धनंजय सिंह।सियासत में एक कहावत है कि तस्वीरें बदलती हैं,लेकिन तासीर नहीं बदली है।शायद बहुजन समाज पार्टी 2027 विधानसभा से पहले नए तेवर और कलेवर में आ गई है। सालों बाद बसपा मुखिया मायावती का नोटों वाला हार चर्चा में आ गया।आकाश आनंद को सोने का मुकुट देकर बसपा नेताओं ने पुराने परंपराओं को निभाया।बसपा में नहीं बदली नोटों के हार से लेकर सोने के मुकुट देने की परंपरा।
बहुजन समाज पार्टी के नेशनल कॉर्डिनेटर मायावती के भतीजे आकाश आनंद फिर से चर्चा में हैं।आकाश आनंद सोमवार को सहारनपुर पहुंचे थे।आकाश आनंद ने बसपा के कार्यक्रम में नकुड़ विधानसभा सीट से नरेश कुमार सैनी की उम्मीदवारी का ऐलान कर दिया,लेकिन इस सभा में एक पुरानी तस्वीर बिल्कुल नए रंग में दोहराई गई।बसपा उम्मीदवार नरेश सैनी ने आकाश आनंद का स्वागत एक चमचमाते सोने के मुकुट से किया।बसपा नेताओं का तर्क था कि यह मुकुट सैनी समाज की ओर से दिया गया सम्मान है,लेकिन एक वाकये ने यूपी की सियासत में दो दशक पुरानी उन यादों को ताजा कर दिया है जब मायावती के सोने के मुकुट और नोटों की माला सियासत और विवादों के केंद्र में हुआ करते थे।
सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल होने लगा और लोग सवाल उठाने लगे।सवाल उठना लाजमी है क्या नए चेहरे,नई पीढ़ी और नए दौर के दावों के बावजूद बसपा में कुछ नहीं बदला,क्या बसपा के अतीत,वर्तमान और भविष्य का सियासी समीकरण है।
बसपा की नींव कांशीराम ने एक सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन के रूप में रखी थी। कांशीराम का उद्देश्य शोषित,वंचित और दलित समाज को सियासी शक्ति देना था।शुरुआती दिनों में बसपा का चुनावी प्रचार बेहद साधारण और जमीनी स्तर का होता था,लेकिन 1990 और 2000 के दशक में जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो बसपा का स्वरूप बदलने लगा।
साल 2010 में राजधानी लखनऊ में बसपा की रैली के दौरान मायावती को करोड़ों रुपये के 1000-1000 के नोटों की माला पहनाई गई।फिर बाद में विभिन्न जनसभाओं और जन्मदिन के मौकों पर बसपा नेताओं द्वारा मायावती को सोने-चांदी के मुकुट,चांदी के गदा और भारी-भरकम उपहार देना एक परंपरा बन गयी थी।यह परंपरा काफी सालों तक रही।
विपक्षी दल खासकर काग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी तब इसे दलित राजनीति के नाम पर राजा-महाराजाओं वाली सामंती मानसिकता बोलते नहीं थकती थी।इन पार्टियों ने इसे धनबल का प्रदर्शन करार दिया था।हालांकि मायावती और बसपा ने हमेशा इसका बचाव करते हुए कहा कि यह बहुजन समाज का अपने मसीहा के प्रति स्वाभिमान और समर्पण का प्रतीक है,जिसे मनुवादी पार्टी और लोग स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
मायावती ने जब अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया और पार्टी की कमान सौंपी तो माना जा रहा था कि बसपा अब एक न्यू पार्टी बनेगी। डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल,युवाओं को जोड़ना,कैडर आधारित राजनीति और कॉर्पोरेट-स्टाइल वर्किंग की उम्मीद जताई जा रही थी।हाल के समय में आकाश आनंद ने युवाओं के मुद्दे,कानून व्यवस्था और रोजगार पर आक्रामक तेवर भी दिखाए,लेकिन सहारनपुर की घटना ने यह साबित कर दिया कि बसपा का जमीनी कैडर आज भी अपने नेताओं को रिझाने और सम्मानित करने के लिए पुरानी ही शैली पर निर्भर है।
उत्तर प्रदेश 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बसपा का पारंपरिक जाटव वोट बैंक में सेंध लग चुकी है।दलित वोट बैंक भाजपा और चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी की ओर खिसकता हुआ नजर आ रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई थी। 2024 के लोकसभा चुनावों में बसपा का खाता नहीं खुला।नए युवाओं को बसपा से जोड़ने के बजाय,स्थानीय नेता अब भी पुराने राजाशाही प्रदर्शनों से शीर्ष नेतृत्व को खुश करने में लगे हैं।
सहारनपुर में आकाश आनंद को सोने का मुकुट पहनाया जाना केवल एक स्वागत समारोह नहीं था,यह 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बसपा की शुरुआती रणनीति का हिस्सा है। गैरयादव ओबीसी जैसे सैनी समाज को साधना, बसपा की एक रणनीति है,क्योंकि यह समाज बीते कई सालों से भाजपा की ओऱ खिसक गया है,ऐसे में सोने का मुकुट पहनाकर सैनी समाज बसपा के करीब तो नहीं आ रहा है।
आज का मतदाता बदल चुका है,आज का युवा और दलित मतदाता अब केवल प्रतीकात्मक राजनीति या सोने के मुकुटों से प्रभावित नहीं होता,उसे शिक्षा,रोजगार,सामाजिक सुरक्षा और सीधी भागीदारी चाहिए।नगीना से सांसद बने चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा नेता सड़कों पर उतरकर आंदोलन की राजनीति कर रहे हैं,ऐसे में आकाश आनंद की मुकुट वाली सियासत उनके जमीनी संघर्ष के सामने कैसी दिखेगी।
यदि आकाश आनंद और बसपा को 2027 विधानसभा चुनाव में अपनी खोई हुई साख वापस पानी है, तो उन्हें भव्य आयोजनों और मुकुटों के बजाय बूथ स्तर के संगठन और जनता के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना होगा।सहारनपुर से आई सोने के मुकुट की तस्वीर यह बयां करती है कि बसपा के भीतर नेतृत्व भले ही बदल रहा हो, लेकिन बसपा का सिंबल ऑफ पावर सत्ता और सम्मान का प्रतीक आज भी वही है जो दो दशक पहले था।मायावती के दौर से चला आ रहा यह उपहार-संस्कृति का सिलसिला आकाश आनंद के दौर में भी जारी है।अब देखना यह होगा कि 2027 के चुनावी समर में यह सोने का मुकुट बसपा के लिए स्वाभिमान का ताज बनता है या फिर विपक्ष के हाथों में एक नया सियासी हथियार।