धनंजय सिंह।देश में एक समय नोकिया की बादशाहत कायम थी।भारतीय टेलीकॉम और मोबाइल बाजार के इतिहास में नोकिया सिर्फ एक ब्रांड मोबाइल हैंडसेट ब्रांड नहीं था।इसका ऐसा इमोशन था,जिसने देश के कोने-कोने में डिजिटल क्रांति की नींव रखी।छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक टॉर्च वाला नोकिया 1100 हर हाथ की शान हुआ करता था।ग्लोबल स्मार्टफोन के तूफान और गलत रणनीतियों से भले नोकिया गुमनामी के अंधेरे में खो गया,लेकिन आज भी नोकिया देश के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की एक मजबूत नींव बना हुआ है।
आज भी देश के साथ नोकिया का पुराना रिश्ता इतिहास के पन्नों में अमर है।
साल 2000 में भारत में मोबाइल फोन मार्केट अपने शुरुआती दौर में था।।इस दौर में नोकिया ने यहां कदम रखा।देखते ही देखते नोकिया ने देश के बाजार पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया। नोकिया 3310, 1100 और बाद में ई-सीरीज और एन-सीरीज जैसे मॉडल्स ने देश के मध्यम वर्गीय परिवारों का दिल जीत लिया।मजबूती,लंबी बैटरी लाइफ और आसान इंटरफेस ने लोगों में ऐसा भरोसा पैदा किया कि उस दौर में मोबाइल का मतलब ही नोकिया बन गया था।चेन्नई (श्रीपेरंबुदूर) में अपनी विशाल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के साथ नोकिया ने मेक इन इंडिया की तर्ज पर भारी पैमाने पर उत्पादन किया। देश के लाखों युवाओं को रोजगार देकर यह ब्रांड भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ बना।
साल 2007-08 के आसपास फिल्म बदलनी शुरू हुई। विश्व में टच-स्क्रीन स्मार्टफोन का दौर आया।ऐपल के आईफोन और गूगल के एंड्राइड की बाजार में आमद हुई।नोकिया इस बदलाव को भांपने में चूक गई।भारतीय बाजार में भी जहां युवा वर्ग इंटरनेट,ऐप्स और आधुनिक टच-स्क्रीन अनुभव की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा था। वहीं नोकिया अपने पुराने सिम्बियन ऑपरेटिंग सिस्टम और कीपैड वाले फोनों पर ही अड़ी रही। नोकिया का यह अति-आत्मविश्वास और लोगों की बदलती तकनीकी प्राथमिकताओं को समय पर न समझ पाना नोकिया के पतन का सबसे बड़ा कारण बन गया।धीरे-धीरे नोकिया का दबदबा कम होने लगा।
ग्लोबल लेवल पर नोकिया का पिछड़ने का असर देश में भी साफ दिखाई देने लगा।ऊपर से कानूनी और टैक्स विवादों ने चेन्नई प्लांट की चमक फीकी कर दी।माइक्रोसॉफ्ट की ओर से नोकिया के मोबाइल बिजनेस के अधिग्रहण के बाद जब विंडोज आधारित लूमिया फोन भारतीय बाजार में उतरे तो वे लोगों को रिझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए।स्मार्टफोन बाजार की इस दौड़ में चाइनीज कंपनियों ने उस खाली जगह को तेजी से भर दिया।इसे कभी नोकिया ने अकेले संभाला था।नतीजतन देश के सबसे चहेते ब्रांड नोकिया को बाजार से लगभग बेदखल होना पड़ा।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।कुछ सालों के अंतराल के बाद नोकिया ने एचएमडी ग्लोबल के जरिए एंड्राइड प्लेटफॉर्म पर लौटते हुए भारतीय बाजार में फिर से एंट्री की।पुरानी यादों के सहारे अपनी जगह तलाशनी शुरू की। इसके साथ ही कंज्यूमर हैंडसेट मार्केट की मुख्य दौड़ से पीछे हटने के बाद नोकिया ने देश के टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर और 5जी नेटवर्क डेवलपमेंट में अपनी असली ताकत झोंक दी। आज नोकिया भारत की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों को नेटवर्क उपकरण मुहैया कराने वाली मजबूत और अदृश्य रीढ़ की हड्डी के रूप में देश की डिजिटल ग्रोथ में लगातार योगदान दे रही है।