वाराणसी।देश में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है।श्रीगणेश के भव्य पंडाल,आकर्षक प्रतिमाएं न सिर्फ सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित हैं,बल्कि घरों में भी गणपति बप्पा विराजे हैं। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में भी लाल बाग के राजा विराजे हैं।मुंबई में मौजूद लागबागचा राजा की हूबहू प्रतिमूर्ति काशी में स्थापित है।इन दिनों देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी मिनी महाराष्ट्र बन जाती है।आइए जानें क्या है इनकी धार्मिक मान्यता और स्थानीय आस्था।
काशी में विराजे लालबागचा राजा
काशी को देवाधिदेव महादेव की नगरी कहते हैं।हम काशी में प्रथमेश यानी कि महादेव के पुत्र गणेश पूजन की बात करें तो यहां की तस्वीर बिल्कुल अलग हो जाती है।काशी में देवाधिदेव महादेव के साथ भगवान गणेश की भी पूजा बेहद उल्लास और भव्य स्वरूप में होती है।गणेश उत्सव के समय काशी में मिनी महाराष्ट्र बसता है,इसकी तस्वीर ठठेरी बाजार के शेर वाली कोठी में नजर आती है।यहां पर बीते लगभग दो दशक से मराठा समाज के जरिए गणेश भगवान को स्थापित करने की परंपरा चली आ रही है।यहां पर स्थापित गणेश भगवान को मुंबई में विराजमान होने वाले बप्पा के रूप में ही तैयार किया जाता है।
क्यों कहते हैं लाल बाग के राजा
गणेश उत्सव और उनकी प्रतिमा स्थापित करने वाले आयोजक आनंद राव सूर्यवंशी कहते हैं कि पहले हम लोग गणेश उत्सव अपने-अपने घरों में मनाते थे,लेकिन 22 साल पहले हम सार्वजनिक रूप से बप्पा को यहां स्थापित करने का काम शुरू किया।यहां पर जो बप्पा विराजते हैं,वह लालबाग के राजा के रूप में ही विराजते हैं।यही नहीं इनको बनाने का काम भी वहीं कारीगर करते हैं,जो लालबाग के राजा की प्रतिमा को बनाते हैं।उन्होंने बताया कि मुंबई में लालबाग के राजा जो वस्त्र या आभूषण पहनते हैं, वहीं यहां भी धारण कराया जाता है।जिस थीम पर वहां काम होता है,उसी थीम पर यहां उनकी प्रतिमा का भी भव्य श्रृंगार आदि किया जाता है. यही वजह है कि हम उन्हें लालबाग का राजा कहते हैं।महिलाए यहां आकर सोलहों सिंगार करके लालबाग के राजा को हल्दी कुमकुम अर्पित करती हैं।बप्पा से सौभाग्य प्राप्त करने का आशीर्वाद लेती हैं।एक-दूसरे को हल्दी कुमकुम लगाकर सौभाग्य की कामना करती है।
मुंबई के कारीगर बनाते हैं प्रतिमा
आनंद राव सूर्यवंशी ने बताया कि यह प्रतिमा बनती भी मुंबई में ही है।मुंबई के कारीगर एक महीने में प्रतिमा को तैयार करते हैं और उसके बाद यह मुंबई से सड़क मार्ग के जरिए वाराणसी पहुंचती है।फिर हम यहां गणेश उत्सव में स्थापित करते हैं, पूजा करते हैं।बनारस ही नहीं बल्कि आसपास के लोग,मुंबई, महाराष्ट्र और विदेशों से भी लोग आकर इन्हें देखते हैं,इनका दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
महाराष्ट्र से आई महिला भक्तों ने ये बताया
महाराष्ट्र से आई महिला भक्तों ने बताया कि उन्होंने सुना था कि बनारस में भी लालबाग के राजा बैठते हैं, इसी को देखने के लिए वह बनारस में आई हैं और उन्हें यह देखकर के बहुत अच्छा लग रहा है।वह बताती है कि यह बिल्कुल लालबाग की राजा की तरह ही प्रतिमा है,उनकी आंखें बहुत सुंदर हैं।हमारा सौभाग्य है कि हम महादेव की नगरी में उनका दर्शन करने के साथ बप्पा का भी आशीर्वाद ले रहे हैं।वहीं दूसरी श्रद्धालु ने कहा कि इस समय ऐसा लग रहा है जैसे महाराष्ट्र मुंबई में आ गया हूं,यह देख करके हम बेहद खुश हैं।
बाहुबली का सेट तैयार किया गया
आयोजकों ने बताया कि गणेश उत्सव के समय बनारस में मिनी महाराष्ट्र बसता है,हम सभी लोग इस अंदाज में यहां पर इस त्योहार को मानते भी हैं।इस बार हमने बाहुबली की थीम पर बप्पा को विराजमान किया है।पूरा स्टेज बाहुबली के सेट के अनुसार उस आकृति में तैयार किया गया है। हम बप्पा को बनारस की विरासत शेर वाली कोठी में स्थापित करते हैं, जहां पर मुंबई का डमरू और ढोल का डाला करके बप्पा के सामने अपनी प्रस्तुति भी देते हैं,इस उत्सव को मराठी स्टाइल में मनाया जाता है।वह कहते हैं कि हम उसकी तैयारी लगभग 2 महीने पहले ही शुरू कर देते हैं,इसके बाद यहां पर समाज से जुड़े सभी लोग अलग-अलग तरीके से तैयारी करते हैं।बच्चे अपनी अलग-अलग प्रस्तुतियों को तैयार करते हैं।यही सब बनारस में इस त्यौहार को बिल्कुल अलग बना देता है।
10 दिवसीय होता है उत्सव
बता दें कि देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महादेव पुत्र गणेश का स्वागत पूरे हर्षोल्लास के साथ होता है।इसी के तहत काशी में 10 दिवसीय उत्सव के रूप में भगवान गणेश की पूजा की जाती है।कहीं लालबाग के राजा तो कहीं प्रथमेश के रूप में उनका पूजा जाता है।यही वजह है लोग आकर बनारस के उत्सव में शामिल होते हैं।कहते हैं कि बनारस में गणेश उत्सव की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने शुरू की थी, उनके द्वारा शुरू किया गया छोटा सा प्रयास आज काशी में एक बड़े उत्सव के रूप ले चुका है,जिसे विश्व के लोग देखने पहुंचते हैं।