लखनऊ।पूर्व मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने सिटी वॉटर ट्रांसपोर्टेशन प्रॉजेक्ट को लेकर तंज कसा है।अखिलेश ने एक्स पर पोस्ट कर पूछा कि क्या वॉटर टैक्सी जलमग्न गोरखपुर की सड़कों पर भी दौड़ेगी,गोरखपुर सीएम सिटी के नाम से फेमस है।बता दें कि हाल ही में पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने बारिश से पूरे गोरखपुर शहर में जलभराव का एक वीडियो जारी किया था।वीडियो में लोग सड़कों पर पानी के बीच चलते हुए दिख रहे थे।वीडियो को पोस्ट करते हुए अखिलेश ने लिखा था कि जब तक भाजपा का राज,छोड़ो कार,रखो नाव तैयार।अखिलेश ने भाजपा सरकार पर कई सवाल खड़े किए थे।
अखिलेश योगी सरकार पर हमलावर
पूर्व सीएम अखिलेश यादव योगी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार हमलावर हैं।मानसून से प्रदेश के शहरों में हो रही जलभराव की समस्या पर अखिलेश एक्स पर पोस्ट कर सवाल खड़े कर रहे हैं।पहले गोरखपुर अब अयोध्या में बारिश से हो रहे जलभराव और सडक में जाम की समस्या को लेकर अखिलेश ने योगी सरकार को घेरने की कोशिश की है।अब अखिलेश ने सीएम सिटी गोरखपुर को टारगेट किया है।पूछा है कि क्या जलमग्न गोरखपुर में भी वॉटर टैक्सी चलाई जाएगी।
क्या है सिटी वॉटर ट्रांसपोर्टेशन प्रॉजेक्ट
बता दें कि राजधानी लखनऊ के लिए सिटी वॉटर ट्रांसपोर्टेशन प्रॉजेक्ट तैयार किया गया है।इसके तहत गोमती नदी,कुकरैल, शारदा नहर में वॉटर टैक्सी दौड़ाई जाएगी। 1170 करोड़ रुपये की इस योजना को 4 चरणों में पूरा किया जाएग। हर चरण को 2 साल में पूरा करने का लक्ष्य है,जिसे साल 2032 तक पूरा करने का दावा किया गया है। योजना का मुख्य उद्देश्य ट्रैफिक जाम से राहत देना है।नदी-नहर के रास्ते 20-30 मिनट में शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचा जा सकेगा। वॉटर टैक्सी का किराया बस और ऑटो से कम रखा जाएगा।
जल निगम और एलडीए मिलकर इस प्रॉजेक्ट को चलाएंगे
यूपी जल निगम और एलडीए मिलकर इस प्रॉजेक्ट को चलाएंगे। खर्च के लिए पीपीपी मॉडल अपनाया जाएगा,गंगा और घाघरा से पानी लाने से गोमती-कुकरैल में पानी की कमी भी दूर होगी।स्टेट कैपिटल रीजन में गोमती और सई नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए बड़ी पहल शुरू हो रही है। एससीआर में शामिल 6 जिलों में लखनऊ,बाराबंकी,सीतापुर, उन्नाव और रायबरेली में नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लॉट लगाए जाएंगे। इन पर 300 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होंगे।अर्बन सीवेज ट्रीटमेंट फैसिलिटी के तहत बनने वाले इन प्लांट्स को 2051 तक बढ़ने वाली आबादी को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। काम शुरू होने के बाद इसे 2 साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।