बुलंदशहर।कभी गांव की गलियों तक सीमित रहने वाली अहार के पेड़े की मिठास अब देशभर में अपनी अलग पहचान बनाने जा रही है।शुद्ध दूध की सौंधी खुशबू,धीमी आंच पर तैयार होने वाली पारंपरिक विधि और पीढ़ियों से कायम भरोसे ने अहार और पौटा बादशाहपुर के पेड़े को एक विशेष स्थान दिलाया है।
योगी सरकार की कैबिनेट द्वारा एक जिला एक व्यंजन योजना को मंजूरी मिलने के बाद इस प्रसिद्ध अहार पेड़े को नई उड़ान मिलने की उम्मीद जगी है।एक जिला एक व्यंजन योजना की सूची में अहार के पेड़े का नाम शामिल होने की जानकारी मिलते ही स्थानीय कारीगरों,विक्रेताओं और ग्रामीणों में खुशी है।
लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी इस मिठास भरी परंपरा की नींव स्वर्गीय हरप्रसाद शर्मा ने रखी थी।सीमित संसाधनों के बीच हरप्रसाद ने शुद्ध दूध से पेड़ा बनाना शुरू किया।उस दौर में स्वाद और गुणवत्ता ही उनकी पहचान बने।धीरे-धीरे अहार का पेड़ा आसपास के गांवों,कस्बों और शहरों तक पहुंचा और लोगों की पसंद बन गया। समय के साथ यह केवल मिठाई नहीं रहा,बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और आत्मीयता का प्रतीक बन गया।
आज हरप्रसाद शर्मा की चौथी पीढ़ी के वंशज रामदत्त शर्मा इस परंपरा को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। आधुनिक मशीनों और बाजारवाद के इस दौर में भी अहार और पौटा बादशाहपुर के कारीगरों ने पारंपरिक विधि को जीवित रखा है।आज भी शुद्ध दूध को घंटों तक धीमी आंच पर पकाकर मावा तैयार किया जाता है और उसी से पेड़ा बनाया जाता है। यही वजह है कि इसका स्वाद वर्षों बाद भी लोगों की स्मृतियों में ताजगी बनाए हुए है। इस पहचान को मजबूत करने में पौटा बादशाहपुर निवासी सुरेश चंद्र वर्मा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां ग्राहक केवल मिठाई खरीदने नहीं आते,बल्कि वर्षों से कायम भरोसे और अपनापन अपने साथ ले जाते हैं।बुजुर्गों के लिए यह पेड़ा मेलों,त्योहारों और पुराने दिनों की यादों से जुड़ा है,जबकि युवाओं के लिए यह उनके गांव का गौरव और सिग्नेचर ब्रांड बन चुका है।
रामदत्त शर्मा का कहना है कि अहार का पेड़ा उनके परिवार की कई पीढ़ियों की मेहनत,परंपरा और पहचान से जुड़ा हुआ है।स्वाद और शुद्धता को बनाए रखना ही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।सुरेश चंद्र वर्मा का कहना है कि ग्राहकों का वर्षों पुराना भरोसा ही उनकी असली ताकत है। अब एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल होने के बाद क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है कि अहार का पारंपरिक पेड़ा अपनी विशिष्ट मिठास और गुणवत्ता के दम पर देशभर में नई पहचान स्थापित करेगा।
ग्रामीण दिनेश कुमार का कहना है कि हमने वह दौर देखा है,जब बाहर की मिठाइयां आसानी से नहीं मिलती थीं। तब हर खुशी के मौके पर अहार का पेड़ा ही घर-घर पहुंचता था। आज भी वही मिठास और वही अपनापन इसमें महसूस होता है। समय बदला है, लेकिन पेड़े की खुशबू आज भी हमें पुराने दिनों में ले जाती है।