भारत ने सिंधु जल संधि पर ठुकराया हेग कोर्ट का फैसला, UNHRC पहुंचा विवाद,पाकिस्तान में सूखे का खतरा
भारत ने सिंधु जल संधि पर ठुकराया हेग कोर्ट का फैसला, UNHRC पहुंचा विवाद,पाकिस्तान में सूखे का खतरा

16 Sep 2026 |   29



 

नई दिल्ली।भारत ने सिंधु जल संधि पर द हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट के फैसले को ठुकरा दिया है।अब पाकिस्तान विकल्पहीन हो गया है।सिंधु जल संधि पर 1960 में दस्तखत किए गये थे और लगभग 60 सालों तक ये संधि कायम रही, लेकिन पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को निलंबित कर दिया था। हाल ही में द हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने भारत के इस कदम को समझौते के तहत अनुचित ठहराया,जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया है।

अंतर्राष्ट्रीय अदालत के फैसले पर भारत का सख्त जवाब

इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में एक भारतीय एनजीओ ने इस जल संधि की समीक्षा की मांग उठाने से इस्लामाबाद की चिंताएं और गहरा गई हैं।एक भारतीय एनजीओ ने सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग की है। तर्क है कि इलाके में पानी की सुरक्षा से जुड़ी बदलती स्थितियों को देखते हुए 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते पर आज के दौर में मानवाधिकारों के नजरिए से फिर से विचार करने की जरूरत है।

सिंधु जल संधि का मामला UNHRC पहुंचा

सुरक्षित पीने के पानी और साफ-सफाई के मानवाधिकारों पर स्पेशल रैपोर्टेयर के साथ बातचीत के तहत यूएन मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र में आइटम 3 पर मौखिक बयान देते हुए दिल्ली स्थित एनजीओ ने कहा कि पानी तक पहुंच का सीधा संबंध जीवन,स्वास्थ्य,भोजन,आवास,सम्मान और विकास के अधिकारों से है।सुरक्षित और साफ पीने के पानी और साफ-सफाई तक पहुंच को यूएन द्वारा एक बुनियादी मानवाधिकार के तौर पर मान्यता दिए जाने का जिक्र करते हुए बयान में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय जल संधियों को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि वे देशों की मानवाधिकारों से जुड़ी जिम्मेदारियों को पूरा करने की क्षमता को मजबूत करें न कि उसमें रुकावट डालें।बयान में कहा गया कि मौजूदा संधि को लागू करने से राज्यों को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले समुदायों के प्रति अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने से नहीं रोका जाना चाहिए। इसमें कहा गया कि समुदायों के लिए पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बुनियादी प्राथमिकता होनी चाहिए और सिंधु जल संधि की समीक्षा को जरूरी बताया गया साथ ही इसके मौजूदा ठंडे बस्ते में पड़े होने का भी जिक्र किया गया।

भारत के फैसले से खतरे में पाकिस्तान की नदियां

पाकिस्तान ने पहले भी संधि के तहत पश्चिमी नदियों के ऊपरी बेसिन इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन पर सवाल उठाए थे। 2022 के बाद भारत ने रातले और किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट के मामले में न्यूट्रल एक्सपर्ट्स की बैठकों में हिस्सा लिया था,लेकिन अप्रैल 2025 में पाकिस्तान द्वारा एकतरफा तौर पर संधि को निलंबित करने के बाद से यह प्रक्रिया रुक गई है। पाकिस्तान अब कह रहा है कि उसकी नदियों को भारत के फैसले से खतरा है।

पश्चिमी नदियों पर नियंत्रण का खतरा

समझौते के तहत सिंधु,झेलम और चिनाब का 80 फीसदी से ज्यादा पानी पाकिस्तान को मिलता रहा है। भारत के सख्त रुख और बांध निर्माण/भंडारण परियोजनाओं के कारण इन नदियों का प्रवाह नियंत्रित करने की भारत की क्षमता बढ़ गई है।

पाकिस्तान की खेती पर असर

पाकिस्तान की 80 फीसदी से ज्यादा सिंचित कृषि सिंधु नदी घाटी पर निर्भर है। पानी के प्रवाह में किसी भी कमी या अनियमितता से पंजाब और सिंध प्रांत में गेहूं, चावल और कपास की फसलें पूरी तरह तबाह हो सकती हैं।

भयंकर जल संकट

पाकिस्तान पहले से ही भीषण जल संकट से जूझ रहा है। जल प्रवाह रुकने या कम होने से कराची और लाहौर जैसे बड़े शहरों में पीने के पानी और पनबिजली का गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

सूखा और खाद्य असुरक्षा

नदियों का प्रवाह प्रभावित होने से भूजल का स्तर तेजी से गिरेगा,जिससे पाकिस्तान में लंबे समय तक सूखा और खाद्य असुरक्षा की स्थिति बन सकती है।भारत ने साफ कर दिया है कि सिंधु जल संधि अब तभी बहाल होगा जब पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को खत्म करे। 

बता दें कि बीते दिनों दिए एक इंटरव्यू में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था,नहीं इसे (संधि को) कभी बहाल नहीं किया जाएगा और पाकिस्तान संधि पर भारत के रुख का विरोध कर रहा है। कुल मिलाकर देखा जाए तो सिंधु जल संधि का भविष्य चाहे जो भी हो इस बात की संभावना कम ही है कि यह अप्रैल 2025 से पहले अपने पुराने स्वरूप में वापस आ पाएगी।

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