धनंजय सिंह।आने वाले दिनों में दस सीटों पर राज्यसभा का चुनाव होगा।राज्यसभा चुनाव पर सबकी नजर है। समाजवादी पार्टी ने अपने दो प्रत्याशी का नामांकन भी करा दिया है। भारतीय जनता पार्टी में अभी मंथन ही चल रहा है।हाल के चुनावों में भाजपा को सफलता मिली है,लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा कमजोर रही।अब राज्यसभा सीटों के लिए दावेदारों को सामने लाने से पहले सबसे अधिक सांसद देने वाले यूपी में भाजपा बहुत फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रही है।पश्चिमी यूपी में भाजपा भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर मंथन कर रही है।विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी राज्यसभा चुनाव के लिए क्यों अहम है।
पश्चिमी यूपी में भाजपा के लिए संगठनात्मक दृष्टि से जो 14 जिले हैं,उनमें पकड़ 2024 में कमजोर हुई थी। भाजपा के सामने कई प्रकार की दुविधा भी है। भाजपा किसी भी तरह का ऐसा कोई मैसेज किसी भी वर्ग में नहीं देना चाहती,जिससे वह उपेक्षित महसूस करे।
पश्चिमी यूपी में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को उन कई सीटों पर हारी थी,जहां 2019 में उसके सांसद जीत कर आए थे। 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में संभल,सहारनपुर, रामपुर,मुजफ्फरनगर,बदायूं,कैराना,नगीना में इंडियन का कब्जा रहा था।अब राज्यसभा चुनाव में भाजपा के उन नेताओं को उम्मीद है,जो हाशिये पर हैं।कई ऐसे राजनेता हैं,जो या तो नल और कमल की जुगलबंदी की वजह से चुनाव नहीं लड़ पाए या अपनी सीट पर जीत दर्ज नहीं करा पाए। इन नेताओं को भी पार्टी से उम्मीदें हैं।
राज्यसभा चुनाव को लेकर अगर पश्चिमी यूपी को ध्यान में रखते हुए बात की जाए तो यहां जो भी सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं वे भाजपा और सपा के खाते में जाएंगी।सपा दो पर प्रत्याशी उतार चुकी है।वहीं भाजपा अभी तक मंथन और चिंतन कर रही है।हालांकि सपा अभी एक और प्रत्याशी उतारने के मूड में है।नामांकन करने के लिए जो निश्चित तारीख है, वह भी नजदीक आ रही है,ऐसे में नामांकन में भी ज्यादा समय नहीं बचा है।भाजपा को भी जल्द ही प्रत्याशियों के नाम की घोषणा करनी चाहिए,ऐसे में 7 सीटें भाजपा की कन्फर्म मानी जा रही हैं,एक सीट पर मुकाबला हो सकता है।
ऐसे में भाजपा को यहां निश्चित ही जातीय समीकरण, सामाजिक समीकरण समेत दूसरे समीकरण साधने पड़ेंगे। विशेष रूप से पश्चिमी यूपी में भाजपा को यहां कई तरह से गुणा-गणित लगाने की आवश्यकता है,क्योंकि 2019 में भाजपा का जो सियासी ग्राफ था,वह काफी प्रभावशाली था। यूपी में 62 लोकसभा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। बाद में एक सीट उपचुनाव में जीतकर 63 सीटों पर कब्जा कर लिया था,लेकिन 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को भारी नुकसान झेलना पड़ा था।भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में 33 सीट ही जीत पाई थी,हालांकि भाजपा के सहयोगी दल रालोद दो सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत दर्ज की,जबकि अपना दल (सोनेलाल पटेल) ने भी एक सीट पर जीत दर्ज की थी।दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों पर जीत दर्जकर भाजपा के रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। इंडिया गठबंधन के दूसरे दल कांग्रेस की भी सीटों में बढ़ोतरी हुई थी, कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी।इस तरह से पश्चिमी यूपी में भी भाजपा को बड़ा झटका लगा था।अकेले पश्चिमी यूपी में 7 सीटों पर पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था. जबकि दो सीटें यहां रालोद को दी थीं।
भाजपा जहां पर हारी,वहां जातीय समीकरणों को साधने के लिए भी प्रयास कर सकती है।यहां भाजपा को मजबूत करने के लिए जाट समाज को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। पश्चिमी यूपी में रालोद भाजपा के साथ है,लेकिन अगर बात समाज के प्रतिनिधित्व की जाए तो वर्तमान में सिर्फ एक सांसद फतेहपुर सिकरी में ही इस समाज से आते हैं। सांसद राजकुमार चाहर के अलावा पार्टी के पास पश्चिमी यूपी में,जबकि कई ऐसे नेता हैं जो राज्यसभा चुनाव को लेकर ये उम्मीद लगाए हैं।
इनमें दो जाट समाज के बड़े नाम सामने हैं,एक पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री डॉक्टर संजीव बालियान हैं,जो सपा प्रत्याशी हरेंद्र मलिक से 2024 में हार गए थे।दूसरे बागपत सीट पर दो बार विजयी रहे मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह,जिन्हें गठबंधन धर्म निभाते हुए सीट त्यागनी पड़ी थी।पश्चिमी यूपी में भाजपा इन दोनों नेताओं में से किसी को राज्यसभा भेज सकती है।
पश्चिमी यूपी इन दिनों जो चर्चा तेज है,उसके मुताबिक रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को भी राज्यसभा भेजकर भाजपा किसान वर्ग को लुभा सकती है।साथ ही रालोद के साथ अपने रिश्ते और विश्वसनीय और मजबूत कर सकती है।ऐसा जयंत चौधरी के लिए भी जरूरी है,क्योंकि जब 2028 में जयंत चौधरी का राज्यसभा सांसद के तौर पर कार्यकाल पूरा होगा तो 2029 के लोकसभा चुनाव में जयंत चौधरी तकनीकी रूप से अगर किसी सदन के सदस्य नहीं रहे तो उनका मंत्री पद पर उस वक्त बने रहना सम्भव नहीं हो पाएगा।हालांकि भाजपा ऐसा करती है तो पार्टी के जाट नेताओं को भी पार्टी को विश्वास में लेना होगा कि उन्हें ये भी न लगे कि पार्टी में उनकी अहमियत कम नहीं हुई है।
इस समय एनडीए में रालोद शामिल है,ऐसे में पश्चिमी यूपी में भाजपा के महत्वपूर्ण साथी जयंत चौधरी हैं।अभी जयंत चौधरी का राज्यसभा में कार्यकाल पूरा होने में एक वर्ष 9 महीने का समय बचा है। 2022 में जब सपा और आरएलडी साथ थे,तब जयंत चौधरी राज्यसभा गए थे। इस समय ऐसी संभावना भी लग रही है कि जयंत चौधरी राज्यसभा जा सकते हैं,क्योंकि ये चर्चा होती है कि जब जयंत चौधरी भाजपा साथ आए थे तो उस समय एक राज्यसभा सीट को लेकर बात हुई थी,ऐसे में जयंत चौधरी को इस्तीफ़ा देना होगा और ऐसे में उन्हें ये भी स्वतंत्रता रहेगी कि भविष्य में अपनी पार्टी के किसी नेता को राज्यसभा चुनाव लड़ा सकेंगे।
जिस तरह वर्तमान में एक उद्योगपति को सपा ने दावेदार बनाया है,उससे वह तमाम सियासी दलों के निशाने पर है। भाजपा के पास पश्चिमी यूपी में सपा को जवाब देने और किसानों के बीच पार्टी के पक्ष में एक सकारात्मक मैसेज देने का भी एक अवसर है।ऐसे में जयंत चौधरी के पास भी एक मौका होगा, किसी भी कार्यकर्ता को 1 साल और लगभग 9 महीने के लिए राज्यसभा भेजने का,क्योंकि जयंत चौधरी पहले भी ऐसा मैसेज 2024 में दे चुके हैं,जब गठबंधन में बागपत सीट को लेकर उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ता राजकुमार सांगवान को प्रत्याशी बनाया और वे सांसद बन गए।
भारतीय जनता पार्टी पश्चिमी यूपी में Anti-incumbency को लेकर चुनौतीपूर्ण परस्थितियों का सामना कर रही है। अखिलेश यादव लगातार हमलावर हैं।साथ ही ये संभावना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़े सियासी उलटफेर होने हैं,जो एमएलसी और राज्यसभा का चुनाव होगा,ये एक महत्वपूर्ण फैक्टर होगा,क्योंकि इसके बाद फिर विधानसभा चुनाव का फेज शुरू हो जाएगा।ये भी कयास लगाए जा रहे थे कि जो एमएलसी स्नातक शिक्षक की जो सीटें थीं, उनमें से शायद एक रालोद के खाते में चली जाए,लेकिन ऐसा हुआ नहीं है,ऐसे में दोनों खेमो में ये चर्चा हो रही है कि जयंत चौधरी राज्यसभा जा सकते हैं।
रालोद के नेता और बागपत से सांसद राजकुमार सांगवान कहते हैं कि जिस तरह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनके नेता चौधरी साहब के परिवार पर हमले बोल रहे हैं, टिप्पणी कर रहे हैं, ये बर्दाश्त योग्य नहीं है।सपा और रालोद का गठबंधन था तो सपा को राजनैतिक तौर पर लाभ 2022 विधानसभा में हमारी वजह से हुआ।रिश्ता खराब करने का काम समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने किया,उन्होंने ये प्रचारित किया कि राज्यसभा में जयंत चौधरी को भेज दिया,कोई एहसान नहीं किया।जब गठबंधन होते हैं तो बहुत सी बात तय होती हैं। राजकुमार सांगवान कहते हैं कि जो भी निर्णय होगा, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व करेगा।हम NDA के घटक दल हैं और सभी मजबूत होकर एक साथ हैं।
बदायूं से सपा सांसद आदित्य यादव ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की।साथ ही राज्यसभा चुनाव में तीसरा प्रत्याशी सरप्राइज होगा।इस प्रत्याशी को लेकर शीर्ष नेतृत्व बड़ी रणनीति बना रहा है।यह प्रत्याशी आगामी चुनावों में वोटो पर भी असर डालने वाला होगा।