पहले अचानक दौड़ने लगी ब्रिटिश पाउंड करेंसी,तोड़े कई रिकॉर्ड,अब क्यों है ऐतिहासिक गिरावट का खतरा
पहले अचानक दौड़ने लगी ब्रिटिश पाउंड करेंसी,तोड़े कई रिकॉर्ड,अब क्यों है ऐतिहासिक गिरावट का खतरा

09 Sep 2026 |   26



 

नई दिल्ली।विश्व की बड़ी करेंसी की रेस में पिछले छह महीने के दौरान एक ऐसा नाम आगे निकला,जिसकी बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी।यह करेंसी है ब्रिटेन का पाउंड,जिसे स्टर्लिंग भी कहा जाता है।ब्रिटेन में पीएम बदल गया,अमेरिका और ईरान में युद्ध से कच्चा तेल महंगा हो गया,गैस महंगी हो गयी, सरकारी कर्ज पर ब्याज बढ़कर 28 साल के ऊपरी स्तर पर पहुंच गया,इसके बावजूद पाउंड ने यूरो,स्विस फ्रैंक,स्वीडिश क्रोना और कनाडाई डॉलर जैसी बड़ी करेंसी को पीछे छोड़ दिया,लेकिन अब कहानी बदल सकती है,जिस ब्याज दर ने अब तक पाउंड को सहारा दिया,वही मामला आने वाले दिनों में उसकी कमजोरी का कारण बन सकता है।

साल 2026 की शुरुआत से अब तक ब्रिटिश पाउंड यूरो के मुकाबले लगभग 1.6 फीसदी मजबूत हुआ है।स्विस फ्रैंक के मुकाबले इसमें 2.8 फीसदी, स्वीडिश क्रोना के मुकाबले 4.9 फीसदी और कनाडाई डॉलर के मुकाबले लगभग 1 फीसदी की तेजी आई है।अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाउंड लगभग सपाट है,इसका मतलब साल की शुरुआत में एक पाउंड से,जितने डॉलर खरीदे जा सकते थे आज भी करीब उतने ही डॉलर मिल रहे हैं।जापानी येन ने जरूर पाउंड को पीछे छोड़ा है।पाउंड,येन के मुकाबले करीब 1.3 फीसदी कमजोर हुआ है।

छह महीने वाला चार्ट दिखाता है कि पाउंड ने ज्यादातर जी10 करेंसी के मुकाबले मजबूती हासिल की। जी10 विश्व की उन विकसित अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी का ग्रुप है,जिनमें सबसे ज्यादा ट्रेडिंग होती है,लेकिन दूसरी इमेज इस रैली की एक और कहानी बताती है।साल 2026 की तीसरी तिमाही में पाउंड को अपनी ताकत के साथ अमेरिकी डॉलर की कमजोरी का भी फायदा मिला।डॉलर के मुकाबले नॉर्वे की क्रोना लगभग 7 फीसदी,जापानी येन 5 फीसदी से ज्यादा और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर लगभग 4 फीसदी मजबूत हुआ, इसके मुकाबले पाउंड की तेजी लगभग 2 फीसदी रही।यानी पाउंड मजबूत जरूर हुआ,लेकिन तीसरी तिमाही में वह सबसे तेज भागने वाली करेंसी नहीं था।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने 20 जुलाई को इस्तीफा दे दिया,इसके बाद एंडी बर्नहम ने सरकार की कमान संभाली। ब्रिटेन को 10 साल में सातवां पीएम मिलने से सामान्य स्थिति में करेंसी और बॉन्ड मार्केट घबरा सकते थे।बाजार को डर था कि नई सरकार ज्यादा खर्च करेगी और पुरानी सरकार के फिस्कल रूल्स यानी कमाई,खर्च और कर्ज को कंट्रोल में रखने वाले नियमों को कमजोर कर सकती है,लेकिन सत्ता का ट्रांसफर बिना किसी बड़े विवाद के पूरा हो गया।ईबरी के मार्केट स्ट्रैटेजी प्रमुख मैथ्यू रायन के मुताबिक क्लीन और ऑर्डरली ट्रांजिशन से पाउंड पर लगा पॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम घट गया।

रिस्क प्रीमियम का मतलब है कि निवेशक किसी देश में राजनीतिक अनिश्चितता होने पर पैसा लगाने के बदले ज्यादा रिटर्न मांगते हैं।सरकार आसानी से बदल गई तो निवेशकों का डर कुछ कम हो गया।

पाउंड की मजबूती की दूसरा बड़ा कारण ब्रिटेन की उम्मीद से बेहतर अर्थव्यवस्था रह।ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में 0.6 फीसदी बढ़ी, इसके बाद अप्रैल-जून तिमाही में भी 0.4 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हुई।विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले यह प्रदर्शन मजबूत माना गया। ब्रिटेन के ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक दूसरी तिमाही में सर्विसेज सेक्टर 0.5 फीसदी और कंस्ट्रक्शन सेक्टर 0.3 फीसदी बढ़ा।अच्छे मौसम और फीफा वर्ल्ड कप को लेकर बने उत्साह से लोगों ने ज्यादा खर्च किया। ग्लोबल तनाव के बावजूद बिजनेस एक्टिविटी भी उम्मीद से बेहतर रही।जब किसी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है तो विदेशी निवेशक वहां पैसा लगाने में ज्यादा भरोसा दिखाते हैं,इससे उस देश की करेंसी की मांग बढ़ सकती है।

यह बात थोड़ी उलटी लग सकती है।ब्रिटेन तेल और गैस की ऊंची कीमतों से प्रभावित होता है।एनर्जी महंगी होने से वहां महंगाई लगभग 3 फीसदी तक पहुंच गई।आम तौर पर बढ़ती महंगाई किसी देश के लिए बुरी खबर होती है,लेकिन करेंसी मार्केट ने सोचा कि महंगाई बढ़ने पर बैंक ऑफ इंग्लैंड को ब्याज दर बढ़ानी पड़ सकती है।ज्यादा ब्याज दर विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती है।मान लीजिए ब्रिटेन के बॉन्ड पर ज्यादा ब्याज मिल रहा है।विदेशी निवेशक वहां पैसा लगाने के लिए डॉलर या यूरो बेचकर पाउंड खरीदेंगे,इससे पाउंड की मांग और कीमत बढ़ सकती है।हालांकि बैंक ऑफ इंग्लैंड ने 2026 की शुरुआत से अपनी प्रमुख ब्याज दर 3.75 फीसदी पर ही रखी है।जुलाई की बैठक में छह सदस्यों ने दर स्थिर रखने के पक्ष में वोट किया,जबकि तीन सदस्य इसे बढ़ाकर 4 फीसदी करना चाहते थे।बैंक ऑफ इंग्लैंड की अगली बैठक 17 सितंबर को है।

असली खतरा यह है कि यूरोपियन सेंट्रल बैंक और अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ा सकते हैं,जबकि बैंक ऑफ इंग्लैंड फिलहाल दर स्थिर रख सकता है।अगर यूरोप में ब्याज दर बढ़ती है तो यूरो में निवेश ज्यादा आकर्षक हो सकता है। अमेरिका में दर बढ़ी तो डॉलर को मजबूती मिल सकती है, लेकिन ब्रिटेन में दर नहीं बढ़ी तो पाउंड को मिलने वाला ब्याज दर का फायदा घट जाएगा।

इसे बैंक एफडी के उदाहरण से समझिए।अगर ब्रिटेन की एफडी पर 3.75 फीसदी ब्याज मिल रहा है,जबकि अमेरिका या यूरोप की एफडी का ब्याज बढ़ जाता है तो निवेशक अपना पैसा वहां ले जा सकते हैं।करेंसी मार्केट में भी मोटे तौर पर यही गणित काम करता है।

राबोबैंक की सीनियर एफएक्स स्ट्रैटेजिस्ट जेन फोली का मानना है कि 17 सितंबर को बैंक ऑफ इंग्लैंड का मैसेज डविश रहा तो पाउंड पर दबाव बढ़ सकता है।डविश का मतलब ऐसा संकेत,जिसमें सेंट्रल बैंक ब्याज दर बढ़ाने की जल्दी में न हो।

तीसरी इमेज पाउंड के लिए सबसे बड़ी चिंता दिखाती है। ब्रिटेन की लंबी अवधि की बॉरोइंग कॉस्ट 1998 के बाद सबसे ज्यादा हो गई है।

8 सितंबर को ब्रिटेन ने लगभग 4.25 अरब पाउंड के 30 साल वाले सरकारी बॉन्ड बेचे।इन पर यील्ड 5.8168 फीसदी रही। यह 1998 के बाद ऐसी बॉन्ड बिक्री पर सबसे ज्यादा दर है। इसका मतलब सरकार को नया कर्ज लेने के लिए पहले से ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है।ब्रिटेन का सालाना डेट इंटरेस्ट खर्च लगभग 109 अरब पाउंड तक पहुंचने का अनुमान है।

शुरुआत में ज्यादा बॉन्ड यील्ड पाउंड को सहारा दे सकती है, क्योंकि निवेशकों को ज्यादा रिटर्न मिलता है,लेकिन अगर यील्ड सरकार के कमजोर फाइनेंस और बहुत ज्यादा कर्ज लेने के डर से बढ़े तो मामला उलटा हो जाता है।निवेशकों को चिंता होने लगती है कि सरकार कर्ज और ब्याज कैसे चुकाएगी।

नई सरकार का पहला एनुअल बजट 28 अक्टूबर को आएगा। नए फाइनेंस मिनिस्टर जॉन हीली ने फिस्कल डिसिप्लिन बनाए रखने का वादा किया है,लेकिन बाजार को डर है कि सरकार अपने खर्च के लिए टैक्स और कर्ज दोनों बढ़ा सकती है।प्रॉपर्टी खरीद पर टैक्स में बदलाव,महंगे मकानों पर मैंशन टैक्स,पेंशन और पर्सनल इन्वेस्टमेंट अकाउंट पर मिलने वाली राहत घटाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।

अगर बजट से प्राइवेट सेक्टर और आर्थिक ग्रोथ पर दबाव बढ़ा।साथ ही सरकार को ज्यादा बॉन्ड जारी करने पड़े, तो पाउंड कमजोर हो सकता है।कुल मिलाकर पाउंड की अब तक की मजबूती तीन चीजों पर टिकी थी।ब्रिटेन की उम्मीद से बेहतर ग्रोथ,सत्ता का शांतिपूर्ण बदलाव और ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद।अब पाउंड की अगली चाल बैंक ऑफ इंग्लैंड, यूरोपियन सेंट्रल बैंक, अमेरिकी फेडरल रिजर्व और 28 अक्टूबर के ब्रिटिश बजट से तय होगी।

More news