पाकिस्तान का जल संकट भारत की जिम्मेदारी नहीं
पाकिस्तान का जल संकट भारत की जिम्मेदारी नहीं

26 Sep 2026 |   8



 

धनंजय सिंह।भारत और पाकिस्तान में नदियों के पानी के बंटवारे को सुनिश्चित करने वाली सिंधु जल संधि को इस महीने 66 साल हो गया।यह संधि लगभग 65 सालों तक लगातार चलती रही,जबकि इस दौरान भारत और पाकिस्तान में तीन बार सीधा युद्ध हुआ।भारत ने कभी भी इस संधि पर रोक नहीं लगाई,लेकिन बीते साल यह संधि टूट गयी। पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाया और सिंधु जल संधि पर रोक लगा दी।भारत ने साफ कहा कि खून और पानी साथ नहीं बह सकते।

भारत द्वारा सिंधु जल संधि पर रोक लगाने के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है।पाकिस्तान ने गीदड़भभकी दी है कि अगर पानी रोका गया तो वह इसे युद्ध की कार्रवाई मानेगा।पाकिस्तान का कहना है कि उसकी 20 करोड़ से जनता सिंधु के पानी पर निर्भर है।इस्लामाबाद भारत की कार्रवाई को पानी से वंचित करने की कोशिश के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहा है,लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है।

1960 में हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच बहने वाली 6 नदियों के पानी का बंटवारा हुआ।इसमें भारत को तीन पूर्वी नदियों- रावी, व्यास और सतलुज के पानी पर पूरा अधिकार मिला।पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों-सिंधु, झेलम और चिनाब के मुख्य इस्तेमाल का अधिकार मिला,लेकिन भारत को भी पश्चिमी नदियों के पानी पर घरेलू, कृषि और पनबिजली के इस्तेमाल जैसे अधिकार भी मिले थे।

पाकिस्तान अपने देश में पानी के संकट के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है,वह सही नहीं है।पाकिस्तान का पानी का संकट सिर्फ भारत की वजह से नहीं है।बल्कि पाकिस्तान ने खुद संकट खड़ा किया।

पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था और सिंचाई इस नदी से गहराई से जुड़ी है।पाकिस्तान का पानी का संकट घरेलू प्रबंधन की समस्या भी है।पाकिस्तान में भूजल में कमी देखी गई है। सिंध में यह स्थिति विशेष गंभीर है।विश्व बैंक का अनुमान है कि सिंध में निकाले जाने वाले पानी का 60 से 75 फीसदी हिस्सा बर्बाद हो जाता है।ये समस्या भारत के किसी बांध की वजह से नहीं है।पाकिस्तान के अंदरूनी जल प्रबंधन की हर नाकामी के लिए भारत जो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पाकिस्तान बार-बार आरोप लगाता है कि भारत बांधों और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से उसका पानी रोक रहा है, लेकिन संधि की शर्तें कहीं ज्यादा बारीक हैं।

पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकार सीमित हैं,लेकिन खत्म नहीं हुए हैं।पाकिस्तान ने भारत के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पर सवाल उठाए हैं,लेकिन रन-ऑफ-रिवर परियोजनाएं कोई बड़े नल नहीं हैं,जिन्हें भारत बंद कर देगा। ये परियोजनाएं नदी के बहाव से बिजली पैदा करती हैं और पानी को आगे छोड़ती हैं।

पाकिस्तान को भारत के फैसले को कूटनीतिक और कानूनी चुनौती दे रहा है। ऐसे में भारत को भी एक ऐसे समझौते पर फिर से विचार करने का पूरा हक है, जो 6 दशक पहले और बहुत अलग भू-राजनीतिक दौर में बना था। भारत का सीधा तर्क है- पानी की नीति को सुरक्षा संबंधों से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता।

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