नई दिल्ली।अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध से कच्चे तेल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने के बाद कई देशों में पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ है।इसका असर विश्व के तमाम देशों पर पड़ा है।इंडोनेशिया से लेकर ग्वाटेमाला,पुर्तगाल, बांग्लादेश,श्रीलंका और सीरिया तक जैसे देशों में विरोध-प्रदर्शन,ईंधन की कमी,बिजली कटौती और ट्रांसपोर्ट हड़ताल जैसी स्थिति बन गई है।खास बात यह है कि जब विश्व में हाहाकार मचा है,तब विश्व में सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर न के बराबर रहा है।अब सवाल है कि आखिर भारत में ऐसा क्या है कि यहां पेट्रोल-डीजल के दामों में ज्यादा उछाल नहीं देखने को मिला।
क्रू़ड ऑयल महंगा होने पर पेट्रोल-डीजल पर दबाव
कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचने से उन देशों पर सबसे ज्यादा दबाव आया है,जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस आयात करते हैं।तेल महंगा होने का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की लागत पर पड़ता है। इसके बाद ट्रांसपोर्ट महंगा होता है और खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की दूसरी चीजों की कीमत बढ़ने लगती है।एशिया के कई विकासशील देशों के सामने मुश्किल और बड़ी है। ये देश पहले से ही कर्ज और कमजोर सरकारी वित्तीय स्थिति से जूझ रहे हैं। ऐसे में एक तरफ पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव है तो दूसरी तरफ जनता को राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ाने की मजबूरी।यही वजह है कि कई जगह सरकारों के सामने सवाल खड़ा हो गया है कि ईंधन की बढ़ी कीमत जनता पर डालें या सरकारी खजाने से सब्सिडी देकर कीमतों को नियंत्रित रखें।
इंडोनेशिया में पेट्रोल की राशनिंग,गैस की भी कमी
इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी प्रांत की राजधानी मकास्सर में ईंधन और रसोई गैस की कमी की खबरों के बीच लोगों को लंबी कतारों का सामना करना पड़ रहा है।कुछ जगह बिजली कटौती भी हो रही है।पेट्रोल की राशनिंग के लिए वाहनों की नंबर प्लेट के आधार पर व्यवस्था लागू किए जाने का टैक्सी चालकों ने विरोध किया। दूसरी ओर योग्याकार्ता में छात्रों ने बढ़ती ईंधन कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन किया।इंडोनेशिया में सब्सिडी वाले ईंधन का लाभ अमीर और मध्यम वर्ग के लोगों तक पहुंचाने को लेकर भी बहस तेज है।युद्ध से पहले सरकार ने तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल मानकर अपनी गणना की थी,लेकिन संघर्ष के बाद सरकारी कर्ज पर दबाव बढ़ गया है।
फिलीपींस में डीजल महंगा,मछुआरे भी परेशान
फिलीपींस में डीजल और गैसोलीन की कीमत बढ़ने का असर सीधे मछुआरों पर पड़ा है।मनीला बे के कई मछुआरे समुद्र में जाने के लिए ईंधन खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।बस और राइड-शेयर ड्राइवर भी बढ़ती लागत के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। कई ड्राइवर काम पर नहीं जा रहे हैं, क्योंकि कमाई का बड़ा हिस्सा ईंधन पर खर्च हो रहा है।फिलीपींस सरकार ने सार्वजनिक परिवहन चालकों को करीब 80 डॉलर की एकमुश्त मदद देने का ऐलान किया,लेकिन ड्राइवर संगठनों का कहना है कि यह राहत पर्याप्त नहीं है। एक संगठन के मुताबिक, 15 से 18 घंटे काम करने के बाद भी कमाई कई बार सिर्फ एक भोजन के बराबर रह गई है।
ग्वाटेमाला में सड़कों पर उतरे लोग,गाड़ियां तक जलाईं
सेंट्रल अमेरिकी देश ग्वाटेमाला में ट्रांसपोर्ट कर्मचारियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ईंधन की कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की मांग सिर्फ कीमतों पर नियंत्रण तक सीमित नहीं रही। कुछ समूह ईंधन टैक्स हटाने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की मांग कर रहे हैं।एग्रीकल्चर सेक्टर पर भी इसका असर है,क्योंकि किसानों के लिए ट्रैक्टर और दूसरी मशीनों में डीजल की जरूरत होती है। बढ़ती लागत ने किसानों की परेशानी बढ़ाई है।ग्वाटेमाला सिटी में हुए प्रदर्शनों के बाद राजधानी के पास विला नुएवा में सड़कों पर कारों में आग लगाए जाने के वीडियो भी सामने आए।
पुर्तगाल में कारों से हॉर्न बजाओ प्रदर्शन
साउथ यूरोपियन देश पुर्तगाल में डीजल की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद लोगों ने अनोखे तरीके से विरोध किया। सोशल मीडिया के जरिए आयोजित प्रदर्शनों में ड्राइवरों ने अपनी गाड़ियां धीमी गति से चलाते हुए लगातार हॉर्न बजाए। इससे राजधानी लिस्बन समेत कई प्रमुख सड़कों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी। एक कार काफिले ने साइनस स्थित एक बड़ी रिफाइनरी के आसपास की सड़कों तक पहुंच भी बाधित की।यह दिखाता है कि ईंधन की कीमतों का असर सिर्फ विकासशील देशों तक सीमित नहीं है।महंगे पेट्रोल-डीजल का दबाव विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी आम लोगों और कारोबार पर पड़ रहा है।
बांग्लादेश में डीजल के साथ बिजली संकट
बांग्लादेश अपनी जरूरत के 90 फीसदी से ज्यादा पेट्रोलियम उत्पाद आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। ईंधन और एलएनजी की सप्लाई में परेशानी का असर बिजली उत्पादन पर पड़ा है।बिजली की कमी के कारण कुछ गारमेंट फैक्ट्रियों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। कई फैक्ट्रियों ने गैस की कमी के बाद डीजल का इस्तेमाल शुरू किया था, लेकिन अब डीजल महंगा होने से उनकी लागत और बढ़ गई है।गाजीपुर के एक गारमेंट अधिकारी के मुताबिक फैक्ट्रियों में दिन में चार-पांच बार बिजली कट रही है। कई घंटे काम रुकने से उत्पादन और मजदूरों की कमाई दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
श्रीलंका में कंपनियां घाटे में,कीमत बढ़ाने की तैयारी
श्रीलंका में सरकार हर महीने ईंधन की कीमत तय करती है,लेकिन ईंधन वितरण कंपनियों ने सप्लाई सीमित करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि मौजूदा कीमतों पर उन्हें नुकसान हो रहा है। सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाने और सब्सिडी देने के विकल्प पर विचार कर रही है,लेकिन श्रीलंका पहले से ही भारी कर्ज के दबाव में है। ऐसे में ज्यादा सब्सिडी देना सरकारी वित्त पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है।
सीरिया में 40% तक बढ़े दाम तो सड़कों पर उतरे लोग
सीरिया में सरकार ने पेट्रोल,डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 40 फीसदी तक अस्थायी बढ़ोतरी का ऐलान किया। इसके कुछ ही घंटे बाद कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए। लोगों ने चौराहों पर प्रदर्शन किया, ट्रैफिक रोका और टायर जलाए। प्रदर्शनकारी ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी वापस लेने की मांग कर रहे थे। सरकार का कहना है कि युद्ध की वजह से कीमतें बढ़ाना मजबूरी है।
भारत में पेट्रोल-डीजल पर इतना असर क्यों नहीं
भारत भी कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर यहां भी पड़ सकता है,लेकिन भारत में इसका असर कई दूसरे देशों जैसा तुरंत और तेज नजर नहीं आया। इसकी एक बड़ी वजह घरेलू ईंधन कीमतों की व्यवस्था है। भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत सिर्फ उस दिन के अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव पर तय नहीं होती। इसमें कच्चे तेल की लागत के अलावा रिफाइनिंग, फ्रेट, डीलर कमीशन और केंद्र व राज्य सरकारों के टैक्स जैसे कई घटक शामिल होते हैं।इसके अलावा भारत के तेल विपणन क्षेत्र में सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हर उतार-चढ़ाव का असर आम ग्राहक तक उसी अनुपात में और तुरंत पहुंचना जरूरी नहीं है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल करता है आयात
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन अलग-अलग स्रोतों से खरीद,रिफाइनिंग क्षमता और घरेलू मूल्य निर्धारण व्यवस्था भी असर को प्रभावित करती है। यही अंतर भारत को उन देशों से अलग करता है जहां ईंधन की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों का असर ज्यादा सीधे दिखाई देता है।हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह सुरक्षित है। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है, तो आयात बिल, महंगाई, रुपए पर दबाव और परिवहन लागत जैसे क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों के साथ-साथ महंगाई पर भी नजर रहेगी।