अयोध्या।मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में सरयू नदी के तट पर लाखों दीये जब एक साथ जगमगाते हैं तो रामनगरी का दीपोत्सव आस्था और भव्यता का प्रतीक बन जाता है।इन दीयों की रोशनी के पीछे उन कारीगरों की मेहनत भी होती है,जो महीनों पहले से मिट्टी तैयार करने,चाक पर दीये बनाने,उन्हें सुखाने और आयोजन तक पहुंचाने में जुट जाते हैं। दीपोत्सव के दसवें संस्करण में यह आयोजन केवल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव नहीं,बल्कि पारंपरिक कुम्हारी कला और उससे जुड़ी आजीविका का बड़ा माध्यम भी बनकर उभरा है।
दीपावली पर दीप जलाने की परंपरा प्रभु श्रीराम के 14 साल के वनवास के बाद रामनगरी अयोध्या लौटने की मान्यता से जुड़ी है।प्रभु श्रीराम के स्वागत में दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।इस स्मृति में दीपावली पर घरों और मंदिरों में मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं।रामनगरी में बड़े स्तर पर आयोजित दीपोत्सव की शुरुआत 2017 में हुई।तब से सरयू नदी के तट पर दीप प्रज्ज्वलित का यह आयोजन हर साल बड़ा हो रहा है।
साल 2017 में दीपोत्सव में 1.71 लाख दीये जलाए गए थे। साल 2018 में 3.01 लाख, 2019 में 4.04 लाख और 2020 में 6.06 लाख पहुंची। साल 2021 में 9.41 लाख, 2022 में 15.76 लाख और 2023 में 22.23 लाख दीये जलाए गए। साल 2024 में 25,12,585 दीयों से सरयू के घाट जगमग हुए।साल 2025 के दीपोत्सव में 56 घाटों पर 26,17,215 दीये जलाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया गया। इस आयोजन में 30 हजार से अधिक स्वयंसेवकों ने भागीदारी की।
सात नवंबर को दसवें दीपोत्सव के लिए लगभग 30 लाख दीये जलाने की तैयारी है।कुछ रिपोर्टों में आयोजन के लिए 33 लाख दीयों का ऑर्डर दिए जाने का भी उल्लेख है।ये आयोजन से जुड़ी तैयारी और खरीद के आंकड़े हैं, इन्हें वास्तविक दीप प्रज्ज्वलन की संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
दीपोत्सव का सबसे बड़ा असर मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार परिवारों पर दिखाई देता है।साल 2025 में अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों के लगभग 40 कुम्हार परिवारों ने लगभग 16 लाख हाथ से बने दीये तैयार किए थे। बाकी दीये औद्योगिक इकाइयों,सामाजिक संगठनों,ग्रामीण महिलाओं और अन्य स्रोतों से आए थे।
इसका लाभ अयोध्या से बाहर के कारीगरों तक भी पहुंच रहा है।इस बार दीपोत्सव में गोंडा जिले के लगभग एक दर्जन परिवारों ने दीपोत्सव के लिए आठ लाख दीये तैयार करने की योजना बनाई।इससे उन्हें औसतन आठ से दस लाख रुपये तक की आमदनी होने का अनुमान है। रामनगरी के आसपास के गांवों में कुछ कुम्हारों को एक से दो लाख दीयों तक के ऑर्डर मिले हैं।
अक्टूबर 2025 की एक रिपोर्ट में कुछ कुम्हार परिवारों की कहानी सामने आई थी,इनकी पहले की मासिक कमाई लगभग 20 से 25 हजार रुपये थी,लेकिन त्योहार के मौसम में वे लाखों रुपये तक कमा रहे थे।रोजगार की तलाश में शहरों की ओर गए परिवारों के कुछ सदस्य अब गांव लौटकर इस काम में हाथ बंटा रहे हैं।
मिट्टी तैयार करने,उसे गूंथने,चाक पर आकार देने,दीये सुखाने और उनकी आपूर्ति तक पूरे परिवार की भागीदारी रहती है। इलेक्ट्रिक चाक से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली है, हालांकि इस काम का आधार आज भी पारंपरिक हुनर ही है।
दीपोत्सव के लिए केवल दीयों की जरूरत नहीं होती। साल 2025 के दीपोत्सव के लिए लगभग 55 लाख रुई की बत्तियों और 73 हजार लीटर तेल की आवश्यकता बताई गई थी। इससे कुम्हारों के साथ किसान,कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले,श्रमिक,परिवहनकर्ता और छोटे कारोबारी भी इस आयोजन से जुड़ते हैं।
रामनगरी के लिए गोंडा,बस्ती,गोरखपुर और दूसरे जिलों से दीये पहुंचने की खबरें बताती हैं कि इस आयोजन की मांग स्थानीय उत्पादन केंद्रों तक फैल रही है। इस तरह एक बड़ा सांस्कृतिक आयोजन गांवों के पारंपरिक शिल्प और बाजार के बीच सीधा संबंध बना रहा है।
दीपोत्सव की पहचान सरयू नदी के तट पर जगमगाते लाखों दीयों से है,लेकिन इसकी असली चमक उन हाथों में भी है जो मिट्टी को आकार देते हैं।दीपोत्सव एक ओर प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या वापसी की स्मृति को जीवंत रखता है, तो दूसरी ओर पारंपरिक कारीगरी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उससे जुड़े परिवारों की आजीविका को सहारा देने का अवसर भी बन रहा है।