नई दिल्ली।गांव का नाम सुनते ही जहन में कच्ची सड़कों,खेती-किसानी और सीमित सुविधाओं की तस्वीर उभर आती है,लेकिन आज आपकी ये गलतफहमी दूर हो जाएगी,क्योंकि भारत में एक ऐसा गांव है,जिसने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया है।यहां के लोगों के पास सिर्फ पक्के मकान ही नहीं बल्कि बैंक खातों में करोड़ों रुपए हैं।यही वजह है कि इस गांव को विश्व का सबसे अमीर गांव कहते हैं।इसका नाम माधापर है।यह गुजरात के कच्छ जिले में है।रेगिस्तान के पास बसे इस गांव में लोगों का रहन-सहन किसी हाई-टेक शहर से कम नहीं है। माधापर की इस बेहिसाब समृद्धि और तरक्की की चर्चा आज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में होती है।
19 बैंक,8000 करोड़ और हजारों पक्के घर
इस गांव की सबसे बड़ी खासियत इसकी आर्थिक मजबूती है।माधापर गांव में लगभग 19 बैंक हैं,जो किसी छोटे शहर में भी कम ही देखने को मिलते हैं।गांव में 7,600 से अधिक पक्के मकान भी हैं।इसके साथ ही यहां रहने वाले लोगों के बैंक खातों में बड़ी रकम भी जमा है।कई रिपोर्ट्स के मुताबिक इस गांव के लोगों के बैंकों में 8000 करोड़ से ज्यादा रुपये जमा हैं।ये खासियत यही नहीं रुकती।इस गांव के कई परिवार आर्थिक रूप से इतने मजबूत हैं कि उनके बैंक खातों में औसतन लाखों रुपये जमा हैं।इसके साथ ही माधापर में स्कूल, कॉलेज,अस्पताल,पार्क,झील,मंदिर और गौशाला जैसी सभी जरूरी सुविधाएं भी मौजूद हैं।सुविधाओं के मामले में यह गांव कई शहरों को भी टक्कर दे सकता है।
ये गांव कैसे बना अमीर
इन सारी जानकारियों को पढ़ने के बाद आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि आखिर माधापर विश्व का सबसे अमीर गांव कैसे बना।इस गांव का अमीर बनने का सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां के लोगों का विदेशी जुड़ाव होना। लगभग 80 हजार की आबादी वाले इस गांव के बड़ी संख्या में लोग कई दशक पहले रोजगार और कारोबार के लिए विदेश चले गए थे।आज गांव के लगभग 65 फीसदी परिवारों का संबंध एनआरआई से जुड़ा है।इनमें से कई लोग ब्रिटेन, अमेरिका,अफ्रीका और खाड़ी (गल्फ) देशों में रहते हैं। विदेश में रहकर ये लोग नियमित रूप से अपने परिवारों को पैसे भेजते हैं,जिससे गांव की आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत होती गई।इतना ही नहीं कई एनआरआई सालों तक विदेश में सफल कारोबार करने के बाद वापस माधापर लौट आए हैं।
इस गांव के लोगों की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि विदेश में रहने के बावजूद उन्होंने अपने गांव से रिश्ता नहीं छोड़ा और इसी सोच को मजबूत करने के लिए 1968 में लंदन में माधापर विलेज एसोसिएशन की स्थापना की गई थी। इस संगठन का सबसे बड़ा उद्देश्य यह था कि वे विदेश में रहने वाले गांव के लोगों को एक-दूसरे से जोड़कर रखना चाहते थे। बाद में इसका एक कार्यालय माधापर में भी खोला गया।
कहां से होती है कमाई
इतनी बेहिसाब दौलत होने के बावजूद माधापर के लोगों ने अपनी मिट्टी और परंपराओं से नाता नहीं तोड़ा है। आज भी इस गांव में आजीविका का मुख्य आधार खेती ही है। यहां पैदा होने वाले कृषि उत्पाद मुंबई सहित देश के कई महानगरों में सप्लाई किए जाते हैं।