नई दिल्ली।भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 1991 के मध्य में घटकर 1.2 अरब डॉलर रह गया था।बमुश्किल कुछ सप्ताह के जरूरी आयात का खर्च उठाया जा सकता था। मगर आज भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड ऊंचाई पर है।भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि 21 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 729.3 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है।यह भंडार 11 महीने से अधिक के वस्तु आयात और मार्च 2026 के आखिर तक के बकाया विदेशी ऋण के 94 फीसदी हिस्से को चुकाने के लिए पर्याप्त है।यह विदेशी मुद्रा प्रबंधन नीति में बदलाव किए जाने से संभव हुआ है। यह नीतिगत बदलाव 1991 के भुगतान संतुलन (बीओपी) संकट के दौरान किया गया था।
1970 के दशक में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई उछाल और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के तत्कालीन चेयरमैन पॉल वोल्कर द्वारा अपनाई गई बेहद सख्त मौद्रिक नीति के कारण भारत को मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से संपर्क करने के लिए मजबूर होना पड़ा। 1980 के दशक की शुरुआत में फेडरल रिजर्व की ब्याज दर 22 फीसदी के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी।हालांकि उसके तत्काल बाद के वर्षों में कुछ सुधार हुआ,लेकिन दशक के आखिर तक स्थितियां बिगड़ गईं।घरेलू आयात प्रतिस्थापन औद्योगीकरण नीति ने स्थिति को काफी खराब कर दिया जिससे भारत के निर्यात को काफी नुकसान हुआ।तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने 9 जुलाई 1991 को पदभार संभालने के कुछ ही दिनों बाद कहा था,भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जबरदस्त गिरावट आई और हमारे पास डीजल,केरोसिन,खाद्य तेल एवं उर्वरक जैसी आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए भी विदेशी मुद्रा नहीं बची।
उस समय तक रुपया तय विनिमय दर प्रणाली के तहत संचालित होता था और वह लगभग 17-18 प्रति डॉलर पर कारोबार करता था।आरबीआई ने भुगतान संतुलन संकट से निपटने के लिए उठाए गए अपने पहले कदम के तौर पर 1 से 3 जुलाई, 1991 को दो चरण में रुपये का अवमूल्यन किया।
दो अवमूल्यन किए जाने पर रुपये के मूल्य में कुल मिलाकर 18 फीसदी की कमी आई। इसके अलावा संकट से निपटने के लिए अन्य उपाय भी किए गए। रकम जुटाने के लिए भारत सरकार ने सोना तक गिरवी रख दिया। देश के भीतर इसका विरोध भी हुआ।मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने 9 जुलाई के अपने भाषण में स्पष्ट तौर पर कहा,गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए कड़े उपाय करने की जरूरत होती है।
तब से लेकर अब तक भारत के विदेशी मुद्रा प्रबंधन ढांचे में जबरदस्त बदलाव आया है।देश बहुत अधिक नियंत्रण और बेहद कम विदेशी मुद्रा भंडार वाली अर्थव्यवस्था आगे बढ़कर अब दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल हो चुका है। कोविड-19 महामारी के बाद विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूती मिली और अब यहां विनिमय दर बाजार द्वारा तय होती है। भारत ने अपनी व्यवस्था में कई ऐसे उपाय किए जो काफी कारगर साबित हुए। इनमें पश्चिम एशिया में शुरू हुए हालिया युद्ध के कारण विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदम भी शामिल हैं।
भारत की विदेशी मुद्रा रणनीति खास तौर पर 1991 के बाद विकसित हुई जब उसने आर्थिक सुधारों को लागू किया। उन्होंने कहा,भारत ने तय विनिमय दर प्रणाली से बाजार द्वारा निर्धारित मूल्य वाली व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया।
यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ।सरकार ने 1991 में रुपये का दो चरणों में अवमूल्यन किया।उसके बाद 1992 में उदारीकृत विनिमय दर प्रबंधन प्रणाली (एलईआरएमएस) पेश की गई, जिससे दोहरी विनिमय दर की अनुमति मिली। इस प्रकार भारत ने 1993 तक एक एकीकृत बाजार द्वारा निर्धारित विनिमय दर प्रणाली को अपना लिया था।साथ ही देश ने चरणों में अपने पूंजी खाते को खोलना शुरू कर दिया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को उदार बनाया गया, बाह्य वाणिज्यिक उधार की अनुमति दी गई और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को भारतीय शेयर बाजारों तक पहुंच प्रदान की गई।अगला प्रमुख पड़ाव 1994 में आया जब भारत ने आईएमएफ के अनुच्छेद 8 की बाध्यताओं को स्वीकार किया। इससे चालू खाते पर रुपया प्रभावी रूप से परिवर्तनीय हो गया। इसने कारोबारियों और लोगों को मामूली प्रतिबंधों के साथ व्यापार संबंधी एवं अन्य चालू खाते का लेनदेन करने में सक्षम बनाया।
वर्ष 2000 के दशक में जब पूंजी की आमद बढ़ी तो आरबीआई को बड़े पैमाने पर विदेशी रकम के आने से उत्पन्न नए हालात संभालने पड़े।किसी खास विनिमय दर पर नजर टिकाए रखने के बजाय केंद्रीय बैंक ने मुद्रा बाजार में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव सीमित करने पर ध्यान दिया।
आरबीआई की विदेशी मुद्रा नीति का मूल सिद्धांत वर्षों से एक जैसा रहा है।इसका मकसद मुद्रा का एक खास स्तर बनाए रखने के बजाय बेवजह के उतार-चढ़ाव को संभालना रहा है।यह तरीका लगातार आरक्षित जमा करने के दौर के साथ भी मेल खाता था। वर्ष 2000 के दशक में जब विदेशी निवेश और निर्यात से होने वाली कमाई में तेजी आई तो आरबीआई ने रुपये की कीमत में अचानक बढ़ोतरी रोकने के लिए बाजार से डॉलर खरीदे और साथ ही विदेशी मुद्रा का भंडार भी तैयार किया।
इसका परिणाम यह हुआ कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 1991 के संकट के समय 6 अरब डॉलर से कम था जो 2000 के दशक के आखिर तक 300 अरब डॉलर से अधिक हो गया,जिससे बाहरी झटकों से निपटने के लिए एक जरूरी सुरक्षा कवच तैयार हुआ।यह सुरक्षा कवज दुनिया भर में हुई उठापटक के दौर में काम आया। वर्ष 1997-98 में एशियाई वित्तीय संकट, 2000 में डॉट-कॉम संकट और वर्ष 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट ने भारत के बाहरी क्षेत्र की मजबूती की परीक्षा ली।हालांकि इन घटनाओं के दौरान रुपये पर दबाव पड़ा मगर आरबीआई ने हालात स्थिर करने के लिए हाजिर बाजार में दखल देने और नियामकीय उपाय करने का तरीका अपनाया।
समय के साथ आरबीआई के कामकाज का तरीका बेहतर होता गया।मुश्किल समय में विदेशी मुद्रा लाने के लिए उसने खास योजनाएं लाई गईं। इनमें वर्ष 1998 में रिसर्जेंट इंडिया बॉन्ड्स (आरआईबी), 2000 में इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट्स (आईएमडी) और वर्ष 2013 में विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) या एफसीएनआर (बी) अदला-बदली योजना शामिल थीं।आरबीआई ने इस साल की शुरुआत में भी विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए एफसीएनआर(बी) रास्ते का सहारा लिया।
वर्ष 2013 का टेपर टैंट्रम भारत के विदेशी मुद्रा प्रबंधन के सफर में एक और अहम मोड़ था।अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिज़र्व ने वैश्विक वित्तीय संकट के बाद मांग बढ़ाने के लिए ब्याज दरें लगभग शून्य कर दीं मगर बाद में उसने संकेत दिए कि वह आर्थिक प्रोत्साहन को वापस लेना शुरू करेगा।
नतीजा यह हुआ कि उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकलने लगी,जिससे कुछ उभरते बाजारों की मुद्राएं काफी फिसल गईं।पूंजी बाहर जाने और मुद्रा की कीमत घटने के जोखिम के कारण भारत की गिनती ब्राजील,इंडोनेशिया,तुर्किये और दक्षिण अफ्रीका के साथ फ्रैजाइल फाइव यानी पांच कमजोर अर्थव्यवस्थाओं में होने लगी।कुछ ही महीनों में भारतीय मुद्रा में 20 प्रतिशत से अधिक गिरावट आ गई,जिससे भारत के बाह्य संतुलन में जोखिम दिखने लगे और आरक्षित भंडार की अहमियत का एहसास हुआ।
वर्ष 2000 और 2010 के दशक में कुछ समय तक स्थिरता बनी रही मगर उसके बाद अचानक झटके लगे,जिससे मुद्रा में में बड़े बदलाव हुए।वर्ष 1998, वर्ष 2000 और फिर वर्ष 2013 के टेपर टैंट्रम के दौरान ऐसी घटनाएं देखी गईं।इन संकटों के जवाब में आरबीआई ने अधिक विदेशी मुद्रा भंडार के जरिये मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किए और भारत का बाहरी खाता मजबूत हुआ।इन उपायों का परिणाम यह रहा है कि रुपये में में आम तौर पर अधिक स्थिरता दिखी है और पिछले दशक में इसकी की चाल काफी व्यवस्थित रही है।
वर्ष 2013 के बाद आरक्षित जमा करने पर फिर से जोर दिया गया।आरबीआई ने पूंजी की भारी आमद का फायदा उठाकर धीरे-धीरे अपना विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाया। यह बात खास तौर पर कोविड-19 महामारी के दौरान उठाए गए कदमों में साफ दिखी जब विदेशी मुद्रा भंडार जनवरी 2020 में 471 अरब डॉलर से बढ़कर दिसंबर 2021 तक 633 अरब डॉलर हो गया था। तब से यह और बढ़कर वर्ष 2026 में 700 अरब डॉलर से अधिक हो गया है।
मुद्रा भंडार बढ़ाने के साथ आरबीआई ने हस्तक्षेप करने के अपने तरीकों का दायरा भी बढ़ाया है।डॉलर की हाजिर बाजार में खरीद-बिक्री मुख्य तरीका बना रहा।वहीं आरबीआई ने धीरे-धीरे फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट और हाल ही में नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाजार मार्केट का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।आरबीआई अब हाजिर लेनदेन से आगे बढ़कर फॉरवर्ड और एनडीएफ बाजारों में भी हस्तक्षेप कर रही है,जहां अनुबंध अक्सर आगे बढ़ाया (रोल ओवर) जाता है। हाल के समय में यह एक नया तरीका अपनाया गया है।
आरबीआई ने मुश्किल समय में अधिक सट्टेबाजी रोकने के लिए अक्सर नियामकीय उपाय भी किए हैं।इनमें तेल आयातकों के लिए खास सुविधाएं,हेजिंग नियमों में बदलाव, ओपन पोजीशन लिमिट में बदलाव और निर्यात से होने वाली कमाई तेजी से वापस लाने के उपाय शामिल हैं।
इस बीच सावधानी के साथ ही सही मगर पूंजी खाता उदार बनाने की प्रक्रिया जारी रही है।पिछले कुछ वर्षों में विदेशी निवेश के लिए और भी क्षेत्र स्वचालित मंजूरी (ऑटोमैटिक रूट) के तहत लाए गए हैं और भारतीय कंपनियों के विदेशी निवेश पर लगी पाबंदियों में ढील दी गई है।इनके अलावा चुनिंदा सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश आसान बनाने के लिए फुली एक्सेसिबल रूट की शुरुआती की गई है।
रुपये के लिहाज से देखा जाए तो हमेशा विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव सीमित करने पर जोर रहा है।उम्मीद है कि आरबीआई पूंजी खाता धीरे-धीरे उदार बनाने की प्रक्रिया जारी रखेगी।वर्तमान में भारत का विदेशी मुद्रा प्रबंधन ढांचा वर्ष 1991 की व्यवस्था से बिल्कुल अलग है।पिछले कुछ वर्षों में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 700 अरब डॉलर के आसपास रहा है और इस लिहाज से भारत दुनिया के शीर्ष पांच देशों में एक है।इसके अलावा विनिमय दर काफी हद तक बाजार से तय होती है और विदेशी मुद्रा भंडार दुनिया में सबसे बड़े भंडारों में से एक है। आरबीआई के पास उतार-चढ़ाव संभालने के लिए कई तरह के उपाय मौजूद हैं।
हालांकि वैश्विक झटकों, भू-राजनीतिक तनाव और पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव की वजह से रुपये पर दबाव बना रहता है मगर आरबीआई की मुख्य सोच काफी हद तक वैसी ही बनी हुई है।यानी वह बाजार को रुपये की दिशा तय करने देता है मगर साथ ही बेतरतीब उतार-चढ़ाव रोकने के लिए दखल भी देता है। उदारीकरण के साढ़े तीन दशक बाद भारत की विदेशी मुद्रा रणनीति संकट से निपटने से आगे बढ़कर स्थिरता बनाए रखने की ओर बढ़ गई है। यह घरेलू बाजार की बढ़ती गहराई और वैश्विक वित्तीय तंत्र देश की मजबूत स्थिति को परिलक्षित करता है।