नई दिल्ली।विश्व को एक बेहद बुनियादी चीज का एहसास हो गया है।संकट में सोना-चांदी पेट की आग नहीं बुझेगी और ना ही इन्हें चबाकर जिंदा रह सकते हैं।अमेरिका और ईरान जंग के बीच विश्व की प्राथमिकता बदल गई है।अब वह बेहद बुनियादी चीजों को जुटाने में लग गई है।तमाम देश आज खाने-पीने की चीजों को इकट्ठा कर रहे हैं,जिससे विश्व के बाजारों में चावल की मांग बढ़ गई है।भारत में भी इसके दाम तेजी से बढ़े हैं।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बासमती चावल की कीमतें पिछले साल के मुकाबले 15-20 फीसदी बढ़ गई हैं। वहीं, गैर-बासमती चावल के दाम 20-25 फीसदी बढ़े हैं। वजह विदेश से ज्यादा मांग और दक्षिण भारत में कम बारिश है।अक्टूबर-नवंबर में नई फसल आने तक कीमतें ज्यादा रहने की संभावना है।लिहाजा ग्राहकों को जल्द राहत मिलने की उम्मीद कम है।
चावल एक्सपोर्ट और मार्केटिंग करने वाली कंपनी राइसविला ग्रुप के सीईओ सूरज अग्रवाल का कहना है कि दुनियाभर में सभी देश अपनी फूड सप्लाई सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। चावल मुख्य खाद्य पदार्थों में से एक है। इसलिए वे इसे तेजी से खरीद रहे हैं। खाड़ी देश भारत से भारी मात्रा में चावल खरीद रहे हैं।अग्रवाल ने कहा कि मांग में तेजी के कारण बासमती चावल की कीमत वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में लगभग 100 रुपये प्रति किलो हो गई है।जबकि पिछले साल इसी समय यह 85 रुपये प्रति किलो थी। इसका बिरयानी में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। यह बढ़ोतरी गैर-बासमती चावल की किस्मों में भी देखी गई है। इससे घरों के बजट पर दबाव पड़ा है।
सूरज अग्रवाल ने कहा कि सोना मसूरी चावल की कीमत पिछले साल 51-52 रुपये प्रति किलो थी। अब 63-64 रुपये प्रति किलो हो गई है।अग्रवाल ने कहा कि निकट भविष्य में कीमतों में कमी आने की संभावना नहीं है। कारण है कि बाजार में मांग ज्यादा है और नई सप्लाई सीमित है।अग्रवाल ने कहा,कीमतों के जल्द कम होने की संभावना नहीं है। अमेरिका-ईरान के बीच अभी कोई समझौता नहीं हुआ है। खरीफ की फसल आने में अभी लगभग दो से तीन महीने बाकी हैं।'
एक्सपोर्ट मार्केट बासमती चावल की कीमतों को मजबूत सहारा दे रहा है। KRBL लिमिटेड में बल्क राइस एक्सपोर्ट के चीफ अक्षय गुप्ता ने कहा कि भारतीय बासमती की मांग मजबूत बनी हुई है। भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 154 देशों को रिकॉर्ड 65.2 लाख टन चावल भेजा। गुप्त ने कहा कि सऊदी अरब सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। जबकि पश्चिम एशिया से भी पूछताछ काफी हो रही है। हालांकि खाड़ी कॉरिडोर में पेमेंट और शिपिंग में रुकावटों के कारण शिपमेंट धीमा हो गया है। इससे मांग का बैकलॉग बन गया है, न कि खरीदने की दिलचस्पी कम हुई है।
अक्षय गुप्ता ने कहा,2025 की फसल की बिक्री उम्मीद से ज्यादा तेजी से हुई।अक्टूबर में नई फसल आने तक बहुत कम स्टॉक बचा है। घरेलू कीमतें इस कमी की वजह से तय हो रही हैं, न कि एक्सपोर्ट की वजह से।घरेलू बाजार पर सरकारी खरीद और असमान बारिश का भी दबाव है।
राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट बी.वी. कृष्णा राव ने कहा कि पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन के लिए सरकार की खरीद ने कीमतों में बढ़ोतरी में योगदान दिया है।राव ने कहा,तेलंगाना में सरकार PDS के जरिए नॉन-बासमती चावल बांट रही है। साथ ही आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में कम बारिश की वजह से कीमतें मजबूत बनी हुई हैं।
राव ने कहा कि अगली खरीफ फसल आने में अभी कुछ हफ्ते बाकी हैं। इसलिए ट्रेडर्स को उम्मीद है कि कीमतें कुछ समय तक ऊंची बनी रहेंगी। कीमतों में कोई खास कमी नई फसल के आने, बारिश में सुधार और विदेशों से खरीद में कमी पर निर्भर करेगी। तब तक चावल की ऊंची कीमतों का बोझ ग्राहकों को ही उठाना पड़ सकता है।