धनंजय सिंह।मीडिया में खूब शोर मचा कि 2023 के जी20 के बाद विश्व के नेताओं का सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मेलन फिर से नई दिल्ली में हो रहा है इस बार उनके जोश में भी एक अतिरिक्त तड़का रहा।
बढ़ा-चढ़ा कर बनाई गई तस्वीरें दिखीं, जिनमें चमकीले रंगों वाले बैकग्राउंड।युद्ध में बजते नगाड़ों के साथ नरेंद्र मोदी,शी चिनफिंग और व्लादीमिर पुतिन एक साथ नजर आए।संदेश लगभग साफ था कि यह त्रिमूर्ति पूरे पश्चिम के खिलाफ हाथ में हाथ डाल चुकी है।या इसे सीधे डॉनल्ड ट्रंप को हैसियत बताने के रूप में समझें।सभी सरकारें खासकर ताकतवर नेताओं वाली,छवि बनाने के लिए ऐसे सम्मेलनों का इस्तेमाल करती हैं।
तीन ताकतवर नेता आपस में अधिक विरोधाभास साझा करते हैं,सामंजस्य नहीं।हर एक की दुनिया देखने की अलग नजर है, और प्रत्येक का विरोध भी अलग है।एक (रूस) दूसरे का सहयोगी है और किसी हद तक निर्भर भी है।दूसरा (भारत) तीसरे को अस्तित्वगत विरोधी मानता है। और तीसरा अन्य दोनों को इतना कमजोर देखता है कि वह खेल के नियम तय कर सकता है तथा पहला,दूसरा और तीसरा अंपायर भी बन सकता है।कड़वा तथ्य ये है कि ऐसी सभी समूहों में,ब्रिक्स सबसे अप्रासंगिक है।हम जानते हैं कि नाटो किसके लिए है, या कम से कम होना चाहिए। आप अन्य समूहों की भी गिनती कर सकते हैं।
शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ब्रिक्स के सबसे करीब है,लेकिन वहां चीनी प्रभुत्व लगभग औपचारिक है। एससीओ चीन का बहुपक्षीय संगठन है।इसलिए हम कहते हैं कि एससीओ का भी कोई न कोई मकसद है,चाहे हमें पसंद आए या नहीं। यहां तक कि कुछ महत्त्वहीन संगठनों जैसे 57 देशों वाले ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन), में कम से कम एक जुड़ाव का तत्व इस्लाम तो है।
ब्रिक्स के सदस्यों में साझा क्या है,क्या यह डॉनल्ड ट्रंप या अमेरिका के खिलाफ एक साझा मोर्चा है,बिल्कुल नहीं।पुतिन और ट्रंप एक-दूसरे की प्रशंसा करने वाले हैं।शी जिनपिंग जल्दी ही अमेरिका में होंगे,अपने संबंधों की किचकिच को दूर करने के लिए।शी ने ट्रंप को इस बात के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की है कि वह अपनी रणनीतिक बदलाव की प्रक्रिया अंदर तक ही सीमित रखें।पहले और आख़िर तक अमेरिका पर ही ध्यान रखें। ताइवान को भूल जाइए।
आइए कुछ विरोधाभास और परस्पर संबंधों की सूची बनाएं। शी के लिए,ट्रंप सबसे बड़ी खबर हैं। ट्रंप अमेरिका के गठबंधनों को कमजोर कर रहे हैं। इन देशों में से कुछ चीन की ओर मुड़ सकते हैं ताकि खतरे का स्तर कम हो सके। तो चीन रियायतें लेगा।अन्य कमजोर और छोटे देश,खासकर वे जिनकी परिकल्पना (केवल भारत में, इतनी संवेदनशील रूप से) ग्लोबल साउथ के रूप में की जाती है, पहले ही चीन को नया प्रधान समझने लगे हैं और उसको सलाम ठोक रहे हैं। कम से कम शी को सार्वजनिक रूप से किसी तरह अपमानित नहीं करेंगे जैसे ट्रंप करते हैं।
शी के लिए रूस एक विशाल देश है,जिसके साथ उनकी सीमा साझा है,जिसमें दुनिया के सबसे ज्यादा नाभिकीय हथियार हैं,पाइपलाइन ऊर्जा का सुरक्षित स्रोत है और सामरिक परिसंपत्ति है।भारत बिल्कुल अलग श्रेणी में आता है। उसके लिए सीमा का मुद्दा और स्थायी सैन्यकरण है। भारत को व्यापार बढ़ाने के लिए स्थिरता की जरूरत है और जैसा कि हम जानते हैं, भारत-चीन व्यापार एकतरफा है।
इस समय 112 अरब डॉलर के स्तर पर।भारत चीनी व्यापार अधिशेष में केवल 10 फीसदी से थोड़ा अधिक योगदान देता है।अमेरिका के साथ अधिशेष घट रहा है,जिससे शी विकल्प चाहते हैं।चाहे चीन को पसंद हो या न हो,भारत ने इस मौके का फायदा उठाया है। अब अपनी जनसांख्यिकीय समस्या और घटती घरेलू मांग के साथ चीन को उन व्यापार अधिशेषों की और भी ज्यादा जरूरत है। यही वजह है कि शी ने भारत के साथ सीमा पर एक विराम लिया है।
शी की तरह पुतिन भी नाटो के कमजोर होने पर खुश होते हैं। पुतिन या तो सोचते हैं कि यूक्रेन पर कोई समझौता हो जाएगा और वह विजय का ऐलान करेंगे,या लड़ाई जारी रखेंगे,क्योंकि अमेरिका की यूक्रेन को मदद कम हो रही है और यूरोप भी असहज है।संक्षेप में ना तो शी दुनिया को अमेरिका के खिलाफ एकजुट कर रहे हैं और ना ही पुतिन ऐसी किसी मुहिम में शामिल हो रहे हैं।
शी के विपरीत पुतिन को भारत के साथ कोई परेशानी नहीं है।हालांकि पुतिन की पहली प्राथमिकता शी से अलग नहीं है। एकतरफा व्यापार संबंध।भारत,रूस से चीन के अलावा किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा तेल खरीदने के लिए तैयार है। भारत अब भी रूसी हथियारों का सबसे बड़ा मौजूदा और संभावित खरीदार बना हुआ है, खासकर अगर प्रतिबंध हटा लिए जाते हैं।
तेल की मदद से रूस भारत के साथ लगभग 45 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष भी रखता है। हालांकि रूस अपेक्षाकृत सौम्य व्यापारिक भागीदार है और कुछ रक्षा तकनीकें देने को तैयार है जो कि कोई अन्य नहीं देगा। इसके अलावा अगर आप सोचते हैं कि पुतिन भारत को रूस या चीन के बराबर समझते हैं, तो आप गलत हो सकते हैं।
ये समीकरण इस ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि बनाते हैं।भारत यहां सबसे मजबूत पक्ष नहीं है,चाहे उसकी मेहमाननवाजी कितनी भी शानदार क्यों न हो। आज भारत चीन और रूस का आधुनिक व्यापारिक उपनिवेश जैसा लगता है। इसे बड़े घाटे चलाने के लिए मजबूर होना पड़ता है क्योंकि यह केवल वही खरीद रहा है जिसकी उसे सख्त जरूरत है।
भारत के बहुत सारे निर्यात ठप हो जाएंगे अगर उनके घटक, इंग्रीडिएंट या बल्क रासायनिक पदार्थ चीन से आने बंद हो जाएं।यह मजेदार बात है,लेकिन भारतीय कारोबार और उद्योग चीन से आयात के सबसे बड़े पक्षकार हैं।साथ ही भारत को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति की जरूरत है। इसके लिए आगामी पांच वर्षों में अपनी सैन्य शक्ति का पुनर्निर्माण बेहद जरूरी है।यह दोहरी आयात निर्भरता भारत के दांव को बहुत कमजोर करती है।भारत बड़ी लीग में नहीं है। ट्रंप युग मध्यम शक्तियों और स्विंग स्टेट्स यानी जरूरत के हिसाब से पाला बदलने वालों के लिए क्रूर रहा है।
भारतीय टिप्पणीकारों और सोशल मीडिया पर सत्ता समर्थक प्रभावशाली इन्फ्लुएंसर्स के कुछ हिस्सों में जो उत्साह है, वह उन लोगों से आता है,जिनमें गहरा अमेरिकी विरोध है। वे अमेरिका के अनिवार्य पतन और डॉलर का प्रभुत्व कम होने के सपने में जी रहे हैं। यह एक शक्तिशाली समूह है और यह व्यक्तिगत अमेरिकी विरोध से इतना प्रभावित है कि वे दुष्ट पश्चिम को ठीक करने के लिए शी के साथ हाथ मिलाने में उम्मीद देखते हैं। क्या वे चीन की सीमा संबंधी मांगों को स्वीकार करेंगे,मुझे यकीन नहीं है।
दुश्मन का दुश्मन आपका मित्र हो सकता है यह कहावत सरल से अधिक मूर्खतापूर्ण है।चीन अमेरिका को दुश्मन नहीं बल्कि समकक्ष मानता है और अमेरिका भारत का दुश्मन नहीं है। लगातार तीन भारतीय प्रधानमंत्रियों ने भारत-अमेरिका संबंधों को एक स्वाभाविक रणनीतिक भागीदारी कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों से ज्यादा बार कही है। मैं बस इतना कह सकता हूं कि मोदी सरकार के पास ऐसी कोई कल्पना, भ्रम या जरूरत नहीं है और डि-डॉलराइजेशन यानी डॉलर का प्रभुत्व कम होने की बात,अगर डॉलर गायब हो जाए तो क्या होगा, उसकी जगह क्या आएगा, वो मजाक जिसे ब्रिक्स करेंसी कहा जाता है।अगर आप डॉलर का अंत चाहते हैं तो क्या आप युआन युग में जीने को तैयार हैं। डॉलर की जगह रुपया तो नहीं लेने वाला। कम से कम अगले कई दशकों तक नहीं। या रूबल भी नहीं।
शिखर सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य होता है कि नेताओं को उनके द्विपक्षीय मतभेदों के बावजूद एक साथ आने का मंच मिल सके। इससे अधिक उम्मीद करना एक खतरनाक भ्रम है। यह शिखर सम्मेलन अगर कुछ है तो हमें भारत की कमजोरियों की याद दिलाता है,ताकतों की नहीं। इसे हमें आगे बढ़ने के कार्य में गंभीर होने का संकेत मानना चाहिए।