डोनाल्ड ट्रंप का होर्मुज प्‍लान:अमेरिका के पास गुजरने वाले जहाजों से क्या चार्ज वसूलने का है हक,भारत के लिए मायने
डोनाल्ड ट्रंप का होर्मुज प्‍लान:अमेरिका के पास गुजरने वाले जहाजों से क्या चार्ज वसूलने का है हक,भारत के लिए मायने

15 Jul 2026 |   29



 

नई दिल्‍ली।अमेरिका ने बड़ा प्लान बनाया है।अमेरिका होर्मुज स्‍ट्रेट से गुजरने वाले सभी जहाजों पर 20 फीसदी चार्ज लगाएगा।अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को इसका ऐलान किया।होर्मुज स्ट्रेट दुनिया की लगभग 20 फीसदी तेल सप्‍लाई के लिए अहम रास्ता है।भारत के लिए भी कच्चे तेल के बड़े इंपोर्ट का एक अहम रास्ता है। 

ईरान ने ट्रंप के प्रस्ताव को खारिज किया 

ईरान ने ट्रंप के प्रस्ताव को खारिज किया है। ईरान ने कहा है कि होर्मुज स्‍ट्रेट पर अमेरिका का कोई अधिकार नहीं है।विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि होर्मुज का असली संरक्षक ईरान है, न कि अमेरिका।

यह बयान ऐसे समय में आया है,जब हाल ही में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया...

यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया है।फिर भले ही संघर्ष-विराम हुआ हो,जिसे कमजोर माना जा रहा है। दोनों पक्षों के बीच नए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद अमेरिका ने ईरानी जहाजों पर फिर से नाकेबंदी लागू करने की घोषणा की। ईरान ने पहले घोषणा की थी कि स्थिरता लौटने तक होर्मुज स्‍ट्रेट बंद रहेगा।वहीं अमेरिका ने कहा कि वह इस जलमार्ग को खुला रखेगा,इसके संरक्षक के तौर पर काम करेगा।बरहाल इस नए टकराव से तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। विश्व के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक के जरिए होने वाली शिपिंग और ग्‍लोबल एनर्जी सप्‍लाई को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।

होर्मुज स्‍ट्रेट से शिपिंग में किसी भी तरह की रुकावट या ज्‍यादा लागत के ग्‍लोबल असर होते...

होर्मुज स्‍ट्रेट से शिपिंग में किसी भी तरह की रुकावट या ज्‍यादा लागत के ग्‍लोबल असर होते हैं।वजह है कि यह विश्व के सबसे व्यस्त ऊर्जा गलियारों में से एक है। भारत के लिए शिपिंग की ज्‍यादा लागत या व्यापार में रुकावट से तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं,आयात बिल बढ़ सकता है,महंगाई पर दबाव पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी से ज्‍यादा आयात करता है। भारत खाड़ी देशों से होने वाली सप्‍लाई पर काफी हद तक निर्भर है।

क्या अमेरिका कानूनी तौर पर होर्मुज को कंट्रोल कर सकता है

संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी ने सोमवार को कहा कि वह होर्मुज स्‍ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर चार्ज लगाने का समर्थन नहीं करती है। यह बयान ट्रंप की ओर से सिक्‍योरिटी चार्ज लगाने की बात कहने के बाद आया है।एजेंसी इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन ने पहले कहा था कि अंतरराष्ट्रीय आवागमन के लिए इस्तेमाल होने वाले स्‍ट्रेट में शिपिंग को रोकने का कानूनी अधिकार किसी के पास नहीं है।अप्रैल में बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक सेक्रेटरी-जनरल आर्सेनियो डोमिंग्वेज ने कहा था,मैं समझता हूं कि वहां संघर्ष चल रहा है,लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में ऐसा कोई आधार नहीं है जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन के लिए इस्तेमाल होने वाली किसी जलसंधि को रोकने के लिए कोई कार्रवाई की जा सके।

रास्ते को रोका नहीं जा सकता

एजेंसी ने कहा कि समुद्र के कानून पर यूएन कन्वेंशन का अनुच्छेद 37 सभी जहाजों और विमानों को इन जलसंधियों से गुजरने का अधिकार देता है। इस रास्ते को रोका नहीं जाना चाहिए। कानून के तहत,जलसंधि से सटे देशों को जहाजों या विमानों के आवागमन को रोकने की अनुमति नहीं है। उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे नेविगेशन या उड़ान के दौरान किसी भी ज्ञात जोखिम के बारे में उपयोगकर्ताओं को सूचित करें। जलसंधि से गुजरने की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।वह अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के इस्‍तेमाल के लिए जहाजों से चार्ज लेने का समर्थन नहीं करती है।एजेंसी ने कहा कि वह ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी बहाल करने और होर्मुज जलसंधि से गुजरने वाले कार्गो पर 20 फीसदी चार्ज लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की योजना पर और विवरण सामने आने के बाद ही आगे कोई टिप्पणी करेगी।

IMO ने कर दिया साफ

रॉयटर्स ने संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के एक प्रवक्ता के हवाले से कहा,शुल्क के मामले में हमारा रुख हमेशा एक जैसा रहा है। IMO अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन के लिए इस्तेमाल होने वाली जलसंधियों से गुजरने के लिए शुल्क लेने के सख्त खिलाफ है। ऐसा कोई कानूनी आधार नहीं है जिसके तहत केवल जलसंधि से गुजरने के लिए अनिवार्य टोल (शुल्क) लागू किया जा सके।हाल ही में अपने 137वें सत्र के समापन पर अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की परिषद ने फिर से पुष्टि की कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जहाजों को नेविगेशन के अधिकार मिलते रहने चाहिए। एक प्रस्ताव में उसने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली जलसंधियों से गुजरने के अधिकार को रोका, प्रतिबंधित या निलंबित नहीं किया जाना चाहिए।इसके बयान के अनुसार परिषद ने फिर से पुष्टि की कि अंतरराष्ट्रीय कानून (जिसमें IMO कन्वेंशन भी शामिल है) के अनुसार, जलसंधि से गुजरने का रास्ता किसी भी टोल और चार्ज से मुक्त रहना चाहिए।

होर्मुज जलसंधि इतनी महत्वपूर्ण क्यों है

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक होर्मुज जलसंधि को दुनिया का सबसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तेल पारगमन बॉटलनेक (संकीर्ण मार्ग) माना जाता है। ऐसे चोकपॉइंट (संकीर्ण मार्ग) प्रमुख वैश्विक शिपिंग मार्गों के साथ बने संकरे समुद्री गलियारे होते हैं। इनसे हर दिन बड़ी मात्रा में एनर्जी सप्‍लाई का परिवहन होता है। दुनिया भर में होने वाले तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा ईरान और ओमान के बीच मौजूद उस संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।

चूंकि सऊदी अरब, इराक और संयुक्‍त अरब अमीरात समेत कई बड़े तेल प्रोड्यूसर इसी रास्ते पर निर्भर हैं। इसलिए किसी भी रुकावट के दुनिया भर में नतीजे हो सकते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच नए तनाव ने एक बार फिर स्ट्रेट को फोकस में ला दिया है। इससे शिपिंग सेफ्टी को लेकर चिंता बढ़ गई है। लंबे समय तक रुकावट रहने से तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। एनर्जी इंपोर्ट करने वाली इकॉनमी, खासकर एशिया और भारत पर असर पड़ सकता है।

होर्मुज में रुकावट भले ही वह कुछ समय के लिए हो, कार्गो में देरी कर सकती है,माल ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च बढ़ा सकती है,इंटरनेशनल तेल की कीमतों में तेजी ला सकती है। हालांकि टैंकर कभी-कभी अपना रास्ता बदल सकते हैं,लेकिन दूसरे रास्तों में आमतौर पर ज्‍यादा समय लगता है। खर्च भी ज्‍यादा होता है। कुछ मामलों में कोई सही विकल्प नहीं होता है।

ट्रंप का 20% होर्मुज टोल प्रपोजल भारत पर कैसे असर डाल सकता है

सबसे पहले होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले कार्गो पर चार्ज लगाने से शिपिंग और महंगी हो जाएगी,चाहे वह कार्गो कच्चा तेल हो, लिक्विफाइड नेचुरल गैस हो या रोजमर्रा का सामान हो। बिजनेस इस एक्स्ट्रा कॉस्ट को पूरी तरह से उठाने की उम्मीद नहीं करते हैं। इसका मतलब है कि इसका कम से कम कुछ हिस्सा तो खरीदारों की ओर से चुकाई जाने वाली कीमतों में दिख सकता है।भारत के लिए दांव ज्‍यादा हैं क्योंकि वह खाड़ी देशों से एनर्जी इंपोर्ट पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है। उन शिपमेंट का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर जाता है। अगर इस रास्ते से कार्गो ट्रांसपोर्ट करना ज्‍यादा महंगा हो जाता है तो भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है। खासकर अगर ज्‍यादा फ्रेट चार्ज के साथ इंश्योरेंस कॉस्ट भी बढ़ जाए या तेल की कीमतें भी बढ़ जाएं।इसका असर पेट्रोल और डीजल से भी आगे जाएगा। जो इंडस्ट्रीज इंपोर्टेड क्रूड, गैस, केमिकल्स और फर्टिलाइजर पर निर्भर हैं, उन्हें ज्‍यादा इनपुट कॉस्ट का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, अगर बिजनेस कुछ बढ़ोतरी आगे बढ़ाते हैं तो कंज्यूमर्स को इसका असर महसूस हो सकता है।
कुल मिलाकर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रस्तावित चार्ज लागू होता है या नहीं, यह कब तक लागू रहता है और क्या शिपिंग कंपनियां कॉस्ट का कुछ हिस्सा उठाती हैं।

महंगाई बढ़ने का डर

भारत की जून रिटेल महंगाई बढ़कर 4.38 फीसदी हो गई, जो 17 महीनों में पहली बार आरबीआई के मीडियम-टर्म 4 फीसदी महंगाई टारगेट को पार कर गई। जून के महंगाई के आंकड़े पॉलिसी बनाने वालों को होर्मुज के आसपास नए तनाव के बीच अनिश्चित माहौल की चेतावनी देते हैं। इससे तेल की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं। वहीं, अल नीनो का खतरा भी बना हुआ है। ICICI बैंक के समीर नारंग और ज्योति शर्मा ने एक नोट में लिखा,तेल की कीमतें एक बार फिर बढ़ने लगी हैं। इससे महंगाई के साथ-साथ ग्रोथ में भी अनिश्चितता का एलिमेंट जुड़ गया है।ईरान संघर्ष के बीच इस साल तेल की कीमतें कई सालों के हाई पर पहुंच गई थीं। हाल ही में गिरकर 75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई थीं। हालांकि, नए तनाव ने तेल की कीमतों को फिर से बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स एक महीने के हाई पर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है।ग्लोबल क्रूड की कीमतों में एक और उछाल से भारत की तेल मार्केटिंग कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा। इस साल मई तक, भारत ने किस्तों में रिटेल फ्यूल की कीमतें तेजी से बढ़ा दी थीं।

पब्लिक फाइनेंस पर पड़ेगा दबाव

लंबे समय तक ऊंची तेल की कीमतें पब्लिक फाइनेंस पर दबाव डालेंगी। इसके फिस्कल डेफिसिट के रास्ते को बदल सकती हैं। अगर फ्यूल सब्सिडी बढ़ती है तो इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च की योजनाओं को भी फिर से जांचने की जरूरत पड़ सकती है।पश्चिम एशिया भारत के LNG इंपोर्ट का मुख्य सोर्स भी है। देश की लगभग 4/5 खरीदारी इसी इलाके से होती है। इसमें से लगभग 60 फीसदी होर्मुज स्ट्रेट से होकर जाती है। इससे रास्ते में कोई भी रुकावट एनर्जी सप्लाई के लिए एक संभावित रिस्क बन जाती है।तेल की कीमतों में तेजी, बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और दुनिया भर में रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट भी रुपये को और कमजोर कर सकते हैं। यह आज एक बार फिर डॉलर के मुकाबले 96 के पार चला गया।

तेल की कीमतों और ग्लोबल ट्रेड का क्या हो सकता है

होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले कार्गो पर 20 प्रतिशत चार्ज का असर खाड़ी से भी आगे ग्लोबल ट्रेड पर पड़ सकता है। शिपिंग कंपनियों को यह तय करना होगा कि वे एक्स्ट्रा कॉस्ट को खुद उठाएं या कस्टमर्स पर डालें। अगर वे बाद वाला ऑप्शन चुनते हैं तो क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस से लेकर कंज्यूमर गुड्स तक सब कुछ इंपोर्ट करने वाले बिजनेस को ज्‍यादा पेमेंट करना पड़ सकता है। ये कॉस्ट आखिरकार कंज्यूमर्स तक पहुंचेगी।हालांकि कुछ लोग यह कह सकते हैं कि अमेरिका-ईरान टेंशन फिर से शुरू होने के बाद से इस बार तेल में धीमी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन, 20 फीसदी ईरान टोल प्लान इस बात के लिए मायने रखता है कि यह क्या इशारा करता है। होर्मुज के रास्ते शिपिंग में रुकावट से सप्लाई में कमी हो सकती है। इससे इस महीने की शुरुआत में सरप्लस के अनुमान उलट जाएंगे।

लिपो ऑयल एसोसिएट्स के प्रेसिडेंट एंडी लिपो ने CNBC के स्क्वॉक बॉक्स एशिया को बताया कि अगर ट्रंप का प्रस्तावित चार्ज कच्चे तेल के शिपमेंट पर लागू होता है तो इससे होर्मुज स्ट्रेट से तेल ले जाने की लागत में लगभग 16 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिकी एडमिनिस्ट्रेशन ने अभी तक इस बारे में डिटेल्स नहीं दी हैं कि यह प्रस्ताव असल में कैसे काम करेगा। CNBC ने यह भी बताया कि सिटी ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा चार्ज लागू किया जाता है तो यह प्रस्ताव आने वाले समय में बड़े मिलिट्री टकराव का खतरा बढ़ा सकता है।ग्लोबल ट्रेड पर इसका बड़ा असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ऐसा चार्ज लागू होता है या नहीं, यह कब तक लागू रहता है और दूसरे देश इस पर कैसे रिस्पॉन्स देते हैं। हालांकि, कुछ प्रोड्यूसर्स के लिए दूसरे एक्सपोर्ट रूट मौजूद हैं। लेकिन, वे होर्मुज स्ट्रेट की कैपेसिटी को पूरी तरह से रिप्लेस नहीं कर सकते। नतीजतन, शिपिंग लागत में लंबे समय तक बढ़ोतरी से फ्री शिपिंग बढ़ सकती है।

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