नई दिल्ली।विश्व में महंगाई का खतरा एक बार फिर बढ़ गया है।इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है।ब्रेंट जुलाई 2026 के बाद पहली बार इस लेवल पर पहुंचा है।पिछले लगभग छह हफ्तों में इसकी कीमत लगभग 25 प्रतिशत चढ़ चुकी है,इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव और मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई रुकने का डर है।ब्रेंट क्रूड भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है श,क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। क्रूड महंगा होने पर भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ता है।पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों पर दबाव बनता है।रुपया कमजोर हो सकता है और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है।अब सवाल है कि ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के पार क्यों पहुंचा और सितंबर के आखिर तक इसका भाव कहां जा सकता है। आइए इसे 5 आसान कारणों से समझते हैं।
1-अमेरिका और ईरान में टकराव
क्रूड ऑयल में आई तेजी का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव है।अमेरिकी सेना ने ईरान से जुड़े कई ऑयल टैंकरों पर कार्रवाई की।इसके जवाब में ईरान ने अमेरिकी जहाजों और जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया।मिडिल ईस्ट विश्व का सबसे बड़ा ऑयल सप्लाई सेंटर है।यहां तनाव बढ़ने का मतलब है कि मार्केट तुरंत भविष्य में तेल की कमी का डर कीमत में जोड़ना शुरू कर देता है।इसे जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम कहते हैं। आसान भाषा में कहें तो तेल अभी कम हुआ हो या नहीं, लेकिन आगे सप्लाई रुकने की आशंका के कारण खरीदार ज्यादा कीमत देने लगते हैं।ब्रेंट क्रूड 9 सितंबर को शुरुआती कारोबार में 99.22 डॉलर पर पहुंच गया था और बाद में 100 डॉलर का स्तर पार कर गया।अगस्त की शुरुआत से ब्रेंट लगभग 25 फीसदी महंगा हो चुका है।
2-सऊदी अरब की ऑयल फैसिलिटीज पर हमला
ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के चार शहरों और वहां मौजूद एनर्जी फैसिलिटीज पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए,इन हमलों में ऑयल इंस्टॉलेशंस में आग लगने की खबर भी सामने आई।यह घटनाक्रम इसलिए ज्यादा गंभीर है,क्योंकि सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल उत्पादकों में शामिल है।अब तक सऊदी अरब,स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में परेशानी होने पर दूसरे रास्तों से तेल भेजकर सप्लाई को संभाल रहा था,लेकिन अगर सऊदी ऑयल फैसिलिटीज और वैकल्पिक एक्सपोर्ट रूट भी हमलों की चपेट में आते हैं तो विश्व के सामने तेल की वास्तविक कमी पैदा हो सकती है।
युद्ध शुरू होने से पहले विश्व की लगभग 20 फीसदी ऑयल सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरती थी।
3-होर्मुज से तेल की आवाजाही में भारी गिरावट
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मिडिल ईस्ट से निकलने वाले कच्चे तेल का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है।युद्ध से पहले मिडिल ईस्ट के तेल उत्पादक रोजाना लगभग 1.8 करोड़ बैरल क्रूड भेज रहे थे।अब यह मात्रा घटकर लगभग 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गई है।अगस्त के आखिर में होर्मुज से रोजाना लगभग 80 से 90 लाख बैरल तेल गुजर रहा था।तनाव दोबारा बढ़ने के बाद यह मात्रा 20 लाख बैरल प्रतिदिन से नीचे चली गई,इसका मतलब है कि विश्व को तेल मिल तो रहा है,लेकिन सामान्य समय के मुकाबले काफी कम।इसी सप्लाई शॉर्टेज ने ब्रेंट को 100 डॉलर तक पहुंचाया है।हालांकि सऊदी अरब,इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत वैकल्पिक रास्तों से कुछ सप्लाई जारी रखे हुए हैं।यही वजह है कि क्रूड में तेजी के बावजूद भाव अभी बेकाबू होकर 120 या 125 डॉलर तक नहीं गया है।
4-विश्व का ऑयल स्टॉक तेजी से घटा
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक जुलाई में विश्व का दिखने वाला ऑयल स्टॉक 6.9 करोड़ बैरल घट गया।युद्ध शुरू होने के बाद से कुल इन्वेंट्री यानी जमा तेल करीब 41 करोड़ बैरल कम हो चुका है।इन्वेंट्री को घर की पानी की टंकी की तरह समझिए।सप्लाई कम होने पर कुछ समय तक टंकी में जमा पानी से काम चल सकता है,लेकिन टंकी लगातार खाली होती रहे और नई सप्लाई न आए तो कीमत बढ़ना तय है।आईईए की अगस्त रिपोर्ट के मुताबिक 2026 की तीसरी तिमाही में ग्लोबल ऑयल मार्केट में रोजाना लगभग 18 लाख बैरल की कमी रह सकती है।सप्लाई और डिमांड के इसी अंतर से कीमतों को सपोर्ट मिल रहा है।
5-डीजल की कमी और फिजिकल मार्केट में जबरदस्त डिमांड
वायदा बाजार से भी ज्यादा तनाव वास्तविक ऑयल मार्केट में दिख रहा है।नवंबर में डिलीवरी वाले दुबई और ओमान क्रूड पर खरीदार बेंचमार्क रेट से 19 से 20 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा प्रीमियम देने को तैयार हैं,इसका मतलब है कि रिफाइनरियों को तुरंत मिलने वाले तेल की कमी महसूस हो रही है।इसके साथ डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट की उपलब्धता भी घटी है।रिफाइनिंग मार्जिन रिकॉर्ड लेवल तक पहुंच गए हैं,जब रिफाइनरियों को क्रूड महंगा मिलता है और डीजल की सप्लाई कम होती है तो पूरी एनर्जी चेन में कीमतें ऊपर जाने लगती हैं।
सितंबर के आखिर तक कहां होगा ब्रेंट क्रूड
मौजूदा रिपोर्ट्स और सप्लाई की स्थिति को देखते हुए सितंबर के आखिर तक ब्रेंट क्रूड का बेस-केस अनुमान 95 से 105 डॉलर प्रति बैरल का बनता है।बेस केस का मतलब वह स्थिति है,जिसकी संभावना फिलहाल सबसे ज्यादा दिखाई देती है। यह हमारा उपलब्ध रिपोर्ट्स पर आधारित आकलन है, किसी संस्था का तय प्राइस टारगेट नहीं।
मॉर्गन स्टैनली ने 2026 की चौथी तिमाही में ब्रेंट का औसत भाव 100 डॉलर रहने का अनुमान दिया
मॉर्गन स्टैनली ने 2026 की चौथी तिमाही में ब्रेंट का औसत भाव 100 डॉलर रहने का अनुमान दिया है।वहीं गोल्डमैन सैक्स ने दिसंबर 2026 के लिए 85 डॉलर का अनुमान लगाया है।अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन का तीसरी तिमाही का 85 डॉलर का औसत अनुमान मौजूदा तेजी से पहले जारी हुआ था।संस्था का मानना है कि होर्मुज से सप्लाई सामान्य होने पर चौथी तिमाही में औसत कीमत करीब 78 डॉलर तक नीचे आ सकती है।ईआईए का आउटलुक यहां देखा जा सकता है।अगर अमेरिका-ईरान टकराव बढ़ा,सऊदी फैसिलिटीज पर नए हमले हुए या होर्मुज से तेल की आवाजाही पूरी तरह बंद हुई तो सितंबर के अंत तक ब्रेंट 110 से 120 डॉलर की तरफ जा सकता है,इसके उलट अगर युद्धविराम की उम्मीद बनी और सप्लाई रूट खुलने लगे तो कीमत 90 से 95 डॉलर तक फिसल सकती है।इसलिए सितंबर के आखिर का भाव किसी एक नंबर के बजाय तीन संभावनाओं में समझना बेहतर होगा।
सामान्य तनाव जारी रहा तो 95 से 105 डॉलर,टकराव और सप्लाई संकट बढ़ा तो 110 से 120 डॉलर।युद्धविराम हुआ और सप्लाई सुधरी तो 90 से 95 डॉलर।फिलहाल सबसे ज्यादा संभावना 95 से 105 डॉलर की रेंज में रहने की है,लेकिन मिडिल ईस्ट से आने वाली एक बड़ी खबर कुछ ही घंटों में पूरा अनुमान बदल सकती है।