सुल्तानपुर लोकसभा में बाहरियों की रही बहार,72 में से 38 वर्ष तक जीत का फहराया परचम
सुल्तानपुर लोकसभा में बाहरियों की रही बहार,72 में से 38 वर्ष तक जीत का फहराया परचम

27 Mar 2024 |  127




सुल्तानपुर। उत्तर प्रदेश की सुल्तानपुर लोकसभा में दिलचस्प और दिलदार मतदाता हैं।पहले चुनाव से लेकर अब तक सुल्तानपुर का इतिहास खंगाला जाए तो सुल्तानपुर लोकसभा बाहरी प्रत्याशियों को खूब पसंद आती है।देश के पहले लोकसभा चुनाव से ही कांग्रेस ने यह परिपाटी शुरू की जो 1961 में कांग्रेस को करारा झटका लगने के बाद बदल गई, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को जीत तभी मिली जब उसने बाहरी प्रत्याशियों को टिकट दिया।सुल्तानपुर लोकसभा में अब तीन उपचुनाव समेत कुल 20 चुनाव हुए।इसमें आठ बार बाहरी प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की और 72 वर्ष में 38 वर्ष सांसद रहे।

1951-52 के पहले चुनाव में सुल्तानपुर सीट का नाम था। सुल्तानपुर जिला उत्तर साथ अयोध्या जिला दक्षिण पश्चिम। अमेठी सीट पहले चुनाव में सुल्तानपुर (दक्षिण) और 1957 के दूसरे चुनाव में मुसाफिरखाना संसदीय क्षेत्र कहलाया। कांग्रेस ने दोनों ही चुनाव में दोनों ही सीटों पर 1952 और 1957 दोनों ही चुनाव में बाहरी प्रत्याशी उतारे और दोनों बार सफलता मिली।इससे स्थानीय कांग्रेस नेताओं में गहरी नाराजगी थी,जिसके चलते जब 1961 में गोविंद मालवीय की मृत्यु के बाद उपचुनाव हुआ तो शहर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता और कांग्रेस नेता गणपत सहाय निर्दल उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस प्रत्याशी के सामने उतरे और कड़े मुकाबले में जीत हासिल कर ली।

इस झटके ने कांग्रेस की रणनीति बदल दी। इसके बाद कांग्रेस स्थानीय प्रत्याशियों पर दांव लगाने लगी।सफलता भी मिलती रही।समय बदला और बसपा का समय आया तो बसपा ने भी यहां से स्थानीय प्रत्याशी उतारे।इसमें से जयभद्र सिंह और मोहम्मद ताहिर को सफलता भी मिली,लेकिन भाजपा की तरफ से केवल बाहरी प्रत्याशी ही कामयाब रहे।जनसंघ से लेकर भाजपा तक एक उपचुनाव सहित 12 चुनाव में प्रत्याशी उतारने वाली भाजपा (पूर्व में जनसंघ) को पांच मौकों पर तभी जीत मिली, जब उसने बाहरी प्रत्याशियों को मैदान में उतारा। ऐसे में यह देखना रोचक है कि सुल्तानपुर लोकसभा के इस इतिहास को देखते हुए राजनीतिक दल किस तरह के प्रत्याशी को तवज्जो देते हैं।

संसदीय चुनाव के इतिहास में एक बार ऐसा भी हुआ, जब सुल्तानपुर लोकसभा में एक ही कार्यकाल में दो-दो उपचुनाव हुए। 1967 में कांग्रेस के टिकट पर गणपत सहाय सांसद बने थे। 1969 में गणपत सहाय के निधन पर यह सीट खाली हुई तो श्रीपति मिश्र यहां से सांसद बने। 1970 में श्रीपति मिश्र प्रदेश की चौधरी चरण सिंह सरकार में शिक्षामंत्री बनाए गए तो उन्होंने संसद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1970 में यहां दोबारा उपचुनाव हुए।

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