एटा में खनन माफिया बनाम कानून,तहसीलदार की छापेमारी के बाद भी कार्रवाई अधूरी,जब्ती बिना कागज़ात,प्रशासन पर मिलीभगत के गंभीर सवाल
एटा में खनन माफिया बनाम कानून,तहसीलदार की छापेमारी के बाद भी कार्रवाई अधूरी,जब्ती बिना कागज़ात,प्रशासन पर मिलीभगत के गंभीर सवाल

01 May 2026 |   53



एटा में खनन माफिया बनाम कानून,तहसीलदार की छापेमारी के बाद भी कार्रवाई अधूरी,जब्ती बिना कागज़ात,प्रशासन पर मिलीभगत के गंभीर सवाल

 एक ट्रैक्टर-लोडर पकड़ा,बाकी फरार, एफआईआर नहीं, जब्ती मेमो नहीं,नियमों की खुली अनदेखी या सुनियोजित ढील

ब्यूरो तुर्रम सिंह 

 

जलेसर/एटा। उत्तर प्रदेश के एटा जिले के तहसील क्षेत्र जलेसर के ग्राम वलीदादपुर के पास अवैध मिट्टी खनन का मामला प्रशासनिक सख्ती के दावों को चुनौती देता नजर आ रहा है।मध्य रात्रि में तहसीलदार संदीप सिंह द्वारा की गई छापेमारी में एक ट्रैक्टर-लोडर को मौके से पकड़ लिया गया, जबकि आधा दर्जन से अधिक ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य मशीनें अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गईं।सबसे गंभीर पहलू यह है कि जब्त किए गए ट्रैक्टर-लोडर को कोतवाली जलेसर में खड़ा कराए जाने के बावजूद अब तक न तो कोई आधिकारिक एफआईआर दर्ज की गई है,न ही जब्ती की विधिवत कार्यवाही पूरी की गई है और न ही सुपुर्दगी का कोई लिखित रिकॉर्ड जारी हुआ है।यह स्थिति न केवल प्रक्रियागत लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में खड़ा करती है।

  सरकारी नियमों की सीधी अनदेखी

उत्तर प्रदेश सरकार की स्पष्ट नीति के मुताबिक अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर शून्य सहिष्णुता लागू है।उत्तर प्रदेश मिनरल्स (प्रिवेंशन ऑफ इललीगल माइनिंग, ट्रांसपोर्टेशन एंड स्टोरेज) रूल्स, 2018 और MMDR एक्ट के तहत मौके पर पकड़े गए वाहन/मशीनरी की तत्काल जब्ती अनिवार्य है,जब्ती मेमो,फोटो साक्ष्य और रिपोर्ट तत्काल तैयार की जानी चाहिए,संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू करना जरूरी है,पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आकलन कर वसूली की प्रक्रिया प्रारंभ की जानी चाहिए।मगर जलेसर के इस मामले में इन सभी अनिवार्य प्रावधानों की अनदेखी स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।

  कार्रवाई पर उठते कठोर सवाल

एक ही वाहन क्यों पकड़ा गया,जबकि कई अन्य मौके से भाग निकले।जब्ती के कई घंटे बीतने के बाद भी आधिकारिक दस्तावेज क्यों नहीं बने,एफआईआर दर्ज करने में देरी किसके दबाव या संकेत पर हो रही है,क्या यह देरी अवैध खनन माफियाओं को राहत देने की रणनीति है।

  प्रशासनिक छवि पर गहरा आघात

तहसीलदार की छापेमारी को प्रारंभिक स्तर पर सख्त कार्रवाई माना जा सकता है,लेकिन उसके बाद की ढिलाई पूरे ऑपरेशन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है। बिना विधिक प्रक्रिया के जब्ती,न्यायालय में टिक नहीं पाती और अंततः आरोपी लाभ की स्थिति में आ जाते हैं।

  डीएम से तत्काल हस्तक्षेप की मांग

स्थानीय नागरिकों और जागरूक वर्ग ने जिलाधिकारी से मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए,
संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो,एफआईआर दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए,फरार वाहनों की पहचान कर सख्त कार्रवाई हो।

पर्यावरण और राजस्व पर सीधा हमला

अवैध मिट्टी खनन केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि सरकारी राजस्व की भारी हानि,कृषि भूमि की क्षति,भू-जल स्तर पर असर और पर्यावरणीय संतुलन का विनाश
जैसे गंभीर परिणामों को जन्म देता है।

बता दें कि एटा का यह मामला साफ संकेत देता है कि सिर्फ छापेमारी से नहीं,बल्कि कानूनी प्रक्रिया की पूर्ण पारदर्शिता और तत्परता से ही अवैध खनन पर लगाम लग सकती है।
यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो यह ढिलाई खनन माफियाओं को खुली छूट देने के समान होगी।
सरकार की जीरो टॉलरेंस दावे की साख दांव पर है। अब निर्णायक कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प है।

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