नई दिल्ली।अमेरिका और ईरान में युद्ध के खतरे और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते जोखिम से कच्चे तेल की ढुलाई महंगी हो गई है।गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में कच्चे तेल की शिपिंग लागत एक साल में 7 गुना बढ़ गई है।इससे खासकर एशिया की उन रिफाइनरी कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है,जो दूसरे देशों से कच्चा तेल मंगाती हैं।
ढुलाई की बढ़ती लागत से कंपनियों के सामने हैं दो विकल्प
ढुलाई की बढ़ती लागत से कंपनियों के सामने दो विकल्प हैं। वे पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन की कीमतें बढ़ाकर यह बोझ ग्राहकों पर डालें या खुद कम मुनाफे पर कारोबार करें। अगर रिफाइनरी कंपनियां उत्पादन घटाती हैं, तो इससे विश्व में ईंधन की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
एक साल कितनी बढ़ी लागत
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की औसत ढुलाई दर एक साल पहले करीब 3 डॉलर प्रति बैरल थी।अब यह बढ़कर 20 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गई है। यानी एक साल में इसमें करीब 17 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हुई है।ढुलाई लागत में कुल 20 डॉलर प्रति बैरल की सालाना बढ़ोतरी के आधे से ज्यादा हिस्से की वजह होर्मुज में युद्ध का जोखिम और फारस की खाड़ी के बाहर जहाज से दूसरे जहाज में तेल ट्रांसफर करना है।इस सप्ताह ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। रिपोर्ट तैयार किए जाने के समय यह करीब 111.51 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। वहीं, कच्चे तेल का एक अन्य प्रमुख बेंचमार्क करीब 99.31 डॉलर प्रति बैरल पर था।
ढुलाई महंगी होने के 5 बड़े कारण
होर्मुज में युद्ध का जोखिम सबसे बड़ा है। इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों के लिए जोखिम प्रीमियम करीब 7 डॉलर प्रति बैरल बढ़ा है,जहाज से जहाज में तेल ट्रांसफर बढ़ गया है। फारस की खाड़ी के बाहर तेल ट्रांसफर करने से लागत में 4 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हुई है,जहाजों के ईंधन की बढ़ती कीमतें बढ़ गई हैं,समुद्री ईंधन महंगा होने से लागत 4 डॉलर प्रति बैरल बढ़ी है,टैंकरों का सही इस्तेमाल न हो पाना भी बड़ी वजह है,जहाजों की तैनाती में दिक्कत और रास्ता बदलने से 3 डॉलर प्रति बैरल का अतिरिक्त खर्च आया है।ईरानी टैंकरों पर पाबंदियों से भी कीमतें बढ़ी हैं। ईरान के टैंकर बेड़े पर लगी पाबंदियों से लागत में 2 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हुई है।
भारत पर क्या होगा असर
भारत जैसे देश,जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करते हैं,उनके लिए ढुलाई लागत बढ़ना चिंता की बात है।खासकर दूर के देशों से तेल खरीदने वाली रिफाइनरी कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है।हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में परिवहन लागत हमेशा सीधे शामिल नहीं होती, लेकिन महंगी ढुलाई से रिफाइनरी कंपनियों की लागत और मुनाफे पर असर पड़ता है। कंपनियां इसके जवाब में दूसरे, नजदीकी सप्लायरों से तेल खरीदने की कोशिश कर सकती हैं।अगर कंपनियां बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डालती हैं,तो पेट्रोल-डीजल और दूसरे ईंधन महंगे हो सकते हैं।वहीं अगर कीमतें बढ़ाना संभव नहीं होता,तो कंपनियों का मुनाफा घट सकता है,जिन बाजारों में खुदरा ईंधन की कीमतें नियंत्रित हैं, वहां लागत का बोझ कंपनियों पर ज्यादा पड़ सकता है।
कुछ देशों को मिल सकता है फायदा
महंगी ढुलाई से सभी तेल उत्पादकों को एक जैसा नुकसान नहीं होगा।दूर के बाजारों में तेल बेचने वाले उत्पादकों को ग्राहकों को बनाए रखने के लिए ज्यादा छूट देनी पड़ सकती है। इसके उलट बड़े उपभोक्ता बाजारों के नजदीक मौजूद सप्लायरों को फायदा मिल सकता है।गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक उत्तर-पश्चिमी यूरोप में ब्रेंट क्रूड और रूस के ESPO जैसे अपेक्षाकृत नजदीकी स्रोतों की मांग बढ़ सकती है। ऐसा तब होगा, जब रिफाइनरी कंपनियां ढुलाई खर्च बचाने के लिए अपने तेल सप्लायर बदलेंगी।