नई दिल्ली।एक ओर जहां भारत की तेज इकोनॉमिक ग्रोथ की दुनियाभर में चर्चा है तो वहीं सितंबर में औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार में गिरावट आई है।यह घटकर 6.7 फीसदी रह गई है। अगस्त में यह 8 फीसदी थी।वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ 7.8 फीसदी रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की घटती रफ्तार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब है।
आईआईपी में सुस्ती का कारण
यह सुस्ती मुख्य रूप से आंकड़ों के तुलनात्मक प्रभाव यानी बेस इफेक्ट के कारण है।यह और बात है कि देश की तेज इकोनॉमिक ग्रोथ की बुनियाद मजबूत बनी हुई है।सरकार के आंकड़ों के मुताबिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का प्रदर्शन शानदार रहा है।प्रमुख उद्योगों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो आर्थिक मजबूती को दिखाता है।इन उद्योगों में मोटर वाहन (19%), इलेक्ट्रिक उपकरण (33.9%) और रबर-प्लास्टिक (19.9%) जैसे उद्योग शामिल हैं।
भारत की ग्रोथ के लिए मजबूत अनुमान
ये आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ को लेकर प्रमुख संस्थानों ने सकारात्मक अनुमान जताए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने अपनी रिपोर्ट में भारत की ग्रोथ के अनुमान को बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया है। पहले यह 6.4 फीसदी था। इसकी वजह देश के भीतर मजबूत घरेलू मांग है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वर्तमान वित्त वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 7.2 फीसदी रखा है। इसके पीछे ग्रामीण मांग में बेहतरी, सामान्य मॉनसून और त्योहारी सीजन में कंजम्पशन में तेजी है। इनसे अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलने की उम्मीद है।