धनंजय सिंह।पैंतीस वर्ष पहले हर रविवार शाम को लोग दूरदर्शन पर हिंदी फिल्म का बेसब्री से इंतजार करते थे।गुरुवार को छायागीत आता था। फिर करमचंद या इधर उधर जैसे कार्यक्रम प्रसारित हुआ करते थे। बड़े पर्दे पर फिल्में देखना एक खास अनुभव होता था।
लोग की सुबह पेपर के साथ शुरू होती थी।ब्रांड और भाषाएं भले ही अलग-अलग हों,लेकिन उस समय भारत के मध्यमवर्गीय घरों में मीडिया का यही हाल था।टेलीफोन या लैंडलाइन मिलना मुश्किल था।इंटरनेट,सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग या निजी टेलीविजन चैनल जैसी कोई सुविधा नहीं थी।जनवरी 1991 में सीएनएन और खाड़ी युद्ध के प्रसारण के साथ यह सब बदल गया और ये भारतीय घरों तक पहुंचने लगे।
जुलाई 1991 में भारत की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ और अगस्त 1991 में स्टार टीवी,या सैटेलाइट टेलीविजन एशियन रीजन ने स्टार प्लस,प्राइम स्पोर्ट्स,बीबीसी न्यूज और एमटीवी के साथ अंग्रेजी में अपनी सेवाएं शुरू कीं। अर्थव्यवस्था और उसके साथ-साथ मीडिया का खुला दौर शुरू हो चुका था।भारत में अब 900 से अधिक टीवी चैनल, हजारों समाचार पत्र और 860 से अधिक रेडियो चैनल हैं।
भारत में एक वर्ष में 1,600 से अधिक फिल्में बनाती हैं। कुल 9,000 स्क्रीन में से 4,000 मल्टीप्लेक्स में हैं।स्ट्रीमिंग को लोकप्रिय हुए एक दशक से अधिक समय हो गया है और शॉर्ट वीडियो को आए छह वर्ष हो गए हैं। 60 से अधिक वीडियो ऐप और एक दर्जन संगीत ऐप मौजूद हैं।
वर्ष 1991 में मीडिया और मनोरंजन व्यवसाय के आकार के आंकड़े स्पष्ट नहीं हैं।मोटे अनुमानों के मुताबिक यह लगभग 2,000 करोड़ रुपये का था। उस समय यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.3 फीसदी था। सहस्राब्दी की शुरुआत में इसका योगदान 0.2 फीसदी से भी कम था,हालांकि इसका आधार बढ़ रहा था। वर्ष 1990 के दशक के अंत में आई तकनीकी उछाल (जो वाई2के बूम के बाद ही उभरा था) की बदौलत सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र का योगदान 1.2 फीसदी था। उम्मीद थी कि मीडिया भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वही भूमिका निभाएगी जो आईटी निभा रहा था।
पिछले साल भारत की जीडीपी में आईटी का योगदान 7.3 फीसदी था,जबकि मीडिया और मनोरंजन का योगदान मात्र 0.8 फीसदी था। अमेरिका के लिए यह आंकड़ा 7 फीसदी और चीन के लिए 4.6 फीसदी है।ये भारत की तुलना में कहीं अधिक बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं,इसलिए वास्तविक आंकड़े बहुत बड़े हैं।चीन का मीडिया और मनोरंजन कारोबार भारत से लगभग तीन गुना बड़ा है।
32 अरब डॉलर के राजस्व के साथ भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का आकार बेहद छोटा है। यह वॉल्ट डिज्नी कंपनी के आकार का लगभग एक तिहाई या टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के लगभग बराबर है। देश में लगभग 70 करोड़ स्मार्टफोन उपयोगकर्ता, 65 करोड़ टेलीविजन दर्शक और 42.1 करोड़ अखबार पाठक हैं।
इनमें से किसी भी क्षेत्र की कंपनियों का आकार भारतीय मानकों के अनुरूप भी नहीं है,वैश्विक मानकों की तो बात ही छोड़ दें।भारत में केवल दो ही बड़ी मीडिया कंपनियां हैं-जियोस्टार और गूगल इंडिया-दोनों का कुल राजस्व लगभग 4 अरब डॉलर है। एक ऐसे देश के लिए जहां लोग बातचीत और बहस करना पसंद करते हैं, कोई भी समाचार ब्रांड ऐसा नहीं है,जिसने अन्य देशों में लोकप्रियता हासिल की हो। सिनेमाघरों,टीवी या स्ट्रीमिंग पर जो कुछ भी देखा जाता है, उसका 90 फीसदी भारतीय कहानियां होती हैं।फिर भी भारत से कोई भी वैश्विक मनोरंजन कंपनी नहीं है जो काफी बड़ी हो।
हमारी पूरी क्षमता तक न पहुंचने के दो स्पष्ट कारण हैं।पहला अनियमित नियमन। सिनेमा उद्योग को दर्जा देने के फैसले (2000) से अनियमित पूंजी का सफाया हुआ। इसके साथ ही मल्टीप्लेक्सों को दी गई कर छूट ने एक दशक में इस व्यवसाय को 300 फीसदी तक बढ़ाने में मदद की।ये बहुत अच्छे कदम थे। इसके विपरीत टीवी चैनलों की कीमतों को नियंत्रित करने के फैसले (2004) से भारत का सबसे बड़ा माध्यम रचनात्मक और व्यावसायिक रूप से पिछड़ा ही रह गया।
दूसरा कारण भारतीय कंपनियां स्वयं हैं।शुरुआत में आईटी उद्योग ने नियामकों,उपभोक्ताओं और अन्य हितधारकों के समक्ष इस क्षेत्र की बात रखने के लिए नैसकॉम का गठन किया।मीडिया और मनोरंजन के लिए ऐसा कोई एकल निकाय नहीं है।उत्तर बनाम दक्षिण,विदेशी बनाम भारतीय,हिंदी बनाम गैर-हिंदी,प्रसारकों,प्रकाशकों या स्ट्रीमिंग प्रदाताओं को संचालित करने वाले विभाजन अधिकांश लॉबिइंग प्रयासों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
सच तो यह है कि हर नया थिएटर,टेलीविजन चैनल या वेबसाइट रोजगार पैदा करता है,कर राजस्व उत्पन्न करता है और पर्यटन,होटल और एयरलाइंस पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।हालांकि इस बात पर कोई व्यापक विचार नहीं किया गया है कि इस उद्योग द्वारा उत्पन्न 1.2 करोड़ नौकरियों को, उदाहरण के लिए,सिनेमाघरों के खुलने को बुनियादी ढांचे के रूप में मानकर कैसे बढ़ाया जा सकता है।
इन दो चीजों के बिना रचनात्मक उद्योगों में वैश्विक शक्ति बनने की हमारी कोई भी संभावना खत्म हो जाएगी।स्पेशल इफेक्ट्स या अन्य सभी तरह के बैकएंड काम से यह संभव नहीं होगा। इसके लिए पहले घरेलू बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी।भारतीय सिनेमा की वैश्विक स्तर पर सॉफ्ट पावर की चर्चा होती है,लेकिन हॉलीवुड या कोरिया की तुलना में वैश्विक बाजार में हमारी उपस्थिति नगण्य है। भारतीय फिल्म उद्योग वर्षों से घरेलू राजस्व में 1.5-2 अरब डॉलर पर अटका हुआ है।
भारतीय स्टूडियो के पास वैश्विक स्तर पर फिल्में रिलीज करने के लिए पर्याप्त धन या वितरण क्षमता नहीं है। घरेलू बाजार का राजस्व 10 अरब डॉलर या उससे अधिक होने पर ही भारतीय स्टूडियो वैश्विक स्तर पर जाने की क्षमता और इच्छाशक्ति जुटा पाएंगे। इसी तरह, जब पूरा मीडिया और मनोरंजन उद्योग राजस्व में 100 अरब डॉलर या उससे अधिक राजस्व का आंकड़ा छू लेगा और कम से कम एक अरब उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा, तभी यह सही मायने में भारत का प्रतिनिधित्व कर पाएगा।