नई दिल्ली।अमेरिका ने धारा 301 के तहत भारतीय सामानों पर 10 फीसदी टैरिफ लागू किया है।अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस कदम का भारत के कुल निर्यात पर तात्कालिक असर बेहद सीमित रहेगा।पहले प्रस्तावित 12.5 फीसदी की तुलना में यह फैसला भारत के लिए राहत भरा माना जा रहा है।
अर्थशास्त्री सुनील आर पारेख ने ANI से बात करते हुए कहा कि टैरिफ दर को 12.5 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी किया जाना एक सकारात्मक परिणाम है।यह दिखाता है कि भारत अमेरिकी प्रशासन के सामने अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने में सफल रहा है।भारत उन देशों में शामिल है,जिन पर अमेरिकी कार्रवाई के तहत सबसे कम टैरिफ लगाया गया है।
आर पारेख ने कहा कि 12.5 फीसदी से 10 फीसदी के अंतर का आर्थिक दृष्टिकोण से कोई बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा। यह एक अच्छा कदम है और दर्शाता है कि हम सही बातचीत कर पाए हैं।भारतीय निर्यातकों पर बंधुआ मजदूरी के आरोपों को उन्होंने पूरी तरह से निराधार बताया और कहा कि भारत के श्रम कानून बहुत सख्त हैं।पारेख ने जोर देकर कहा कि अमेरिकी नीतियों में बदलाव के जोखिम से बचने का सबसे अच्छा तरीका अपने निर्यात बाजार का दायरा बढ़ाना है।पारेख ने कहा कि कम टैरिफ का सबसे ज्यादा फायदा कपड़ा जैसे श्रम-केंद्रित क्षेत्रों को मिल सकता है,जहां भारत वैश्विक स्तर पर कड़ा मुकाबला करता है।
बता दें कि टेक्नोलॉजी में निवेश,मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा और नए बाजारों की तलाश ही भारतीय निर्यात को भविष्य के टैरिफ झटकों से सुरक्षित रखेगी।अमेरिका के इस टैरिफ से भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता पर कोई खास असर पड़ने की संभावना नहीं है।
देश के शीर्ष निर्यातक संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन ने कहा कि कई प्रतिस्पर्धी देशों पर भारत के समान या उससे भी अधिक टैरिफ लगाया गया है।
अमेरिका ने भारत को 10 फीसदी वाली निचली टैरिफ श्रेणी में रखा है,जबकि चीन,वियतनाम,थाईलैंड,यूएई,ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे कई प्रतिस्पर्धी देशों पर 12.5 फीसदी का उच्च टैरिफ लगाया गया है,जिन देशों पर 12.5 फीसदी टैरिफ लगा है,वहां से अमेरिकी खरीदार भारत की ओर रुख कर सकते हैं। 2.5 फीसदी का यह अंतर प्रतिस्पर्धी बाजारों में काफी मायने रखता है।स्टील,एल्युमीनियम,ऑटो कंपोनेंट्स, फार्मास्यूटिकल्स,फार्मा अवयव और कुछ कृषि उत्पाद,जो धारा 232 के तहत आते हैं,उन्हें इस अतिरिक्त टैरिफ से छूट मिलती रहेगी।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव ने 10 फीसदी का फोर्स्ड-लेबर (बंधुआ मजदूरी) टैरिफ लगाने के फैसले के औचित्य पर सवाल उठाए हैं। GTRI का कहना है कि अमेरिकी सरकार का यह कदम किसी ठोस सबूत पर आधारित नहीं है और ऐसा प्रतीत होता है कि इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार बाधाओं को बनाए रखना है।