नई दिल्ली।ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है।इसी के साथ निफ्टी तीन महीने के निचले स्तर तक फिसल गया है।बुधवार को ही ब्रेंट क्रूड ने ये स्तर तोड़ा है और दिन के दौरान निफ्टी भी 23500 के नीचे फिसला है।इसी के साथ ही बाजार में चौतरफा गिरावट देखने को मिली है।ब्रॉड मार्केट में सभी सेक्टर इंडेक्स लाल निशान में रहे हैं।भारत के लिए कच्चा तेल काफी अहम है और जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करने के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव का अर्थव्यवस्था पर सीधा असर दिखता है।ब्रेंट क्रूड में आई तेजी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई और ग्रोथ को लेकर चिंता बढ़ा दी है।अब सवाल है कि आखिर जब-जब ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के करीब पहुंचता है,तब निफ्टी क्यों गिरने लगता है,किन कंपनियों को फायदा होता है और किन कंपनियों के लिए मुश्किल बढ़ जाती है।
क्रूड गया ऊपर तो निफ्टी आया नीचे
बुधवार को ब्रेंट क्रूड दोबारा 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा। उसी समय निफ्टी तीन महीने के निचले स्तर 23,550 तक फिसल गया।दिलचस्प बात यह है कि लगभग डेढ़ महीने पहले भी बाजार का हाल कुछ ऐसा ही था। 24 जुलाई को ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा था,उस समय निफ्टी ने 23,606 का निचला स्तर छुआ था।यानी दोनों मौकों पर क्रूड 100 डॉलर पर और निफ्टी 23,600 के आसपास दिखाई दिया।जुलाई का पूरा पैटर्न देखें तो 13 जुलाई को क्रूड 77 डॉलर और निफ्टी 24,000 पर था,इसके बाद केवल 9 कारोबारी सत्रों में क्रूड 77 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर हो गया।इसी दौरान निफ्टी लगभग 2 फीसदी गिरकर 23,606 पर आ गया।अगस्त से सितंबर के बीच भी ऐसा ही हुआ। 5 अगस्त को क्रूड 78 डॉलर पर था और निफ्टी 24,500 के करीब था। बुधवार तक क्रूड बढ़कर 100 डॉलर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी करीब 4 फीसदी गिरकर 23,550 तक आ गया।इन आंकड़ों से क्रूड और बाजार के बीच उल्टा रिश्ता दिखाई देता है,लेकिन यह समझना जरूरी है कि निफ्टी की पूरी गिरावट के लिए अकेला क्रूड जिम्मेदार नहीं होता।विदेशी निवेशकों की बिकवाली,ग्लोबल मार्केट,ब्याज दरें,डॉलर, कंपनियों के नतीजे और जियोपॉलिटिकल तनाव भी बाजार को प्रभावित करते हैं।महंगा क्रूड इन सभी चिंताओं को और बढ़ा देता है।
क्रूड महंगा होने से भारत को क्यों लगता है झटका
भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।जब तेल 78 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर हो जाता है तो भारत को उतना ही तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।इससे देश का इम्पोर्ट बिल बढ़ता है।तेल कंपनियों और दूसरी भारतीय कंपनियों को ज्यादा डॉलर चाहिए होते हैं।डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपया कमजोर हो सकता है। बुधवार को रुपया एक डॉलर के मुकाबले 95 के पार चला गया था।महंगा क्रूड और डॉलर की बढ़ती मांग रुपये पर दबाव की बड़ी वजह बने।रुपया कमजोर होने पर विदेश से मंगाया जाने वाला सामान और महंगा हो जाता है,इससे पेट्रोल,डीजल,ट्रांसपोर्ट,प्लास्टिक,पेंट और रोजमर्रा की चीजों की लागत बढ़ सकती है।इसे इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन कहते हैं।आसान भाषा में इसका मतलब है कि विदेश से खरीदी जाने वाली महंगी चीजों के रास्ते देश में महंगाई आना।महंगाई ज्यादा रहने पर रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती टाल सकता है।ऊंची ब्याज दरों से कंपनियों का कर्ज महंगा रहता है और लोगों की खरीदारी की ताकत घट सकती है।यही डर शेयर बाजार को परेशान करता है।
अगर क्रूड और चढ़ा तो निफ्टी कितना गिर सकता है
फरवरी और मार्च का पैटर्न निवेशकों के लिए बड़ा संकेत है। 27 फरवरी को ब्रेंट क्रूड 73 डॉलर पर था और निफ्टी 25,179 पर था। 9 मार्च को क्रूड उछलकर 119 डॉलर तक पहुंच गया, जबकि निफ्टी गिरकर 24,030 पर आ गया।यानी क्रूड में तेज उछाल के बीच निफ्टी करीब 1,149 अंक टूट गया।इस पुराने पैटर्न का मतलब यह नहीं कि इस बार भी निफ्टी उतना ही गिरेगा,लेकिन अगर क्रूड 110 से 120 डॉलर की तरफ गया तो ऑयल इम्पोर्ट बिल,रुपया,महंगाई और ब्याज दरों को लेकर डर बढ़ सकता है,ऐसे में निफ्टी पर और दबाव आने का खतरा रहेगा।इसके उलट अगर मिडिल ईस्ट तनाव घटता है और ब्रेंट 90 से 95 डॉलर की तरफ लौटता है तो भारतीय बाजार को राहत मिल सकती है।
महंगे क्रूड से किन शेयरों को फायदा
5 अगस्त के बाद क्रूड में तेजी के बीच ऑयल इंडिया का शेयर लगभग 12 फीसदी चढ़ा,इसकी वजह आसान है।ऑयल इंडिया जमीन से कच्चा तेल निकालकर बेचती है।क्रूड का भाव बढ़ने पर कंपनी को अपने तेल के बदले ज्यादा कीमत मिल सकती है।इससे उसकी बिक्री और मुनाफे को फायदा होने की संभावना बनती है।ओएनजीसी भी ऑयल प्रोड्यूसर है, इसलिए सैद्धांतिक रूप से महंगा क्रूड उसके लिए पॉजिटिव है। इसके बावजूद 5 अगस्त से उसके शेयर में लगभग 1 फीसदी की गिरावट रही।इसका मतलब है कि केवल क्रूड देखकर किसी ऑयल प्रोड्यूसर का शेयर नहीं खरीदना चाहिए।उत्पादन,सरकार की टैक्स पॉलिसी,गैस की कीमत, कंपनी के नतीजे और बाजार का मूड भी शेयर को प्रभावित करते हैं।
एचपीसीएल,बीपीसीएल और आईओसी क्यों गिरे
5 अगस्त के बाद एचपीसीएल का शेयर लगभग 11 फीसदी, बीपीसीएल 7 फीसदी और आईओसी 6 फीसदी गिरा।
ये कंपनियां कच्चा तेल खरीदकर उसे पेट्रोल और डीजल जैसे प्रोडक्ट में बदलती हैं।क्रूड महंगा होने से इनकी रॉ मैटेरियल कॉस्ट बढ़ जाती है।अगर ये कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत नहीं बढ़ा पातीं तो मार्केटिंग मार्जिन घट सकता है। मार्केटिंग मार्जिन यानी एक लीटर ईंधन बेचने पर खर्च निकालने के बाद बचने वाली कमाई।हालांकि इन कंपनियों के पास रिफाइनरी कारोबार भी है,इसलिए इनका मुनाफा केवल क्रूड की कीमत नहीं,बल्कि रिफाइनिंग मार्जिन और घरेलू फ्यूल प्राइसिंग पर भी निर्भर करता है।
ऑटो,पेंट और एयरलाइन शेयरों पर बड़ा असर
5 अगस्त के बाद टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स में लगभग 13 फीसदी और मारुति में 11 फीसदी की गिरावट आई।महंगा पेट्रोल-डीजल लोगों की गाड़ी चलाने की लागत बढ़ाता है। महंगाई बढ़ने पर लोग नई कार खरीदने का फैसला टाल सकते हैं।ऑटो कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट भी बढ़ सकती है।एशियन पेंट्स लगभग 10 फीसदी गिरा। पेंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई रॉ मैटेरियल क्रूड के डेरिवेटिव होते हैं।डेरिवेटिव का मतलब कच्चे तेल से तैयार होने वाला केमिकल या दूसरा प्रोडक्ट।क्रूड महंगा होने पर पेंट कंपनियों की लागत बढ़ती है और मार्जिन दब सकता है।इंडिगो का शेयर लगभग 8 फीसदी गिरा।एयरलाइन के खर्च में एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ की बड़ी हिस्सेदारी होती है।क्रूड महंगा होने से एटीएफ की कीमत बढ़ सकती है।अगर एयरलाइन पूरा खर्च टिकट के दाम में नहीं जोड़ पाती तो मुनाफा घट सकता है।
निवेशक अब क्या करें
सिर्फ इसलिए ऑयल प्रोड्यूसर न खरीदें कि क्रूड 100 डॉलर हो गया है और केवल डर के कारण ऑटो,पेंट या ऑयल मार्केटिंग कंपनियों से बाहर भी न निकलें।पहले देखें कि महंगा क्रूड कुछ दिनों की कहानी है या कई महीनों तक टिकने वाला है।निवेशकों को ब्रेंट का भाव,रुपया-डॉलर रेट,स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ऑयल सप्लाई और विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री पर नजर रखनी चाहिए।क्रूड 100 डॉलर के ऊपर टिकता है तो ऑयल प्रोड्यूसर्स को फायदा और एयरलाइन, पेंट,ऑटो और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को नुकसान बढ़ सकता है,लेकिन क्रूड वापस 90 डॉलर के नीचे आया तो यही ट्रेंड तेजी से पलट भी सकता है।