

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