अमेरिका ने हवा में चला दिया है तीर,चीन के साथ भारत का वो कनेक्‍शन साबित करना मुश्किल
अमेरिका ने हवा में चला दिया है तीर,चीन के साथ भारत का वो कनेक्‍शन साबित करना मुश्किल

16 Aug 2026 |   30



 

नई दिल्‍ली।भारत पर अमेरिका की नजर है।कारण है चीन पर लगने वाले टैरिफ।अमेरिका का अनुमान है कि 2025 में भारत,मैक्सिको और वियतनाम के जरिए 67 अरब डॉलर का सामान दूसरे देशों को भेजा गया। इसे व्‍यापार की भाषा में ट्रांसशिपमेंट कहा जाता है।चीन की ओर से टैरिफ से बचने के आरोप लगाते हुए ऐसा कहा गया।हालांकि‌ थिंक टैंक जीटीआरआई के मुताबिक व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में इस आंकड़े में भारत की हिस्सेदारी का खुलासा नहीं किया गया है। न ही टैरिफ धोखाधड़ी में शामिल किसी भारतीय निर्यातक या शिपमेंट की पहचान की गई है।अमेरिका ने 13 अगस्त को द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम,राइज,स्कोप,एंड कॉस्ट्स नाम से एक रिपोर्ट जारी की। इसमें निर्यातकों पर आरोप लगाया गया कि वे अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए 40 से ज्‍यादा देशों के जरिए सामान भेजते हैं।

अमेरिकी लिस्ट में भारत का नाम

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका में सामान पहुंचने से पहले री-लेबलिंग,री-पैकेजिंग,री-इनवॉइसिंग,मामूली प्रोसेसिंग या सामान के मूल देश (कंट्री-ऑफ-ओरिजिन) के बारे में गलत दावे जैसी हरकतें हो सकती हैं।इस रिपोर्ट में भारत को कनाडा,यूरोपीय संघ (ईयू),इजरायल,जापान,मैक्सिको,दक्षिण कोरिया और ताइवान के साथ ट्रांसशिपमेंट के ज्‍यादा जोखिम वाले देशों की श्रेणी (टियर 1) में रखा गया है।

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा...

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि कुल व्यापार डेटा से यह साबित नहीं होता कि भारत जैसे देशों से बढ़ता निर्यात असल में चीनी सामान को दूसरे रास्ते से भेजने (री-राउटिंग) का मामला है।

थिंक टैंक ने कहा...

थिंक टैंक ने कहा,रिपोर्ट में अमेरिकी वाणिज्य विभाग के एक अनुमान का हवाला दिया गया है कि 2025 में भारत, मैक्सिको और वियतनाम के जरिए 67 अरब डॉलर का सामान ट्रांसशिप किया गया,जिससे टैरिफ के तौर पर 28 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।

GTRI ने कहा...

GTRI ने कहा कि रिपोर्ट में उस आंकड़े का देश-वार ब्योरा नहीं दिया गया है।इससे भारत की हिस्सेदारी स्पष्ट नहीं हो पाती।इसमें किसी भारतीय निर्यातक की पहचान भी नहीं की गई है। न ही किसी ऐसे विशिष्ट भारतीय शिपमेंट का जिक्र है, जो अमेरिकी टैरिफ से बचता हुआ पाया गया हो।

भारत से जुड़ी ट्रांसशिपमेंट संबंधी चिंताएं

अमेरिका की रिपोर्ट में खास तौर पर HS कोड 8413 और 8414 के तहत पंप और कंप्रेसर के मामले में पुणे-गुजरात-चेन्‍नई मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर का जिक्र किया गया है।जीटीआरआई ने कहा कि इन प्रोडक्ट कैटेगरी में भारत का मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट बेस इस धारणा को कमजोर करता है कि अमेरिका भेजे जाने वाले भारतीय शिपमेंट असल में चीनी सामान हैं जिन्हें दूसरे रास्ते से भेजा जा रहा है।

थिंक टैंक के मुताबिक...

थिंक टैंक के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने दुनिया भर में 1.61 अरब डॉलर मूल्य के लिक्विड पंप एक्सपोर्ट किए। इसमें अमेरिका को 41.45 करोड़ डॉलर का एक्सपोर्ट शामिल था। जबकि चीन से इंपोर्ट 32.64 करोड़ डॉलर का था।भारत ने दुनिया भर में 1.48 अरब डॉलर मूल्य के एयर पंप और गैस कंप्रेसर भी एक्सपोर्ट किए। इसमें अमेरिका को 335.4 मिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट शामिल था।वहीं चीन से इम्पोर्ट 1.63 अरब डॉलर का था।ट्रेड बॉडी ने कहा कि इन कैटेगरी में भारत के एक्सपोर्ट का पैमाना यह दिखाता है कि देश में असली मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं हैं। सिर्फ चीनी इम्पोर्ट से गैर-कानूनी ट्रांसशिपमेंट साबित नहीं होता।

थिंक टैंक ने उठाया मुख्य मुद्दा 

थिंंक टैंक ने एक मुख्य मुद्दा उठाया है।ग्लोबल सप्लाई चेन में सही तरीके से शामिल होने और कस्टम्स फ्रॉड के बीच का अंतर।चीन ने भारत,मैक्सिको और वियतनाम जैसे देशों में मैन्युफैक्चरर्स को कंपोनेंट्स और इंटरमीडिएट गुड्स की सप्लाई बढ़ाई है। इन इनपुट को अमेरिका में एक्सपोर्ट करने से पहले प्रोसेस,असेंबल या फिनिश्ड प्रोडक्ट्स में शामिल किया जा सकता है।

GTRI ने कहा...

GTRI ने कहा कि जहां इस प्रोसेसिंग से प्रोडक्ट में बड़ा बदलाव आता है। वहां बनने वाला प्रोडक्ट असल में उसी देश का एक्सपोर्ट माना जाता है जहां उसे मैन्युफैक्चर किया गया है।भारत,मैक्सिको या वियतनाम में काफी हद तक प्रोसेस किए गए सामान उन देशों के असली एक्सपोर्ट हैं,ये अपने आप चीनी ट्रांसशिपमेंट नहीं बन जाते।ऑर्गनाइजेशन ने यह भी तर्क दिया कि व्हाइट हाउस की रिपोर्ट ट्रांसशिपमेंट के टेक्निकल मतलब को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का जोखिम उठाती है। यह असेंबली,टेस्टिंग,फिनिशिंग और कंपोनेंट इंटीग्रेशन जैसी एक्टिविटीज को री-लेबलिंग, री-पैकेजिंग और री-इनवॉइसिंग जैसी प्रैक्टिस के साथ एक ही कैटेगरी में रखती है।

GTRI के मुताबिक...

GTRI के मुताबिक इससे सही मैन्युफैक्चरिंग और जानबूझकर किए गए ओरिजिन फ्रॉड के बीच का अंतर धुंधला हो सकता है। GTRI ने यह भी सवाल उठाया कि क्या चीन से सीधे अमेरिकी इम्पोर्ट में कमी यह दिखाती है कि ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी ने विदेशी सामानों पर अमेरिका की कुल निर्भरता कम कर दी है।चीन से अमेरिकी इम्पोर्ट 2017 में 525.8 अरब डॉलर से घटकर 2025 में 327.5 अरब डॉलर हो गया। हालांकि, इसी दौरान कुल अमेरिकी इम्पोर्ट 2.41 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 3.50 ट्रिलियन डॉलर हो गया।

ऑर्गनाइजेशन ने कहा...

ऑर्गनाइजेशन ने कहा कि इससे पता चलता है कि टैरिफ ने इम्पोर्टेड सामानों पर अमेरिका की निर्भरता को काफी हद तक कम करने के बजाय अमेरिकी इम्पोर्ट के सोर्स को बदल दिया है। GTRI ने कहा कि इस बीच चीन ने ग्लोबल वैल्यू चेन में शामिल मैन्युफैक्चरर्स को ज्‍यादा इंटरमीडिएट गुड्स (कच्चा माल या पुर्जे) सप्लाई करके खुद को बदला है।मेक्सिको, वियतनाम और भारत के ट्रेड डेटा से यह भी पता चलता है कि क्यों अमेरिका को एक्सपोर्ट बढ़ने और साथ ही चीन से इम्पोर्ट बढ़ने से ही यह साबित नहीं हो जाता कि गैर-कानूनी तरीके से सामान को दूसरे रास्ते से भेजा जा रहा है।

2017 और 2024 के बीच अमेरिका को मेक्सिको का एक्सपोर्ट 194.2 अरब डॉलर बढ़ा

2017 और 2024 के बीच अमेरिका को मेक्सिको का एक्सपोर्ट 194.2 अरब डॉलर बढ़ा।जबकि चीन से उसका इम्पोर्ट 54.3 अरब डॉलर बढ़ा।चीन से इम्पोर्ट में 90.2 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के मुकाबले,अमेरिका को वियतनाम का एक्सपोर्ट 94.1 अरब डॉलर बढ़ा।अमेरिका को भारत का एक्सपोर्ट 40.7 अरब डॉलर बढ़ गया, जबकि चीन से भारत का इम्पोर्ट 52.4 अरब डॉलर बढ़ा। GTRI ने कहा कि चीन से भारत आने वाले सामान का इस्तेमाल घरेलू खपत, असली मैन्युफैक्चरिंग या अमेरिका के अलावा दूसरे बाजारों में एक्सपोर्ट के लिए किया जा सकता है।थिंक टैंक ने कहा,कुल ट्रेड डेटा से यह साबित नहीं होता कि तीसरे देशों से अमेरिका में बढ़ता इम्पोर्ट असल में चीन का ही सामान है जिसे दूसरे रास्ते से भेजा गया है।

अमेरिकी मामले में चार कमजोरियां

जीटीआरआई ने व्हाइट हाउस के नजरिए में चार बड़ी कमजोरियां बताईं।पहला उसने कहा कि इस रिपोर्ट से ट्रांसशिपमेंट (सामान को एक जगह से दूसरी जगह भेजकर फिर आगे भेजना) की परिभाषा के बढ़ने का खतरा है। इसमें बिना बदले सामान के पारंपरिक मूवमेंट के अलावा असेंबली, टेस्टिंग और फिनिशिंग जैसी असली मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां भी शामिल हो सकती हैं।दूसरा उसने कहा कि ट्रेड के बीच संबंध से मूल स्थान (ओरिजिन) के बारे में धोखाधड़ी साबित नहीं की जा सकती।अमेरिका को सीधे चीनी एक्सपोर्ट में कमी और किसी दूसरे देश से एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी से यह साबित नहीं होता कि वही सामान दोबारा लेबल लगाकर उस देश के रास्ते भेजा गया था।तीसरा जीटीआरआई ने तर्क दिया कि किसी खास देश पर अमेरिका के टैरिफ की वजह से टैरिफ में बड़ा अंतर पैदा हुआ है,जिससे कंपनियों के लिए नियमों से बचने की कोशिश करने का प्रोत्साहन बढ़ता है।चौथा उसने अमेरिका के मौजूदा नॉन-प्रिफरेंशियल रूल्स ऑफ ओरिजिन (बिना विशेष छूट वाले मूल स्थान के नियम) की ओर इशारा किया, जो काफी बदलाव के सिद्धांत का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही चेतावनी दी कि कड़े कानूनी मानकों से इम्पोर्ट किए गए इनपुट का इस्तेमाल करने वाले असली मैन्युफैक्चरर्स के लिए अनिश्चितता और नियमों का पालन करने की लागत बढ़ सकती है।

ज्‍यादा जांच-पड़ताल की तलवार

अमेरिका की रिपोर्ट में संदिग्ध ट्रांसशिपमेंट के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई का प्रस्ताव है।कहा गया है कि अमेरिका ज्‍यादा जोखिम वाले शिपमेंट की पहचान करने के लिए नए टूल विकसित कर रहा है।प्रशासन ने डिटेक्टिव बॉर्डर नाम के AI-आधारित सिस्टम का भी जिक्र किया है। इसका मकसद ट्रेड डेटा का विश्लेषण करना और घोषित मूल स्थान,रूटिंग हिस्ट्री और कंपोनेंट कंटेंट से जुड़ी विसंगतियों की पहचान करना है।अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि इस व्यापक कार्रवाई का मकसद टैरिफ की चोरी रोकना और गैर-कानूनी ट्रांसशिपमेंट से हुए राजस्व के नुकसान की भरपाई करना है।
हालांकि जीटीआरआई का कहना है कि भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए सख्‍त कार्रवाई का मतलब ज्‍यादा जांच-पड़ताल, शिपमेंट में देरी, पिछली तारीख से लागू होने वाली ड्यूटी और जुर्माना हो सकता है।यह मुद्दा उन भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए खास तौर पर अहम हो सकता है जो चीनी कंपोनेंट या इंटरमीडिएट सामान का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन, भारत में काफी प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन करते हैं।

शिपमेंट-लेवल पर सबूत की मांग

जीटीआरआई ने कहा कि भारत को इन आरोपों पर वॉशिंगटन से विस्तृत सबूत मांगने चाहिए। इसमें 67 अरब डॉलर के अनुमान का आधार (देश, प्रोडक्ट और शिपमेंट के स्तर पर) शामिल हो। इसमें यह भी सिफारिश की गई कि भारतीय अधिकारी व्हाइट हाउस की ओर से विशेष रूप से पहचाने गए उत्पादों की जांच करें। इसमें फर्म स्तर पर चीनी आयात का अमेरिका को निर्यात से मिलान करना और घरेलू मूल्यवर्धन को सत्यापित करना शामिल है।

इस तरह की प्रक्रिया से टैरिफ चोरी के वास्तविक मामलों की पहचान करने में मदद मिलेगी

जीटीआरआई ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया से टैरिफ चोरी के वास्तविक मामलों की पहचान करने में मदद मिलेगी। साथ ही वैध भारतीय निर्यातकों को अनुचित कार्रवाई से बचाया जा सकेगा।इसलिए भारत के सामने तत्काल चुनौती दोहरी है। पहला यह निर्धारित करना कि क्या कोई निर्यातक वास्तव में मूल नियमों का दुरुपयोग कर रहा है। फिर यह सुनिश्चित करना कि ग्‍लोबल सप्‍लाई चेन में वैध रूप से भाग लेने वाले निर्माता व्यापक अमेरिकी कार्रवाई की चपेट में न आएं।अमेरिका का तर्क है कि अवैध ट्रांसशिपमेंट अमेरिकी टैरिफ को कमजोर करता है। वहीं, जीटीआरआई का कहना है कि वैध भारतीय निर्यात को टैरिफ चोरी नेटवर्क का हिस्सा मानने से पहले, साक्ष्य को व्यापक व्यापार पैटर्न से आगे बढ़कर खास शिपमेंट और लेनदेन को स्थापित करने की जरूरत है।

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