जलवायु कार्रवाई पड़ रही है कमजोर,भारत को अपनी लक्ष्मण रेखा पर रहना होगा अडिग
जलवायु कार्रवाई पड़ रही है कमजोर,भारत को अपनी लक्ष्मण रेखा पर रहना होगा अडिग

26 Aug 2026 |   21



 

 
नई दिल्ली।नवंबर 2025 में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) की बेलेम में आयोजित 30वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप) के परिणाम निराशाजनक रहे,जिसके बाद नवंबर में तुर्की के अंताल्या में होने वाली कॉप 31 बैठक से बहुत अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। 1992 में रियो डी जनेरियो जलवायु शिखर सम्मेलन में बहुपक्षीय जलवायु कार्रवाई जिस ऊंचाई तक पहुंची थी,वहां से लगातार नीचे जाती रही है।लगता नहीं है कि अंताल्या इसका अपवाद होगा।

लगभग 18 साल पहले दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन समझौते को सम्मेलन के अंतिम दिन देर रात स्वीकार किया गया। यह समझौता अंतिम क्षणों में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और बेसिक राष्ट्रों (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) के नेताओं के बीच हुआ था।पीछे मुड़कर देखने और बाद में घटित हुए घटनाक्रम के आधार पर मैं मानता हूं कि बेसिक देशों को अपने इस रुख पर अडिग रहना चाहिए था कि दिसंबर 2007 में बाली में आयोजित 13वीं कॉप वार्ता में तय बातों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

बाली रोड मैप ने जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकार समिति (आईपीसीसी) की चौथी मूल्यांकन रिपोर्ट को संज्ञान में लिया था।इसमें चेतावनी दी गई थी कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन पहले की रिपोर्टों की तुलना में कहीं अधिक तात्कालिक और गहरी चुनौती बन गया है और इसके लिए यूएनएफसीसीसी के सिद्धांतों और प्रावधानों के ठोस क्रियान्वयन की आवश्यकता है। यह क्रियान्वयन चार स्तंभों से संबंधित था- शमन, अनुकूलन, वित्त और प्रौद्योगिकी। इन्हें वैश्विक जलवायु परिवर्तन समझौते में शामिल किया जाना चाहिए था, जो यूएनएफसीसीसी के तहत बहुपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से दो वर्षों की अवधि में सम्पन्न होता और कॉप 15 पर समाप्त होता।

किंतु बातचीत के दौरान अमेरिका की भूमिका खराब रही और उसने बाली समझौते और खुद यूएनएफसीसीसी में काफी तब्दीली करने का प्रस्ताव रखा।इसमें विकसित औद्योगिक देशों के संकल्पों और विकासशील देशों के समूह के संकल्पों में स्पष्ट भेद खत्म करना भी था। इससे साझा किंतु विभाजित जिम्मेदारी और संबंधित क्षमता (सीबीडीआर) सिद्धांत पलट जाता, जिसके अनुसार जिस देश ने जितना प्रदूषण फैलाया है, उसे उतना ही बोझ उठाना पड़ेगा।

अमेरिका ने यूएनएफसीसीसी के तहत 1997 में अपनाए गए क्योटो प्रोटोकॉल में निर्धारित सख्त अनुपालन प्रक्रिया का भी विरोध किया।प्रत्येक विकसित देश को ग्रीनहाउस गैस में कटौती के लिए संख्यात्मक लक्ष्य देने और उसे पूरा नहीं करने की सूरत में जुर्माने समेत सख्त अनुपालन प्रक्रिया अपनाए जाने के बजाय अमेरिका ने स्वैच्छिक सौगंध तथा समीक्षा प्रणाली का प्रस्ताव रखा, जिसमें लक्ष्य पूरा नहीं करने पर कोई दंड नहीं था।

अमेरिका ने विकासशील देशों को जलवायु की दिशा में काम करने के लिए धन तथा प्रौद्योगिकी मुहैया कराने के लिए बाध्य करने वाला संकल्प लेने से भी इनकार कर दिया, जो बाली सहमति के प्रमुख तत्व थे। वह यूएनएफसीसीसी में निहित ऐतिहासिक जिम्मेदारी के सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं था, जिसके अनुसार 19वीं सदी में औद्योगिक युग की शुरुआत से लेकर अब तक पृथ्वी के वातावरण में जमा अधिकांश ग्रीनहाउस गैसों के लिए औद्योगिक देश ही जिम्मेदार रहे हैं और इसलिए उन्हें जलवायु कार्रवाई में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। यह न्याय और समानुपातिक बोझ साझा करने की अवधारणा का मूल था। लब्बोलुआब यह कि अमेरिका ने यूएनएफसीसीसी के पूरे ढांचे को ध्वस्त कर दिया और कोपेनहेगन समझौता उस प्रक्रिया की शुरुआत साबित हुआ, जिसने विकासशील देशों को नुकसान पहुंचाने वाले क्षरण की राह खोल दी, जो आज भी जारी है।

समझौते ने यूएनएफसीसीसी में अलग-अलग संकल्पों के साथ विकसित और विकासशील देशों के बीच मौजूद दीवार कमजोर कर दी।ओबामा के साथ उस निर्णायक बैठक में बेसिक समूह इस बात पर सहमत हो गया कि यूएनएफसीसीसी के तहत उनकी जलवायु संबंधी कार्रवाई का भी अंतरराष्ट्रीय परामर्श और विश्लेषण किया जा सकता है। विकसित देशों के लिए पहले से ही ऐसी प्रक्रिया मौजूद थी। इसके बाद 2015 के ऐतिहासिक पेरिस समझौते ने सार्वभौमिक क्रियान्वयन का रास्ता अपनाया, जिसके लिए अमेरिका कोपेनहेगन के बाद हुई वार्ताओं में वकालत करता आ रहा था।

शमन (ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी) के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तय संकल्प घोषित करने की प्रतिबद्धता पेरिस समझौते के सभी सदस्य देशों पर लागू होती है। ये संकल्प स्वैच्छिक हैं किंतु हर पांच वर्ष में उनकी प्रगति की समीक्षा की जाती है। संकल्पों के स्वैच्छिक होने का अर्थ है कि विकसित देशों को जलवायु कार्रवाई में मदद के लिए विकासशील देशों को धन और प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने के अपने लगातार कम होते लक्ष्य भी पूरे नहीं करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।

पेरिस समझौते के साथ ही प्रभावशाली वार्ता समूह के तौर पर बेसिक देशों का दौर भी समाप्त हो गया। पेरिस सम्मेलन से पहले अमेरिका और चीन ने जलवायु कार्रवाई पर अपने द्विपक्षीय घोषणा-पत्र के लिए कुछ सिद्धांतों पर सहमति बनाई। बाद में यही सिद्धांत पेरिस समझौते के लिए एक प्रारूप बन गए। इनमें सबसे नुकसानदेह बदलाव सीबीडीआर के सिद्धांत को कमजोर करना था,जिसमें राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार शब्द जोड़ दिए गए और यही भाषा आगे चलकर पेरिस समझौते में भी शामिल हो गई। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक देश सीबीडीआर के सिद्धांत की व्याख्या और क्रियान्वयन अपने हिसाब से कर सकता है। इस तरह समानता और न्याय के कानूनी सिद्धांत को ऐसे स्वैच्छिक दायित्व में बदल दिया गया, जिसे देश अपनी सुविधा के हिसाब से तय कर सकते थे। भारत ने इसका विरोध नहीं किया।

कोपेनहेगन समझौते में बेसिक देशों के समझौते ने ऐसी प्रक्रिया को जन्म दिया,जिसने अंततः अत्यधिक कमजोर पेरिस समझौते का रूप ले लिया।अमेरिका ने लगभग वह सब हासिल कर लिया,जिसकी उसे चाह थी और बाद में उन मामूली संकल्पों से भी मुकर गया।

पीछे मुड़कर 2007 से 2015 के दरम्यान और उसके बाद हुई जलवायु वार्ताओं को देखने और विचार करने की जरूरत है। कोपेनहेगन तक की विभिन्न वार्ताओं के दौरान भारत ने यूएनएफसीसीसी की अखंडता पर एक लाल रेखा खींची थी यानी उससे समझौता नहीं किया जा सकता था। वार्ताओं में भारत के रुख को कठोर,नकारात्मक और सहमति तक पहुंचने में बाधा बताया गया,जबकि भारत केवल इस बात पर जोर दे रहा था कि विकसित देशों को यूएनएफसीसीसी में दिए गए अपने गंभीर संकल्पों का पालन करना चाहिए।

कई अवसरों पर उन लोगों को याद दिलाना पड़ा जो चाहते थे कि भारत ‘समस्या नहीं बल्कि समाधान का हिस्सा बने कि राष्ट्रीय हित और न्याय के सिद्धांत को बनाए रखने के मुद्दे पर भारत ने अक्सर अकेले खड़े रहना पसंद किया है। परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर से इनकार करना इसके अच्छे उदाहरण हैं। हमने एक सीमा तय की और उससे जुड़े दर्द के बावजूद उस पर डटे रहे।

जिस दुनिया में देशों के आपसी रिश्ते लेन-देन पर टिके हैं और जहां अमेरिका अपने वार्ता साझेदारों का रुख धीरे-धीरे कमजोर करने के बाद खुद पर कोई जिम्मेदारी लिए बगैर बाहर निकल जाता है, वहां राष्ट्रीय हितों के प्रमुख मुद्दों पर दृढ़ रहना सही है, चाहे कितना भी दबाव पड़ता रहे।

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