बीएचयू के पुरातत्व विभाग में रखे 2800 साल पुराने नर कंकाल का क्या है रहस्य,जांच से आएगा सामने
बीएचयू के पुरातत्व विभाग में रखे 2800 साल पुराने नर कंकाल का क्या है रहस्य,जांच से आएगा सामने

04 Aug 2026 |   25



 

वाराणसी।काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग में बंद लगभग 2800 साल पुराने कंकाल को मंगलवार को बाहर निकाल गया।यह कंकाल 1957 में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया(एएसआई)द्वारा राजघाट में किए गए पहले उत्खनन के दौरान मिला था और लगभग 69 सालों से संदूक में बंद पुरातत्व विभाग में सुरक्षित रखा हुआ था।लगभग 6 फीट लंबे इस कंकाल को एक विशेष संदूक में सुरक्षित रखने के बाद हाल ही में विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर एमपी अहरीवार ने इसकी वैज्ञानिक जांच करवाने का फैसला लिया है।

इस जांच के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ही जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे और सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंट एंड डायग्नोस्टिक्स हैदराबाद के वैज्ञानिक डॉक्टर प्रज्ववल प्रताप सिंह की टीम वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत संदूक खोला गया।

इस बारे में प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे का कहना है कि रेडियोकार्बन डेटिंग से कंकाल की आयु का पता लगाने की कोशिश की जाएगी।डीएनए परीक्षण से उसे समय काशी में रहने वाले लोगों की आनुवंशिक संरचना उनकी उत्पत्ति आदि के बारे में जानकारी करने की प्लानिंग की गई है।इसके साथ ही ऑक्सीजन और कार्बन आइसोटोप विश्लेषण में उसे वक्त के खान-पान जीवन शैली और भोगौलिक परिवेश का पता चल सकेगा।

प्रोफेसर चौबे का कहना है कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है और इस खोज से न केवल प्राचीन भारतीय सभ्यता के बारे में नहीं जानकारी मिलेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट हो गया कि उसे समय के लोग किस प्रकार के जीवन शैली जी रहे थे।काशी हिंदू विश्वविद्यालय पुरातत्व विभाग के लिए यह एक ऐतिहासिक समय होगा,क्योंकि एक कंकाल भारतीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण अध्याय को खोलने का काम करने जा रहा है।

प्रोफेसर चौबे का कहना है कि कंकाल के अध्ययन से मिलने वाली जानकारी के जरिए न केवल प्राचीन काशी वासियों के बारे में जानकारी मिल सकेगी,बल्कि यह भी साफ होगा कि उसे समय की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना क्या थी, यह अध्ययन भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में नई दिशा की तरफ ले जाने का काम करेगा।

बता दें कि इस संदूक को खोलने की प्रक्रिया में वैज्ञानिकों द्वारा अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया,जिससे कंकाल के संरक्षित नैनो को बिना किसी नुकसान के निकाला जा सके।यह प्रक्रिया न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण है,बल्कि भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में भी नई उपलब्धि मानी जाएगी।बीएचयू के पुरातत्व विभाग के इस प्रयाग से यह भी तथ्य सामने आ सकता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता के बारे में और क्या जानकारी है, जो कि भारतीय इतिहास के अध्ययन में बहुत बड़ा काम कर सके।इस खोज के जरिए एक पुरातात्विक वास्तु के बल पर भारतीय संस्कृति के गहने राज्यों को उजागर करने का काम किया जा सकेगा। फिलहाल पुरातत्व विभाग इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है जो ना केवल वर्तमान पीढ़ी बल्कि भविष्य की पीडिया के लिए भी कारगर होगा।

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