भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन में जबरदस्त उछाल,क्या देश को इसका पूरा फायदा मिल रहा है
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन में जबरदस्त उछाल,क्या देश को इसका पूरा फायदा मिल रहा है

28 Oct 2026 |   31



 

धनंजय सिंह।भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स सामान बनाने का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है।मोबाइल फोन से लेकर घरेलू इस्तेमाल के इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स तक,देश में कई तरह के सामान तैयार हो रहे हैं,लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन प्रोडक्ट्स को बनाने से भारत को असल में कितना फायदा हो रहा है,इसे समझने के लिए प्रोडक्शन,पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी की पूरी तस्वीर देखनी जरूरी है।

भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है।इसी दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट 38,263 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये हो गया।हालांकि, ज्यादा प्रोडक्शन का मतलब यह नहीं कि पूरी कमाई भारत में ही हो रही है।अगर किसी प्रोडक्ट के जरूरी पार्ट्स विदेश से मंगाकर भारत में सिर्फ असेंबल किए जाते हैं, तो उसकी कुल वैल्यू का एक हिस्सा ही देश में जुड़ता है।

 मेक इन इंडिया के पहले चरण में फैक्ट्रियां लगाने,निवेश लाने और प्रोडक्शन बढ़ाने पर जोर था।अब भारत को पार्ट्स, इंजीनियरिंग और स्किल्ड कर्मचारियों पर ध्यान देना होगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स में सेमीकंडक्टर,डिस्प्ले,सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल जैसे महंगे पार्ट्स इस्तेमाल होते हैं। इनके विदेश से आने पर भारत की घरेलू वैल्यू एडिशन सीमित रह जाती है।भारत को मोटर, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल,प्लास्टिक और शीट मेटल जैसे पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों को भी मजबूत करना होगा।

इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम यानी ईसीएमएस के तहत 38 फैक्ट्रियों में काम शुरू हो चुका है।वहीं 16 अन्य फैक्ट्रियों में कंस्ट्रक्शन और मशीनें लगाने का काम आगे बढ़ रहा है।देश में पार्ट्स बनने से कंपनियों की लागत घटाने और क्वालिटी बेहतर करने में मदद मिल सकती है।हालांकि, भारतीय सप्लायर्स को कीमत,क्वालिटी और बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के मामले में ग्लोबल कंपनियों से मुकाबला करना होगा।

भारत को सिर्फ ज्यादा कर्मचारियों की नहीं,बल्कि नई मशीनें चलाने,क्वालिटी जांचने और तकनीकी खराबियां दूर करने वाले स्किल्ड लोगों की जरूरत होगी।इसके साथ ही कंपनियों को प्रोडक्ट डिजाइन,इंजीनियरिंग और नई टेक्नोलॉजी विकसित करने पर निवेश बढ़ाना होगा।

आने वाले समय में भारत की सफलता सिर्फ प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट से नहीं मापी जाएगी। यह भी देखना होगा कि कितने पार्ट्स देश में बन रहे हैं, आयात पर निर्भरता कितनी घटी है और भारतीय कंपनियां ग्लोबल सप्लाई चेन में कितनी मजबूत हुई हैं।

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